मेडिकल कॉलेज: दाखिले की व्यवस्था में असमानता और अन्याय

Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 19 Sep 2021 06:05 AM IST

सार

मेडिकल कॉलेज में दाखिले की अब तक की व्यवस्था को लेकर राज्यों ने, कम से कम तमिलनाडु या महाराष्ट्र ने कोई शिकायत नहीं की थी। 'योग्यता' के संदिग्ध सिद्धांत के साथ नीट असमानता और अन्याय के युग की शुरुआत कर रहा है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भारत का संविधान राज्यों के बीच एक करार है। संविधान का केंद्रीय स्तंभ तीन सूचियों से मिलकर बना है- संघ (केंद्र) सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। मूल रूप में सूची दो (राज्य सूची) 11 प्रविष्टियों के साथ इस रूप में दर्ज की गई : शिक्षा, विश्वविद्यालयीन शिक्षा सहित, सूची एक की 63, 64, 65 और 66 की प्रविष्टियों तथा सूची तीन की 25 वीं प्रविष्टि के प्रावधानों के साथ संबद्ध है। सूची तीन (समवर्ती सूची), प्रविष्टि 25 मूल रूप में इस तरह दर्ज की गई : श्रम का व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण।
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हथौड़े जैसा प्रहार
63 से 66 तक की प्रविष्टियों में कोई समस्या नहीं थी, क्योंकि ये कुछ नामित संस्थानों, केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा संस्थानों, प्रशिक्षण संस्थानों एवं मानक निर्धारित करने से संबंधित थीं। रचनात्मक व्याख्या के जरिये प्रविष्टियों में सामंजस्य बनाया गया और इस सिद्धांत को बरकरार रखा गया कि शिक्षा राज्य का विषय है।


आकस्मिकता से प्रेरित होकर संसद ने राज्य सूची की 11 वीं प्रविष्टि पर हथौड़ा चलाया। इस प्रविष्टि को उसकी पूर्णता में विलोपित कर दिया गया; और समवर्ती सूची में शामिल 25 वीं प्रविष्टि को फिर से लिखा गया : शिक्षा, जिसमें तकनीकी शिक्षा, मेडिकल शिक्षा और यूनिवर्सिटी शामिल हैं, सूची एक की प्रविष्टियों 63, 64, 65 और 66 के प्रावधानों से संबंधित हैं; श्रम का व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण।

इस हथौड़े ने संघवाद के विचार, राज्यों के अधिकारों और सामाजिक न्याय को ध्वस्त कर दिया। इमरजेंसी-विरोधी योद्धाओं, जिन्होंने 44 वां संविधान संशोधन विधेयक पारित किया था (ताकि 42 वें संसोधन की कथित बुराइयों को खत्म कर सकें), उन्होंने यह भी नहीं विचार किया कि शिक्षा से संबंधित मूल प्रविष्टियों को बहाल रखने की जरूरत है।

ऐतिहासिक रूप में देखें तो राज्यों ने खुद मेडिकल कॉलेज स्थापित किए और निजी व्यक्तियों को भी मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की इजाजत दी। राज्यों ने इन कॉलेजों में विद्यार्थियों के दाखिले को नियंत्रित किया। समय के साथ शिक्षा के मानक और गुणवत्ता में सुधार हुआ। राज्य नियंत्रित इन मेडिकल कॉलेजों से सम्मानित डॉक्टर निकले। तमिलनाडु से निकलने वाले ऐसे डॉक्टरों में तुरंत ही जिनका नाम स्मरण हो आता है, उनमें डॉ. रंगाचारी और डॉ. गुरुस्वामी मुदलियार शामिल हैं, जिनकी मूर्तियां मद्रास मेडिकल कॉलेज के प्रवेशद्वार पर देवदूतों की तरह विद्यमान हैं।

यह स्वीकार किया जाता है कि तमिलनाडु उन राज्यों में से है, जो चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के मामले में सबसे आगे रहा है। उल्लेखनीय यह है कि इन प्रसिद्ध डॉक्टरों (और पूरे देश भर में ऐसे हजारों होंगे) का दाखिला अखिल भारतीय परीक्षा के जरिये नहीं हुआ था। 

राज्यों के अधिकारों को मान्यता देना
राज्यों के अधिकारों पर जोर देने की वजह :  राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेज राज्य के लोगों के पैसे का उपयोग करके स्थापित किए जाते हैं। व्यापक रूप में उनका झुकाव संबंधित राज्य के बच्चों को दाखिला देने और उन्हें अंग्रेजी में चिकित्सा शिक्षा देने में होता है, और समय के साथ राज्य की आधिकारिक भाषा में, जो कि उस राज्य की व्यापक आबादी की भाषा होती है। पढ़कर निकलने वाले डॉक्टरों से अपेक्षा होती है कि वे व्यापक रूप में उस राज्य के लोगों, खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सुरक्षा खेदजनक रूप से अपर्याप्त थीं और हैं, सेवा करें। उनसे अपेक्षा होती है कि वे मरीजों से उन्हीं की भाषा में बात करें, पर्ची लिखें और परामर्श दें। राज्य सरकार के नियमों ने सामाजिक न्याय के मुद्दों को भी संबोधित किया है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, गरीब परिवारों के बच्चों, वंचित वर्गों के बच्चों और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के प्रवेश को प्रोत्साहित किया।

मौजूदा व्यवस्था को लेकर राज्यों, कम से कम तमिलनाडु या महाराष्ट्र और मेरी जानकारी में दक्षिण के राज्यों ने कोई शिकायत नहीं की थी। बेशक, कई गंभीर मसले थे, जिन्हें सुलझाए जाने की जरूरत थी, मसलन कैपिटेशन फीस, अतिरिक्त फीस, खराब गुणवत्ता के उपकरण, अपर्याप्त संबद्ध अस्पताल, अपर्याप्त लेबोरेटरी, लाइब्रेरी, हॉस्टल, और खेल के मैदान की सुविधाएं इत्यादि। ये समस्याएं सतत हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता कि विद्यार्थियों के दाखिले को राज्य नियंत्रित करते हैं या कोई केंद्रीय प्राधिकार।

परेशान करने वाले तथ्य
द नेशनल इलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) की बुनियाद इस पर खड़ी है, कि जब बात उच्च शिक्षा की आती है, वह भी व्यावसायिक संस्थानों में, तब योग्यता एकमात्र मानदंड होना चाहिए (मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट) और यह कि केवल एक सामान्य प्रवेश परीक्षा ही योग्यता-आधारित प्रवेश, निष्पक्षता, पारदर्शिता और गैर-शोषण सुनिश्चित करेगी।

नीट ने भारतीय चिकित्सा परिषद (इसके बाद से यह कलंकित है) द्वारा बनाए गए एक नियम के माध्यम से पहले गुप्त रूप से प्रवेश किया और अब 2016 में भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम की धारा 10 डी में किए गए संशोधन के जरिये इसे शामिल कर लिया गया।

'योग्यता' जैसे विमर्श योग्य मुद्दे पर मैं किसी अन्य दिन बात करूंगा। आज मैं तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों की दाखिला प्रक्रिया पर नीट के कारण पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जस्टिस ए के राजन कमेटी ने जो लिखा, उससे जुड़े तथ्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं।

कृपया अपने आपसे यह सवाल कीजिए : क्या राज्य सरकारों को राज्य के करदाताओं का पैसा खर्च कर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना करनी चाहिए? विद्यार्थियों को मातृभाषा (तमिल) के स्कूलों में क्यों पढ़ना चाहिए? विद्यार्थियों को राज्य स्कूल बोर्ड में अध्ययन क्यों करना चाहिए और स्कूल बोर्ड से परीक्षा देनी चाहिए? कुल मिलाकर राज्य बोर्ड की जरूरत ही क्यों होनी चाहिए? क्या शहरी विद्यार्थी पीएचसी और तालुक स्तर के अस्पतालों में सेवा देंगे?

टेबिल में दिए गए आंकड़े खुद ही बोल रहे हैं। 'योग्यता' के संदिग्ध सिद्धांत के साथ नीट असमानता और अन्याय के युग की शुरुआत कर रहा है।
 
विद्यार्थी नीट से पहले (2016-17)  नीट के बाद (2020-2021)
राज्य बोर्ड द्वारा दाखिल छात्रों की संख्या 98.23% 59.41%
सीबीएसई छात्रों 0.97% 38.84%
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ग्रामीण छात्र 65.17% 49.91%
निजी मेडिकल कॉलेजों में 68.49% 47.14%
तमिल माध्यम के छात्र 14.88% 1.99%
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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