फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Meaning of SBI integration

एसबीआई के एकीकरण का मतलब

Thu, 09 Mar 2017 08:18 AM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Thu, 09 Mar 2017 08:18 AM IST
विज्ञापन
Meaning of SBI integration
जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में सरकार ने घोषित किया है कि भारतीय स्टेट बैंक के पांच सहायक बैंकों का अपने मातृ बैंक में एक अप्रैल, 2017 को विलय कर दिया जाएगा। विलीनीकृत होने वाले ये बैंकें हैं-स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर ऐंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद। यह देश के इतिहास में सबसे बड़ा बैंकिंग एकीकरण होगा। भारत में एसबीआई जैसे बड़े बैंक में सहायक बैंकों के विलय से जहां उद्योग कारोबार व आम आदमी की कर्ज और लागत संबंधी बड़ी जरूरतें पूरी होंगी, वहीं सरकार के वित्तीय समायोजन का लक्ष्य भी पूरा होगा। मजबूत बैंकिंग व्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी। इन पांच सहायक बैंकों के विलय हो जाने पर एसबीआई दुनिया का 44वें क्रम का बड़ा वैश्विक बैंक बन जाएगा। विलय के बाद एसबीआई 37 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्ति के साथ एक बड़ा वैश्विक बैंक हो जाएगा। इसकी शाखाओं की संख्या करीब 22,500 तथा एटीएम की संख्या 58 हजार तथा ग्राहकों की संख्या 50 करोड़ से अधिक हो जाएगी।

विज्ञापन


उल्लेखनीय है कि दुनिया के सबसे बड़े बैंकों की सूची में पहले पायदान पर चाइनीज बैंक आईसीबीसी है, जिसकी कुल परिसंपत्तियां भारत के एसबीआई की नई परिसंपत्ति की तुलना में करीब सात गुना है। वस्तुत: किसी देश की स्थिर बैंकिंग प्रणाली कुछ बड़े बैंक के सहारे खड़ी होती है। ऐसी बैंकिंग प्रणाली ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाईलैंड और मलेशिया जैसे बाजारों में मौजूद है। हाल ही में ग्लोबल क्रेडिट एजेंसी फिच ने बैंकिंग रिपोर्ट में कहा है कि भारत में जहां एक ओर वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देश के सरकारी बैंकों को मिलाकर एक बड़ा बैंक बनाए जाने की डगर आगे बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर डूबते बैंक कर्ज से अर्थव्यवस्था को बचाया जाना जरूरी है। चूंकि अब देश में सबसे बड़े बैंकिंग एकीकरण के लिए सरकार ने मुहर लगा दी है, ऐसे में अब डूबते बैंक कर्ज (एनपीए) से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए रणनीतिक कदम आगे बढ़ाने होंगे। देश के आर्थिक इतिहास में यह पहला ऐसा चिंताजनक परिदृश्य है, जब बैंकों के डूबते हुए कर्ज देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। 31 मार्च, 2016 की स्थिति के अनुसार देश के सरकारी बैंकों के 100 सबसे बड़े फंसे हुए कर्जदारों पर कुल 1.73 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं।
विज्ञापन


उद्योग मंडल एसोचेम की रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2016 के अंत तक बैंकों की कुल दबाव वाली संपत्तियां (एनपीए और पुनर्गठित संपत्तियां) बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई हैं। इस फंसे हुए ऋण ने बैंकों के मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित किया है। वर्ष 2017-18 के नए बजट के तहत वित्तमंत्री ने बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिए जो घोषणाएं की हैं, उनके क्रियान्वयन पर नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ही ध्यान दिया जाना चाहिए। वर्ष 2017-18 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 10,000 करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव किया है और कहा है कि जरूरत पड़ने पर बैंकों में और पूंजी डाली जा सकती है। एनपीए के बोझ से दबे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार की ओर से ज्यादा पूंजी की जरूरत होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


बैंकिंग सुधारों के नए प्रयास देश में बैंकों को मजबूत बनाने और डूबते हुए कर्ज से गंभीर रूप से बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इसके साथ ही बैंकिंग विलय की चुनौतियों पर ध्यान दिए जाने की भी जरूरत है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed