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संजय जोशी की वापसी का मतलब
अवधेश कुमार
Updated Wed, 07 Jan 2015 07:09 PM IST
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किसी एक नेता का किसी राजनीतिक दल से जाना या वापस आना कई बार महत्वपूर्ण नहीं लगता है, पर कई बार उसकी खूब चर्चा भी होती है। दरअसल पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी की विदाई का भाजपा पर कोई असर नहीं पड़ा था। नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा ने केंद्र की सत्ता हासिल की और उसके बाद उसे तीन प्रांतों में विजय भी मिली। मगर राजनीति केवल वोट मिलने और न मिलने तक ही सिमटी नहीं है।
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मई, 2012 में जिस ढंग से नरेंद्र मोदी ने उन्हें लेकर कठोर रुख अपनाया और उन्हें मुंबई कार्यकारिणी से बाहर निकलना पड़ा, उसके बाद से जोशी व्यावहारिक तौर पर पार्टी से बाहर हो गए। ऐसे में, किसी औपचारिक कार्यक्रम में उनके शामिल होने को संगठन के अंदर एक बदलाव के तौर पर देखा जाएगा। खासकर तब, जब वह नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के संघ शिविर में शामिल हों। अगर संघ ने मोदी और संजय जोशी, दोनों को आमंत्रित किया था, तो यह उसके रुख में भी बदलाव का संकेत है। संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि जोशी हमेशा से संघ का हिस्सा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सीडी कांड के बाद उनकी भाजपा में वापसी कराकर फिर उन्हें एक प्रकार से बाहर किए जाने के बाद से संघ खामोश ही रहा है। लिहाजा संघ का मुंह खोलना बड़े बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत ही माना जाएगा।
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फिलहाल यह देखना बाकी है कि इस बदलाव की आखिर कैसी परिणति होगी। मगर यह कहना गलत नहीं कि मोदी और जोशी के बीच मतभेद में गलतफहमी की भूमिका ज्यादा थी। इस समय भले ही मोदी के पक्ष में लहर चल रही हो, मगर तब उनके समर्थक भी उनके उस व्यवहार को सही नहीं मानते थे। उस समय मोदी राष्ट्रीय नेतृत्व में आना चाहते थे, और उन्हें यह लगता था कि जोशी उसमें बाधा बन सकते हैं। मगर सच यही है कि संजय जोशी किसी के लिए खतरा बनने वाले व्यक्तित्व नहीं रहे। जून, 2005 में उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी से पार्टी अध्यक्ष पद से त्यागपत्र अवश्य लिया था, पर वह उनके पाकिस्तान दौरे में मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ में दिए गए बयान की प्रतिक्रिया में पार्टी एवं संघ का निर्णय था।
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बहरहाल, जोशी भले ही भाजपा से औपचारिक तौर पर बाहर हो गए थे, पर वह हमेशा सक्रिय रहे। उनसे मिलने वालों में केवल भाजपा ही नहीं, संघ एवं उसके आनुषांगिक संगठनों के लोग भी होते थे। एक अघोषित प्रभुत्व उनका हमेशा रहा है। यह वाकई दिलचस्प है कि बिना किसी पद पर रहते हुए और इस समय के भाजपा के शीर्षतम नेता का विरोधी घोषित किए जाने तथा संघ की खामोशी के बावजूद वह पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की नजर में महत्वहीन नहीं हुए। और यही वह पहलू है, जिसमें वर्तमान राजनीति के संदर्भ में इस पूरे प्रकरण का महत्व समाहित है।
लिहाजा अगर संजय जोशी की भाजपा में वापसी होती है, तो यह केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं होगी। बेशक उनके पीछे किसी पूंजीपति का हाथ नहीं है, सत्ता के गलियारों में कुछ स्थायी चेहरों में भी वह नहीं आते, और न ही कोई ऐसा जातीय समीकरण खुद में समेटे हुए हैं, जिनसे वोट प्रभावित होता हो। मगर उनका लौटना एक कार्यकर्ता को महत्व मिलने जैसा होगा। पर अभी यह सवाल शेष है कि संघ उन्हें लेकर आगे क्या करता है।