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पश्चिम बंगाल में वाम समर्थक होने का मतलब

Thu, 20 Mar 2014 07:40 PM IST
सुभाषिनी अली
सुभाषिनी अली Updated Thu, 20 Mar 2014 07:40 PM IST
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Meaning of left supporter in west bengal

फरवरी के छोटे से माह का आखिरी दिन मेंरे लिए बहुत लंबा गुजरा। उस दिन मुझे बताया गया कि पश्चिम बंगाल के हमारे पार्टी नेताओं ने फैसला कर लिया था कि मुझे बैरकपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहिए। यह सुनकर मैं सकते में आ गई। लेकिन चूंकि मेरा मानना है कि वाम ताकतों का मजबूत होना देश की सबसे बड़ी जरूरत है, मैं तैयार हो गई। बैरकपुर का नाम देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम और मंगल पांडे की शहादत से जुड़ा हुआ है। इस बात से मुझे काफी प्रेरणा मिली और हिम्मत भी।

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अगले कुछ हफ्तों में मैं पाठकों के साथ, चुनाव अभियान की कुछ झलकियां बांटने की कोशिश करूंगी। आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं कोलकाता पहुंची। वहां विशाल जुलूस में शामिल होने का मुझे मौका मिला। मुझे लगा कि इस दिन का बंगाल की महिलाओं के लिए एक अलग महत्व है। तीन-चार साल पहले तक यह राज्य महिलाओं और लड़कियों के सबसे ज्यादा सुरक्षित समझा जाता था। सड़क पर, बस, ट्रेन या ट्राम के अंदर, कहीं भी अगर किसी लड़की या महिला के साथ बदतमीजी या छेड़छाड़ की कोई जुर्रत करता था, तो आम लोग आगे बढ़कर उसका विरोध करते और पीड़ित पक्ष का पूरा साथ देते थे। राजनीतिक परिवर्तन के साथ बहुत कुछ बदल गया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आज का पश्चिम बंगाल महिलाओं और लड़कियों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित हो गया है। हाल के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, दिल्ली के बाद कोलकाता में लड़कियां और महिलाएं अपने आप को सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करती हैं। निश्चित तौर पर हमारे अभियान का एक बड़ा मुद्दा महिलाओं की सुरक्षा है और इसकी शुरुआत अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शुभ अवसर पर होना बहुत उचित है।
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अपने चुनाव क्षेत्र में मैं एक बंगाली परिवार के साथ उनके श्यामनगर स्थित घर में रह रही हूं। यहां आने के बाद मुझे आमडांगा विधानसभा क्षेत्र के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला। यहां की महिलाओं ने मुझे और अन्य साथियों को देखते ही घेर लिया और उनके साथ हुए पुलिस की बदतमीजी के बारे में बताने लगी। उन्होंने अपने घरों के सामने पड़ा घर का तमाम सामान भी दिखाया, जो पुलिस वालों ने बाहर फेंक दिया था। कइयों को गंदी गालियां और कुछ को मार भी बर्दाश्त करनी पड़ी थीं। उनका कहना था कि यह सब उनके साथ इसलिए हुआ है, क्योंकि वे लाल झंडे के समर्थक हैं। हम लोगों के वहां जाने और मीडिया द्वारा पूरे मामले को सामने लाने के बाद यह उत्पीड़न बंद हुआ। लेकिन यह घटना पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हकीकत से मेरा पहला परिचय थी। 16 मार्च को दोल यानी बंगाल की होली थी। मेरे साथ घर की छोटी बच्ची शायोनी (सियानी) गुलाल भरी कटोरी लेकर घर से निकली। यह इलाका ग्राम पंचायत का हिस्सा है और ग्रामीण माहौल और मोहल्लेदारी अभी यहां बाकी है। काफी लोग साथ हो लिए। गांव भर में घूमने का मजेदार मौका मिला और बचपन की होली याद आ गई, जब बड़े-छोटे आदमियों के साथ औरतें भी टोली बनाकर मोहल्ले में घूमकर सबके साथ होली खेलती थीं। श्यामनगर की गलियों में लग रहा था कि मैं अपने घर में ही होली खेल रही हूं।
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17 मार्च को पहले माणिकतल्ला के बंगाली परिवारों से मिली। यहां दोल के साथ होली भी मनाई जाती है। लेकिन लिहाज भी बरता जाता है। इसके बाद हम कांकीनारा गए, जहां बड़ी संख्या में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर रहते हैं। वहां तो ढोल, फाग, होरी और जबर्दस्त रंग चल रहा था। मिठाइयां बांटी जा रही थीं और भोजपुरी की मिठास से माहौल भरा हुआ था। राजनीतिक चर्चा जारी थी कि इस बार लाल रंग का बाजार गर्म है।

(लेखिका माकपा नेत्री हैं)

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