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सीमा विवाद से निपटने को नया तंत्र
Mon, 08 Jun 2020 07:58 AM IST
संजीव कुमार झा
मारूफ रजा
मारूफ रजा
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Mon, 08 Jun 2020 07:58 AM IST
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india china flag
- फोटो : social media
भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जारी विवाद को सुलझाने के लिए शनिवार को दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच लद्दाख की सीमा के पास एक अहम बैठक हुई। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, यह बैठक काफी सकारात्मक माहौल में हुई और दोनों ही पक्ष सीमा पर मौजूदा हालात को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने पर सहमत हुए। द्विपक्षीय बैठकों में दरअसल इसी तरह शांतिपूर्ण ढंग से विवादों को हल करने पर सहमति जताई जाती है, लेकिन चीन जमीनी स्तर पर कुछ और ही करता है।
ऐसे में, चीन से कैसे निपटा जाए! दरअसल यह ताजा विवाद तब शुरू हुआ, जब चीन की सेना ने एलएसी से सटे लद्दाख के तीन स्थानों और सिक्किम में एक स्थान पर घुसपैठ की। इस घटना ने भारत को हैरान कर दिया, जैसा कि 1999 में कारगिल में पाकिस्तान ने किया था, क्योंकि चीन ऐसा करके बातचीत के जरिये भारत से फायदा उठाना चाहता है। यही वजह है कि उच्च स्तरीय वार्ता के बावजूद चीन मई से पहले की स्थिति पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं हुआ था। चीन बार-बार ऐसा कदम क्यों उठा रहा है? पहली बात तो यह है कि कोविड-19 मामले में चीन की बड़ी फजीहत हो रही है, जिससे वह ध्यान हटाना चाह रहा है।
हांगकांग की स्थिति ने भी चीनी नेतृत्व को स्थानीय लोगों और प्रवासी चीनियों की नजर में बुरा बना दिया है। इन सबसे ध्यान हटाने के लिए चीनी नेतृत्व को दक्षिण चीन सागर में या भारत के साथ अनसुलझी सीमा विवाद को तूल देने के लिए ऐसी हरकत करने की जरूरत महसूस हुई। भारत का अमेरिका के पाले में खिसकना और क्वाड देशों का आपस में मजबूत संबंध बनाना भी, जिसमें अमेरिका और भारत के अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, चीन को खटक रहा है।
दूसरी बात, चीन लंबे समय से सीमा पर अधिक से अधिक क्षेत्र को हड़पना चाहता है, ताकि तिब्बत के सिनचियांग से ल्हासा में काशगर को जोड़ने वाले राजमार्ग 219 पर मजबूत पकड़ बना सके। पश्चिमी चीन के दो सीमा क्षेत्र वास्तव में उसकी दुखती रग हैं और दोनों ही राज्य प्रायोजित क्रूरता से पीड़ित हैं। चीन गलवां नदी के उत्तर (जहां उसने अभी डेरा डाला है) से लेकर काराकोरम दर्रे तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है।
काराकोरम दर्रे में उसने शक्सगाम घाटी तक एक प्रमुख सड़क मार्ग का निर्माण किया है, जो 1963 से उसके कब्जे में है, क्योंकि पाकिस्तान ने यह हिस्सा चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को मजबूत बनाने के लिए चीन को दे दिया था, जो अब पाकिस्तान की प्रमुख कूटनीतिक जीवन-रेखा है।
तीसरी बात, चीन हमेशा से लद्दाख क्षेत्र में अधिक जल संसाधनों की तलाश कर रहा है, क्योंकि सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है और लद्दाख होते हुए पाकिस्तान के उत्तरी इलाके में जाती है। चीन इस क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा पानी हासिल करना चाहता है, क्योंकि उसे माइक्रो चिप बनाने के लिए पानी की प्रचुर मात्रा में आवश्यकता है। वह सिंधु नदी का पानी पाना चाहता है और उम्मीद है कि पाकिस्तान अपने भू-राजनीतिक व आर्थिक जरूरतों के लिए उसे वह दे सकता है। 2018 में चीन ने अमेरिका, जापान और ताइवान से 230 अरब डॉलर के माइक्रो चिप आयात किए थे।
वह सिंधु नदी के ताजा पानी और शक्सगाम घाटी में ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न पानी से खुद माइक्रो चिप बनाना चाहता है। चीन ने 1950 के दशक से कश्मीर के पानी पर नजर रखनी शुरू कर दी थी, और इसलिए उसने 1954 में अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। अब चीन पाक अधिकृत कश्मीर में पांच प्रमुख बांधों को वित्तीय सहायता देने के लिए सहमत हुआ है। इलाके में घुसपैठ की ये ताजा घटनाएं उसी आशंकाओं का संकेत देती हैं, क्योंकि नदी घाटी (जैसे गलवां घाटी, जहां उसने अभी अपने तंबू लगाए हैं) दोनों तरफ ऊंचे पहाड़ों की वजह से आम तौर पर सुरक्षित है।
वहां से घुसपैठियों पर गोलीबारी करके हम अच्छी तरह से बचाव कर सकते हैं। पर भारतीय अधिकारियों ने अतीत की तरह चीनी घुसपैठ पर कूटनीतिक बातचीत करने और प्रार्थना करने का ढर्रा अपनाया है! यदि चीनी हमारे सैनिकों को धमकाते हैं और बेहद कष्टप्रद स्थितियों में काम करने वाले हमारे निहत्थे सीमा सड़क कर्मचारियों को क्षति पहुंचाते हैं, तो बीजिंग से बातचीत करना और सब कुछ सामान्य होने की घोषणा करना हमारी मानक प्रक्रिया नहीं हो सकता।
तथ्य यह है कि भारत ने चीन के मोर्चे पर दशकों से सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया है, जिसके पीछे सोच यह है कि सीमा पर खराब सड़कें चीन को 1962 जैसा आक्रमण करने से रोकेंगी! पर तब से अब तक काफी कुछ बदल गया
है। भारत की सेना 1962 की सेना नहीं है, जिसे चीन ने परास्त किया था।
हालांकि हैंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट, जिसमें 1962 में केवल सैन्य तबाही के कारणों को देखा गया (राजनीतिक विफलता को नहीं) देश का सबसे अच्छा सार्वजनिक रहस्य है, और यह रिपोर्ट साउथ ब्लॉक में रखी है। हमारे जनरलों ने उस तक पहुंच बनाई है और उससे काफी सबक सीखा है। इसलिए 1967 में नाथूला में भारत ने सख्त रुख अपनाया, और फिर 1987 में चीन द्वारा सोमडुरुंग में चीनी घुसपैठके बाद जनरल सुंदरजी के नेतृत्व तेजी से कदम उठाया गया। दोनों मामलों में चीन को पीछे हटना पड़ा था।
आज जब हम केवल यह उम्मीद कर सकते हैं कि चीन स्वीकृत एलएसी से पीछे हट जाएगा, हमें दोकलम गतिरोध (72 दिन) या उससे ज्यादा के लिए भी तैयार रहना पड़ सकता है। वजह यह है कि चीनी नेतृत्व अपनी छवि खराब नहीं करना चाहेगा। इसलिए कूटनीतिक माध्यम से बात करने और शांति बहाल करने का हमारा नजरिया हमें शायद ही कहीं ले जाए, खासकर लद्दाख मोर्चे पर सीमा विवाद हल करने के मामले में, क्योंकि कौन-सी सीमा स्वीकारनी है, इसे लेकर अलग-अलग नजरिया है।
बाईस बार बातचीत करने के बाद भी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं, ऐसे में, एक नया तंत्र बनाने का वक्त है, जिसमें सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों के लोग भी शामिल हों, जो लद्दाख का दौरा कर चीन के साथ बातचीत को आगे बढ़ाएं। अगर तब भी सीमा विवाद का हल नहीं होता है, तब शायद हमें दूसरे विकल्प के बारे में सोचना पड़े।
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ऐसे में, चीन से कैसे निपटा जाए! दरअसल यह ताजा विवाद तब शुरू हुआ, जब चीन की सेना ने एलएसी से सटे लद्दाख के तीन स्थानों और सिक्किम में एक स्थान पर घुसपैठ की। इस घटना ने भारत को हैरान कर दिया, जैसा कि 1999 में कारगिल में पाकिस्तान ने किया था, क्योंकि चीन ऐसा करके बातचीत के जरिये भारत से फायदा उठाना चाहता है। यही वजह है कि उच्च स्तरीय वार्ता के बावजूद चीन मई से पहले की स्थिति पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं हुआ था। चीन बार-बार ऐसा कदम क्यों उठा रहा है? पहली बात तो यह है कि कोविड-19 मामले में चीन की बड़ी फजीहत हो रही है, जिससे वह ध्यान हटाना चाह रहा है।
हांगकांग की स्थिति ने भी चीनी नेतृत्व को स्थानीय लोगों और प्रवासी चीनियों की नजर में बुरा बना दिया है। इन सबसे ध्यान हटाने के लिए चीनी नेतृत्व को दक्षिण चीन सागर में या भारत के साथ अनसुलझी सीमा विवाद को तूल देने के लिए ऐसी हरकत करने की जरूरत महसूस हुई। भारत का अमेरिका के पाले में खिसकना और क्वाड देशों का आपस में मजबूत संबंध बनाना भी, जिसमें अमेरिका और भारत के अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, चीन को खटक रहा है।
दूसरी बात, चीन लंबे समय से सीमा पर अधिक से अधिक क्षेत्र को हड़पना चाहता है, ताकि तिब्बत के सिनचियांग से ल्हासा में काशगर को जोड़ने वाले राजमार्ग 219 पर मजबूत पकड़ बना सके। पश्चिमी चीन के दो सीमा क्षेत्र वास्तव में उसकी दुखती रग हैं और दोनों ही राज्य प्रायोजित क्रूरता से पीड़ित हैं। चीन गलवां नदी के उत्तर (जहां उसने अभी डेरा डाला है) से लेकर काराकोरम दर्रे तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है।
काराकोरम दर्रे में उसने शक्सगाम घाटी तक एक प्रमुख सड़क मार्ग का निर्माण किया है, जो 1963 से उसके कब्जे में है, क्योंकि पाकिस्तान ने यह हिस्सा चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को मजबूत बनाने के लिए चीन को दे दिया था, जो अब पाकिस्तान की प्रमुख कूटनीतिक जीवन-रेखा है।
तीसरी बात, चीन हमेशा से लद्दाख क्षेत्र में अधिक जल संसाधनों की तलाश कर रहा है, क्योंकि सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है और लद्दाख होते हुए पाकिस्तान के उत्तरी इलाके में जाती है। चीन इस क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा पानी हासिल करना चाहता है, क्योंकि उसे माइक्रो चिप बनाने के लिए पानी की प्रचुर मात्रा में आवश्यकता है। वह सिंधु नदी का पानी पाना चाहता है और उम्मीद है कि पाकिस्तान अपने भू-राजनीतिक व आर्थिक जरूरतों के लिए उसे वह दे सकता है। 2018 में चीन ने अमेरिका, जापान और ताइवान से 230 अरब डॉलर के माइक्रो चिप आयात किए थे।
वह सिंधु नदी के ताजा पानी और शक्सगाम घाटी में ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न पानी से खुद माइक्रो चिप बनाना चाहता है। चीन ने 1950 के दशक से कश्मीर के पानी पर नजर रखनी शुरू कर दी थी, और इसलिए उसने 1954 में अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। अब चीन पाक अधिकृत कश्मीर में पांच प्रमुख बांधों को वित्तीय सहायता देने के लिए सहमत हुआ है। इलाके में घुसपैठ की ये ताजा घटनाएं उसी आशंकाओं का संकेत देती हैं, क्योंकि नदी घाटी (जैसे गलवां घाटी, जहां उसने अभी अपने तंबू लगाए हैं) दोनों तरफ ऊंचे पहाड़ों की वजह से आम तौर पर सुरक्षित है।
वहां से घुसपैठियों पर गोलीबारी करके हम अच्छी तरह से बचाव कर सकते हैं। पर भारतीय अधिकारियों ने अतीत की तरह चीनी घुसपैठ पर कूटनीतिक बातचीत करने और प्रार्थना करने का ढर्रा अपनाया है! यदि चीनी हमारे सैनिकों को धमकाते हैं और बेहद कष्टप्रद स्थितियों में काम करने वाले हमारे निहत्थे सीमा सड़क कर्मचारियों को क्षति पहुंचाते हैं, तो बीजिंग से बातचीत करना और सब कुछ सामान्य होने की घोषणा करना हमारी मानक प्रक्रिया नहीं हो सकता।
तथ्य यह है कि भारत ने चीन के मोर्चे पर दशकों से सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया है, जिसके पीछे सोच यह है कि सीमा पर खराब सड़कें चीन को 1962 जैसा आक्रमण करने से रोकेंगी! पर तब से अब तक काफी कुछ बदल गया
है। भारत की सेना 1962 की सेना नहीं है, जिसे चीन ने परास्त किया था।
हालांकि हैंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट, जिसमें 1962 में केवल सैन्य तबाही के कारणों को देखा गया (राजनीतिक विफलता को नहीं) देश का सबसे अच्छा सार्वजनिक रहस्य है, और यह रिपोर्ट साउथ ब्लॉक में रखी है। हमारे जनरलों ने उस तक पहुंच बनाई है और उससे काफी सबक सीखा है। इसलिए 1967 में नाथूला में भारत ने सख्त रुख अपनाया, और फिर 1987 में चीन द्वारा सोमडुरुंग में चीनी घुसपैठके बाद जनरल सुंदरजी के नेतृत्व तेजी से कदम उठाया गया। दोनों मामलों में चीन को पीछे हटना पड़ा था।
आज जब हम केवल यह उम्मीद कर सकते हैं कि चीन स्वीकृत एलएसी से पीछे हट जाएगा, हमें दोकलम गतिरोध (72 दिन) या उससे ज्यादा के लिए भी तैयार रहना पड़ सकता है। वजह यह है कि चीनी नेतृत्व अपनी छवि खराब नहीं करना चाहेगा। इसलिए कूटनीतिक माध्यम से बात करने और शांति बहाल करने का हमारा नजरिया हमें शायद ही कहीं ले जाए, खासकर लद्दाख मोर्चे पर सीमा विवाद हल करने के मामले में, क्योंकि कौन-सी सीमा स्वीकारनी है, इसे लेकर अलग-अलग नजरिया है।
बाईस बार बातचीत करने के बाद भी हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं, ऐसे में, एक नया तंत्र बनाने का वक्त है, जिसमें सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों के लोग भी शामिल हों, जो लद्दाख का दौरा कर चीन के साथ बातचीत को आगे बढ़ाएं। अगर तब भी सीमा विवाद का हल नहीं होता है, तब शायद हमें दूसरे विकल्प के बारे में सोचना पड़े।