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गांव कब बनेंगे जवाबदेह

Tue, 03 Dec 2019 08:27 AM IST
आर विक्रम सिंह आर विक्रम सिंह
आर विक्रम सिंह Published by: आर विक्रम सिंह Updated Tue, 03 Dec 2019 08:27 AM IST
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When will the villages become accountable
ग्रामीण भारत - फोटो : a

एक बार प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में कहा था कि हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी के 70 साल बाद ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार देने के लिए हम उन्हें गड्ढे खोदने के काम पर लगा रहे हैं। प्रश्न यह है कि हमारे गांवों में काम क्यों नहीं है। ट्रैक्टर नहीं आए थे, तो गाय-बैल थे, हलवाहे थे, बैलगाड़ी थी, गोबर की खाद थी। अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी। रोजगार था, श्रम था। हां, शोषण भी था। वर्ष 1952 में भूमि का पुनर्वितरण, प्रबंधन हमारी प्राथमिकताओं में था, पर भूमि का विषय राज्य सूची में डाल दिया गया। अगर केंद्र और राज्य की संयुक्त सूची में भी इसे डाला गया होता, तो भूमि सुधार नीतियां राष्ट्रीय स्तर पर बनतीं। नए भूमि कानूनों के लागू होते ही टेनैंसी कानून, सीलिंग, चकबंदी के मुकदमों की बाढ़ आ गई।


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भूमि सुधारों में ग्रामों को कोई भूमिका नहीं दी गई। पीढ़ियां खत्म हुई, मुकदमे नहीं। जमींदारों, भूस्वामियों की जमीन काश्तकारों को मिली, पट्टे हुए। स्थिति यह बनी कि खेत भी हैं, मजदूरी भी कर रहे है। मात्र भूमि ही पर्याप्त नहीं, पूंजी भी चाहिए। 1952 के भूमि सुधारों ने ग्रामीण भारत में रोजगार का पहला संकट पैदा किया। बड़े खेतिहर नगरोन्मुख होने लगे। जमींदारी के खात्मे के बाद भूमि संबंधी मुकदमों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संकट पैदा किया। गरीब आदमी जमींदार के भी गरीब होने पर खुश तो हुआ, पर इससे उसकी बेहतरी के रास्ते नहीं बने। इन विवादों के कारण हरित क्रांति का जो लाभ मिलना था, वह नहीं मिल सका। यही भूमि सुधार यदि देशव्यापी होता, विवादों का तात्कालिक समाधान होता, तो हरित क्रांति का दौर पहले आ जाता।

जमींदारी के खात्मे के बाद दो प्रकार के किसान रह गए थे। एक तो वे लोग, जिनकी  जोत 12 से   20 एकड़ के बीच थी। दूसरे, अधिकतम 2.5 एकड़ के छोटे भूमिधर व पट्टेदार। हमें अपनी कृषि तकनीक इन्हीं दो तरह की जोतों को केंद्र में रख विकसित करनी थी। हमारे सामने एक उदाहरण जापान का था, जहां जोत का औसत आकार 3.5 एकड़ का है। दूसरा अमेरिकी, जहां औसत फार्म का आकार करीब 450 एकड़ का है। भारतीय कृषि में  जापान के छोटे कृषि उपकरण और पावर टिलर आधारित कृषि तकनीक ही उपयोगी होनी थी। बड़े अमेरिकी ट्रैक्टरों के बजाय जापानी तकनीक को हमारे कृषि परिवेश में ढाला जाता, तो कृषि रोजगार में कमी न आती और उत्पादकता बढ़ती। पर हम बड़े ट्रैक्टरों की उस अमेरिकी तकनीक की ओर चले गए, जहां मात्र दो प्रतिशत आबादी खेती करती है। परिणाम सामने है। 67 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के बावजूद अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत और विकास दर 2.1 फीसदी रह गई है। जो किसान  छोटी जोतों के मालिक थे, उनके लिए मात्र कृषि पर जीवित रह पाना संभव नहीं था, और पशुपालन परंपरागत जातीय जीविकोपार्जन का साधन बना रहा। जाहिर है कि कृषि अर्थव्यवस्था संरचनात्मक बदलाव की मांग कर रही थी।

सरकार के समाजवादी प्रयोगों से स्थिति विषम होनी शुरू हुई। हमारी समस्या निम्न उत्पादकता की थी। अनाज का आयात हो रहा था। सिंचाई सुविधाओं ने छोटी जोतों के पंजाब-हरियाणा का नक्शा बदला, पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश अछूते रहे। सहकारिता आंदोलन गुजरात, महाराष्ट्र की कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जबर्दस्त योगदान करता है, पर गंगा घाटी के प्रदेशों में यह राजनीति, सामंती, दबाव जातिगत सोच के आगे बेबस हो जाता है। आज कृषि बेरोजगारी की भीषण समस्या है। जब देश भर में इंजीनियरिंग और प्रबंधन कॉलेज खुल रहे थे, तो यह नहीं सोचा गया कि कृषि, पशुपालन, उद्यानीकरण, मधुमक्खी, मुर्गी, बकरी, शूकर पालन के भी ऐसे डिग्री डिप्लोमा विद्यालय खोले जाएं, जो किसान युवकों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करें। कभी सोचा नहीं कि सहकारिता को भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विषय के रूप में पढ़ाया जाए। कृषि मंडी व्यवस्था पर क्या कोई डिप्लोमा कोर्स है? हमने कृषि अर्थव्यवस्था के विविधीकरण की संभावनाओं पर दृष्टिपात ही नहीं किया। हमारे गांव क्रमशः शहरों को श्रम आपूर्ति करने वाले डिपो बन गए।

हमारी कृषि की समस्या न ऋण की है, न उपज मूल्य की, न उपज का बीमा कराने की। मंडी व्यवस्था गांव के किसानों, उनके संगठनों के प्रभावी नियंत्रण में हो, तो कृषि उपज के मूल्यों की समस्या नियंत्रण में आ जाएगी और दलाल खत्म हो जाएंगे। मैं बरेली में जिलाधिकारी था। किसानों से दाल खरीद की सरकारी योजना में मंडी से खरीद कर फर्जी किसानों के नाम से नाफेड को दाल आपूर्ति कर दी गई। पता चला, तो भुगतान रोक दिया गया। एफआईआर हुई और जांच चल रही है। जो दाल नाफेड को किसानों के नाम से 5,400 रुपये क्विंटल बेची गई, वह व्यापारियों ने किसानों से 1,800 से 2,400 रुपये क्विंटल पर खरीदी थी। यह तो हमारी सहकारी संस्थाओं का हाल है। श्रावस्ती में मैंने प्रत्येक ग्रामसभा से पिछले पांच साल में कराए गए कार्यों की सूची मांगी, तो जैसे स्यापा फैल गया। लगातार पत्राचार के बाद जब छिटपुट सूचनाएं ही आईं, तो हर ग्रामसभा के खाते का बैंकों से विवरण मंगाकर ग्राम प्रधानों द्वारा निकाली गई धनराशि का हिसाब मांगा जाने लगा। सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधिगण लामबंद हो तत्कालीन मुख्यमंत्री के यहां जा पहुंचे कि यह तो चुनाव ही हरवा देंगे। इन्हें हटाया जाए।

टीवी स्टुडियो और सेमिनारों में ग्रामीण भारत की समस्याओं पर चर्चा करने वाले विशेषज्ञ और एनजीओ इन जमीनी सच्चाइयों से बहुत दूर हैं। उन्होंने कृषि ऋण, फसली बीमा, उपज का उचित मूल्य आदि कुछ जुमले रट लिए हैं। क्या किसी गांव को खुद मालूम है कि वहां कितने बेरोजगार हैं, कितनी भूमि परती है, कितने कर्जदार हैं, कितने मुकदमे हैं और पशुओं का क्या किया जाए? जब तक ग्राम को केंद्र में लाकर आर्थिक विकास का खाका नहीं बनाया जाएगा, हमारा ग्रामीण भारत न उठेगा, न जिम्मेदार बनेगा। संसाधनों के जिम्मेदार प्रधानों और ग्राम अधिकारियों की जिम्मेदारी नियत करनी जरूरी है। लेकिन जात-पांत, प्रधानी के चुनावी गणित और लाभार्थियों की सूची में उलझे हमारे गांवों को इस सबकी फुरसत भी कहां है?

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