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अच्छे कामों पर भी पानी फिरा
नीरजा चौधरी (वरिष्ठ पत्रकार)
Updated Tue, 21 May 2013 09:29 PM IST
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सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली जिस सरकार ने अपनी पहली पारी में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की थी, वह दूसरी पारी में अलोकप्रिय साबित हो चुकी है।
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सच यह है कि दूसरी पारी में सामने आए घोटालों और सरकार की अक्षमता ने उसके अच्छे कामों पर भी पानी फेर दिया। संप्रग की पहली सरकार से लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, लेकिन उसने कई अच्छे कदम उठाए थे।
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उसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी था कि प्रधानमंत्री पद ठुकराकर सोनिया गांधी ने बलिदान वाली एक छवि गढ़ी और देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री दिया, जिसकी छवि साफ थी। मनमोहन सिंह गैर-राजनीतिक व्यक्ति थे और उन्हें आर्थिक सुधारों के जनक के रूप में जाना जा रहा था।
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इसी कारण सोनिया और मनमोहन की स्वीकार्यता बढ़ी। साथ ही, यह भी लगा कि सत्ता के दो केंद्रों का यह एक बेहतरीन संतुलन है। इसके अलावा सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और सहयोगी वाम दलों ने सरकार को कई मोर्चों पर बेलगाम नहीं होने दिया।
सरकार की ओर से अधिकार संबंधी कानूनों की शृंखला- मसलन, सूचना का अधिकार, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार- आदि से यूपीए की आम आदमी की हितैषी वाली छवि बनी। इसी का नतीजा था कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 200 पार कर गया।
पर, दूसरी पारी में भ्रष्टाचार के मामले सामने आने शुरू हुए, तो रुकने का नाम नहीं ले रहे। इन घोटालों में रुपयों का आंकड़ा इतना ज्यादा है कि लोग उस संख्या को सोचकर अवाक रह जाते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने की तो बात दूर, यह सरकार उससे उपजे जनाक्रोश को भी समझने में नाकाम रही।
सिविल सोसाइटी और मीडिया की सक्रियता से कुछ मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा, पर इन कलंक कथाओं ने सरकार की छवि को मटियामेट करने में बड़ी भूमिका निभाई।
इसके अलावा कुछ नेताओं और मंत्रियों की तरफ से कैग को निशाना बनाना सरकार की खीझ का ही प्रदर्शन था। सेहत की वजह से सोनिया गांधी दूसरी पारी में भले ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं, पर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार मामले के कारण उन्हें भी रक्षात्मक होना पड़ा।
कहा यह जा रहा था कि 2012 तक राहुल गांधी सत्ता संभाल लेंगे और मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति भवन भेज दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
राहुल गांधी की अनिच्छा के कारण कांग्रेस के भीतर कई नेताओं को लगने लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका मिल सकता है। इससे अंदरखाने की जंग तेज हो गई।
प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद सरकार में प्रधानमंत्री का कद तेजी से बढ़ा। पिछले साल मंत्रिपरिषद में हुए बदलावों से यह बात स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार मनमोहन सिंह की पसंद थे।
पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रणब मुखर्जी जैसे अनुभवी नेता के राष्ट्रपति भवन पहुंचने के बाद यह सरकार कई मोर्चों पर बेहद असहाय नजर आई है।
इन सबके बीच सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ी है, जो सकारात्मक साबित हो सकती है। पर इसे पारित करवाने में सिर्फ विपक्ष का ही अड़ंगा नहीं है, बल्कि सरकार के भीतर भी एक धड़ा इसके खिलाफ है।
पिछले दिनों पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सत्ता के दो केंद्र नहीं होने चाहिए। यह इसका संकेत है कि पार्टी के कुछ लोग चाहते हैं कि राहुल को हर हाल में गद्दी संभाल लेनी चाहिए, जिसके लिए वह अभी तैयार नहीं हैं। यूपीए के नौ साल पूरे होने के बाद एक बार फिर सोनिया गांधी को ही उसकी अगुवाई करनी पड़ रही है।
संसद में उनकी सक्रियता से यह स्पष्ट है कि अगले चुनाव में पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में जनता के बीच जाएगी। हां, यह जरूर लग रहा है कि इस बार कांग्रेस प्रधानमंत्री के रूप में किसी चेहरे को प्रस्तुत करने की जगह पार्टी को ही सामने रखेगी।