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मणिपुर हिंसा: वेरियर को पढ़ने और समझने की जरूरत, सरकार की उदासीनता और युवाओं के सरोकार

Sun, 27 Aug 2023 07:42 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 27 Aug 2023 07:42 AM IST
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सार
मणिपुर आज अगर जल रहा है, तो इसके जिम्मेदार वेरियर एल्विन नहीं, बल्कि सरकारों की उदासीनता है। युवाओं को अगर व्हाट्सऐप से फुर्सत मिले, तो उन्हें वेरियर पर लिखी पुस्तकों को पढ़ना चाहिए, तभी वे समझ पाएंगे कि आज किस तरह तथ्यों व संदर्भों के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
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Manipur violence truth about Verrier Elwin and Northeast
Verrier Elwin - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मई के पहले हफ्ते में मणिपुर में नस्लीय हिंसा शुरू होने के तुरंत बाद मुझे सोशल मीडिया पर किए जा रहे एक दावे के बारे में कई सवाल मिले। सोशल मीडिया पर यह दावा दरअसल, काफी चर्चित हो रहा है कि ‘नेहरू ने ईसाई मिशनरी वेरियर एल्विन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के मुताबिक, हिंदू साधुओं का नगालैंड में प्रवेश वर्जित किया गया था। नतीजा यह हुआ कि नेहरू के शासन में नगालैंड ईसाई बहुल हो गया। आज भी नगालैंड में 88 फीसदी ईसाई हैं।‘



कई साल पहले 1999 में मेरे द्वारा लिखी गई वेरियर एल्विन की जीवनी प्रकाशित हुई थी, यही वजह रही कि मुझे सूचनाएं पहुंचाने वालों ने यह जानकारी मुझ तक पहुंचाना जरूरी समझा। मैंने यह कहते हुए इसका जवाब दिया कि आजादी के बाद हुए नगा विद्रोह के चलते वहां लोगों के प्रवेश को हतोत्साहित करने की कोशिश की गई थी। और, नगालैंड या किसी अन्य मुद्दे को लेकर वेरियर एल्विन के साथ नेहरू का कोई समझौता नहीं हुआ था। फिर, नगा पहाड़ियों में ईसाई मिशनरियों की सक्रियता नेहरू और एल्विन के जन्म से काफी पहले 1870 के दशक से रही है। मैंने यह भी कहा कि एल्विन ईसाई मिशनरियों पर उतना ही अविश्वास करते थे, जितना कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर। वह चाहते थे कि आदिवासी हिंदू या ईसाई बनने के बजाय अपनी रीतियों व विश्वासों पर कायम रहें।


व्हाट्सऐप पर प्रचारित होने वाले झूठे दावों की पोल खोलने के लिए अमूमन मैं इस सार्वजनिक मंच का उपयोग नहीं करता। लेकिन, अब अगर मणिपुर के मुद्दे पर मैं ऐसा कर रहा हूं, तो इसकी तीन वजहें हैं। पहली वजह है कि ऑनलाइन दुनिया में वेरियर एल्विन के बारे में सिर्फ नेहरू के साथ काल्पनिक समझौता ही नहीं, बल्कि कई दूसरे झूठ भी फैलाए जा रहे हैं। उत्तर-पूर्वी भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में अगर एल्विन के सक्रिय होने की बात की जा रही है, तो इसका मतलब है कि मणिपुर के ज्यादातर हिंदू आबादी वाले मैतेई और ज्यादातर ईसाई आबादी वाले कुकी समुदायों के बीच चल रहे संघर्ष के लिए एक तरह से उन्हें भी जिम्मेदार बताया जा रहा है। दूसरी वजह यह है कि एल्विन को मरणोपरांत शैतान साबित करने का यह उपक्रम महज कट्टर दक्षिणपंथी हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि, अब असम के मुख्यमंत्री और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए भाजपा के प्रमुख हिमंत बिस्व सरमा भी यही राग अलाप रहे हैं।

तीसरी वजह यह है कि कट्टर हिंदुत्व के अलावा दूसरे सभी विश्वासों के प्रति भाजपा के शत्रुतापूर्ण रवैये के विपरीत एल्विन इतने खुले दिमाग वाले थे, कि आदिवासी संस्कृति के प्रति गहरी सहानुभूति के कारण ईसाइयत की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते थे।

मैं पहले एल्विन पर सरमा के लगाए आरोपों पर आऊंगा। लेकिन, सबसे पहले उन लोगों के लिए वेरियर एल्विन का संक्षिप्त परिचय, जिन्होंने मेरे द्वारा लिखी उनकी जीवनी सेवेजिंग द सिविलाइज्ड : वेरियर एल्विन, हिज ट्राइबल्स ऐंड इंडिया  नहीं पढ़ी है। 1902 में जन्मे वेरियर एल्विन की शिक्षा ऑक्सफोर्ड में हुई। 1927 में ईसाइयत का भारतीयकरण करने के लिए भारत आए एल्विन ने महात्मा गांधी से काफी प्रभावित होकर चर्च का त्याग कर दिया और मध्य भारत के आदिवासियों के बीच काम करने लगे। 1930 और 40 के दशक में उन्होंने आदिवासी जीवन, लोकगाथाओं और कला पर एक शानदार मानवशास्त्रीय शृंखला लिखी। आजादी के बाद एल्विन भारत के नागरिक बन गए। 1954 में वह नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस या नेफा (वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) के मानवशास्त्रीय सलाहकार नियुक्त हुए।

भारत और चीन की सीमा पर स्थित इस क्षेत्र का कोई नक्शा नहीं था। एक तरह से अप्रशासित रहे इस क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत के भी कोई चिह्न नहीं थे। यह उम्मीद की गई कि एल्विन की मानवशास्त्रीय विशेषज्ञता प्रशासन को वहां के आदिवासियों से जुड़ने में मदद करेगी, जो काफी हद तक हुआ भी। उत्तर- पूर्वी राज्यों में अरुणाचल एकमात्र ऐसा राज्य रहा, जहां कभी कोई बड़ा संघर्ष नहीं हुआ, तो इसका श्रेय एल्विन और उनके साथियों को जाता है, जिन्होंने जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों को सुरक्षा देने, हिंदी को विभिन्न आदिवासी समूहों को जोड़ने वाली भाषा बनाने और ईसाई व हिंदू धर्म प्रचारकों को क्षेत्र से दूर रखने की दिशा में काफी मेहनत की।

वेरियर एल्विन की मृत्यु फरवरी, 1964 में नेहरू से कुछ ही समय पहले हुई। उसके छह दशक बाद 11 अगस्त, 2023 को राजधानी दिल्ली के एक अखबार में असम के मुख्यमंत्री का एक आलेख छपता है। इसमें दावा किया गया है कि ‘पंडित नेहरू ने उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए अपने पहले सलाहकार के रूप में यूरोपीय मूल के एक व्यक्ति को नियुक्त किया। क्या यह वही थे, जिन्होंने राज्य में तेल पाए जाने के बावजूद असम को तेल रिफाइनरी से वंचित करने की सलाह प्रधानमंत्री को दी? क्या यही वह सलाह थी, जिसकी वजह से प्रधानमंत्री ने गोपीनाथ बोरदोलोई को भारत रत्न देने से इन्कार किया था?' लेख में ‘यूरोपीय मूल’ के व्यक्ति का नाम नहीं दिया गया। इससे तीन दिन पहले मुख्यमंत्री सरमा ने एक ट्वीट में लिखा, ‘पंडित नेहरू ने उत्तर-पूर्वी मामलों में परामर्श देने के लिए यूरोपीय मूल के वेरियर एल्विन को नियुक्त किया था और कांग्रेस की गंभीर गलतियां यही से शुरू हुईं।’

हालांकि, सच तो यह है कि वेरियर केवल नेफा के सलाहकार थे और उत्तर-पूर्व के किसी दूसरे हिस्से के प्रशासन में उनकी कोई भूमिका नहीं रही। न नगालैंड में, न मणिपुर में और असम में तो बिल्कुल भी नहीं। दरअसल, असम के मुख्यमंत्री और कट्टर हिंदू दक्षिणपंथियों का यह उत्तर-पूर्व पर हो रही चर्चा को वर्तमान से अतीत में ले जाने का कुत्सित प्रयास है। तीन महीने से ज्यादा समय से मणिपुर जल रहा है और इसकी आंच मिजोरम, नगालैंड और मेघालय में भी महसूस की जा रही है। केंद्र और राज्य में पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की नहीं, बल्कि भाजपा की सरकार है। ऐसे में, मणिपुर में चल रहे खूनी संघर्ष के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार तीन लोग हैं- मणिपुर के मुख्यमंत्री, देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री। राज्य में सत्तारूढ़ सरकार के संकटहर्ता की भूमिका में असम के मुख्यमंत्री भी कोई कम दोषी नहीं हैं।

मणिपुर में चल रही त्रासदी की जिम्मेदारी लेने से पल्ला झाड़ते हुए असम के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि हम उन लोगों के बारे में बातें करें, जिन्हें गुजरे जमाना बीत गया। ऐसा करते हुए वह अपने आकाओं के व्यवहार की ही नकल कर रहे हैं, जिनसे जब नागरिक स्वतंत्रता के हनन की बात की जाए, तो उन्हें इंदिरा गांधी का आपातकाल याद आता है और अगर चीनी घुसपैठ के अकाट्य तर्क दिए जाएं, तो वे नेहरू और 1962 के युद्ध की बात करने लगते हैं।

मैं कांग्रेसी नहीं हूं। लेकिन, मैं वेरियर एल्विन की जीवनी का लेखक जरूर हूं। मैं चुप नहीं रह सकता। खासकर तब, जब उनके मरणोपरांत उनका नाम वे लोग उछाल रहे हैं, जिनकी कट्टरता सराहना तो दूर, उन्हें यह भी समझने नहीं देगी कि कैसे एक ईसाई चर्च को छोड़कर धार्मिक बहुलता को अपना सकता है या कैसे एक विदेशी अपने योगदानों से इस मुल्क को अपना बना लेता है।

वेरियर एल्विन के संवदेनशील काम और विरासत का स्थायी महत्व है। उनकी एक पुस्तक ए फिलोसॉफी फॉर नेफा  से उनकी चिंता जाहिर होती है कि आदिवासियों को बगैर जंगल और जमीन से अलग किए या उनकी संस्कृति के लिए उन्हें शर्मिंदा किए, उनके भौतिक जीवन को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है। युवाओं को एल्विन पर लिखी पुस्तकें पढ़नी चाहिए, तभी वे हिंदू दक्षिणपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठों को समझ पाएंगे। एल्विन की मृत्यु के बाद प्रतिष्ठित बांग्ला अखबार, अमृतबाजार पत्रिका के एक संपादकीय में कहा गया था कि 'भारत ने, न केवल अपने सबसे सम्मानित मानवशास्त्री को खोया है, बल्कि उदारवादी सोच वाले उस अंतिम अंग्रेज को भी खो दिया, जिसने इस देश को अपना घर बनाया और यहां के लोगों के साथ पूरी तरह से जुड़ा।'

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