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सावधानी जरूरी है: मणिपुर में नई सरकार, लेकिन शांति की राह अब भी चुनौतीपूर्ण

Sat, 07 Feb 2026 06:40 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Sat, 07 Feb 2026 06:40 AM IST
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सार
करीब एक साल तक चले राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में नई सरकार के गठन के बाद संभावना जताई जा रही थी कि राज्य में हालात सुधरेंगे। हालांकि, नई सरकार बनने के बाद मणिपुर में फिर हिंसा भड़क गई। मणिपुर के जातीय संकट को देखते हुए भाजपा ने सत्ता में तीनों मुख्य जातियों की भागीदारी सुनिश्चित की है। 
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manipur new government ethnic balance and challenges Meitei Kuki conflict Churachandpur violence
मणिपुर में फिर भड़की हिंसा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के नौ फरवरी, 2025 को इस्तीफे दिए जाने के उपरांत लगे राष्ट्रपति शासन के करीब एक वर्ष बाद मणिपुर में नए मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों की व्यवस्था से यह उम्मीद की जा रही थी कि अस्थिरता, हिंसा और अविश्वास के लंबे दौर के बाद अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होंगे, लेकिन शीघ्र ही चुराचांदपुर में जिस तरह से हिंसा भड़की, उससे साफ है कि राज्य में शांति बहाली की राह आसान नहीं होने वाली। जातीय संतुलन साधने के लिए नई सरकार में मैतेई समुदाय के भाजपा नेता वाई खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री, तो कुकी नेता नेमचा किपगेन और नगा समुदाय के एल डिखो को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक-जातीय संकट से बाहर निकलने की एक कोशिश भी है, जिसने बीते वर्षों में मणिपुर को हिंसा, अविश्वास और प्रशासनिक ठहराव की स्थिति में डाल रखा था। लेकिन, चुराचांदपुर में हुई हिंसा केंद्र और राज्य सरकार को ‘सावधानी जरूरी है’ का संदेश देती है। ताजा हिंसा की वजह यह बताई जा रही है कि नेमचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने से कुकी समुदाय बंट गया है, और सरकार में शामिल कुकी विधायकों को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, मणिपुर ने 2023 में शुरू हुई मैतेई-कुकी हिंसा में काफी कुछ खोया है। मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग, भूमि अधिकारों पर विवाद और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों ने हिंसा को भड़काया। हजारों लोग विस्थापित हुए, सैकड़ों मौतें हुईं और अर्थव्यवस्था ठप हो गई। केंद्र सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए, पर स्थानीय नेतृत्व की कमी और समुदायों के बीच अविश्वास ने समस्या को जटिल बना दिया। राष्ट्रपति शासन के दौरान सुरक्षा बलों ने भले ही कट्टरपंथी समूहों के जोश को कम किया है, लेकिन लंबे जातीय संघर्ष के बाद अनुमानित 60 हजार विस्थापितों में से सिर्फ नौ हजार लोगों का ही घर लौटना भरोसे की कमी को ही दर्शाता है। कुकी-जो समूह जिस अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं, वह संभव नहीं और इससे विवाद बढ़ेगा ही। दरअसल, मणिपुर की समस्या केवल प्रशासनिक या सांविधानिक ढांचे की बहाली से खत्म नहीं होगी। सच्ची स्थिरता के लिए सतर्कता के साथ समुदायों के बीच संवाद और दीर्घकालिक समावेशी समाधान की जरूरत है। मणिपुर में खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली नई सरकार राज्य के लिए नई उम्मीद का प्रतीक है, लेकिन यह तो समय ही बताएगा कि यह समुदायों को एकजुट करने की परीक्षा में कितनी सफल रहती है।
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