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आम और अमरूद भी हैं हमारी साझा विरासत

Sun, 07 Jun 2015 06:07 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Sun, 07 Jun 2015 06:07 PM IST
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Mango and guava are also Our Shared Heritage

प्रिय पाठको, इन दिनों आपके बगीचे में कौन-सा फूल खिला है? यह मैं इसलिए पूछ रही हूं, क्योंकि हमारे कई शहरों में मौसम की स्थिति एक जैसी है। और मुझे लगता है कि अगर मैं भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के बगीचे की तुलना करूं, तो आपको शायद अच्छा लगेगा।

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मेरे सामने के बगीचे में लीची का पेड़ फलों से लदा है, इसका रंग भले ही लाल-गुलाबी है, लेकिन वर्षा और ओलावृष्टि के कारण मौसम ठंडा रहने के कारण यह पका नहीं है, क्योंकि इसके पूरी तरह पकने के लिए गर्म मौसम बहुत जरूरी है। पिछले वर्ष कुछ ऐसे मामले सामने आए थे, जब दुकानदारों ने आकर्षक दिखने के लिए लीची को रंग दिया था, लेकिन यह सेहत के लिए नुकसानदेह होता है। बगीचे में लीची के नीचे की छाया बहुत ठंडी है।
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इस साल लगातार बरसात के कारण राजस्थान की सीमा से सटे सिंध में आम की फसल को बहुत नुकसान हुआ। इस महाद्वीप पर जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है। मेरे बगीचे के आम के पेड़ में भी इस बार बहुत देर से बौर आए और बारिश के कारण फल भी बहुत कम लगे हैं। शायद हम चटनी और अचार के लिए ही आम का उपयोग कर सकते हैं।
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मेरे दो पेड़ों में खुरमा भी बहुत अच्छी तरह से फले हैं, लेकिन ये फल अक्तूबर में ही पकेंगे। बड़ा हरा नींबू भी तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि इसमें रस कम होता है और यह छोटे चीनी (चाइनीज) किस्म की तरह उतना अच्छा भी नहीं होता, जो सर्दियों में फलता है। मैं आम तौर पर दोनों किस्मों के रस को बोतल में भरकर फ्रिज में रखती हूं, इसलिए पूरे साल मुझे ताजा रस मिलता है। नींबू पानी दोनों देशों में बहुत लोकप्रिय है।

हालांकि अमरूद के पौधों में सर्दियों में भी फल लगे थे, लेकिन अब उनमें एक बार फिर से गर्मियों के फल लगे हैं। अमरूद के कुछ उम्दा किस्मों में से एक बेनजीर भुट्टो के शहर लरकाना का अमरूद है, जो लंबा और अंदर से गुलाबी होता है।

गर्मी के मौसम में मोतिया और चमेली के खुशबूदार फूलों में नई जान आ जाती है और मोतिया के फूलों को धागों में गूंथकर कलाई और बालों में पहनने का रिवाज दोनों संस्कृतियों में बहुत खास है। हर सुबह मैं अपने कमरे में एक छोटी-सी डलिया में भरकर मोतिया के फूल रखती हूं, जिसकी तेज खुशबू पूरे दिन कमरे को सुगंधित रखती है।

मेरे पिछवाड़े वाले बगीचे में जो फूल है, उसे हम यहां भारतीय मोतिया कहते हैं। इसका पौधा मैं खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बन्नू से लाई थी। बन्नू इस क्षेत्र में पौधों की विविध प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है और विभिन्न जगहों से लोग वहां मजेदार फल और फूल के पौधे खरीदने के लिए जाते हैं। यदि स्थानीय मोतिया की भारतीय मोतिया से तुलना करें, तो भारतीय मोतिया का आकार बहुत बड़ा होता है और उसमें कई परतें होती हैं, इसलिए एक खिला हुआ फूल छोटे गुलाब के बराबर होता है।

लेकिन जून के महीने में बगीचे की शोभा मैग्नोलिया का पेड़ होता है, जिसका एक फूल मेरे चेहरे के बराबर होता है और एक ही फूल अपनी खुबसूरत खुशबू से पूरे घर को महका देता है। चूंकि यह आम तौर यहां उपलब्ध नहीं होता, इसलिए इसे एक अद्भत उपहार के तौर पर भी दिया जा सकता है। मैं आम तौर पर बहुत-सी कलियों को अखबार में लपेटकर उसे प्लास्टिक बैग में डालकर फ्रिज में रख देती हूं। यह हफ्ते भर तक चलता है और इसे दोस्तों को उपहार के तौर पर देना आसान है।

इन दिनों सफेद गार्डेनिया भी खिला है और रात में यह ऐसे दिखता है, मानो झाड़ियों में रोशनी जली हो, और अगर रात में घर का दरवाजा खुला हो, तो इसकी खुशबू घर में भर जाती है। स्टार गार्डेनिया वास्तव में छोटा होता है और इसके छोटे फूल गेट के पास की दीवार पर चढ़ जाते हैं। चूंकि अभी मौसम ठंडा है, इसलिए यह फूल अब भी सामान्य रूप से खिल रहा है, क्योंकि गर्मी में यह नहीं बच सकता। हैरानी की बात है कि चाहे मोतिया हो, मैग्नोलिया या सभी प्रकार के गार्डेनिया, ये सभी मीठी खुशबू वाले फूल सफेद रंग के होते हैं।

मेरे माली ने इन तमाम पौधों के स्थानीय नाम रखे हैं और जब मैं उसे गूगल पर उनकी तस्वीर दिखाता हूं, तो वह तुरंत समझ जाता है कि मैं किसके बारे में बात कर रही हूं। यह तब उजागर हुआ, जब मुझे ताजा 'बैसिल प्लांट' की जरूरत थी और उसकी तस्वीर जब उसे दिखाई, तो उसने कहा, लेकिन यह तो तुलसी का पौधा है।

पिछवाड़े के छोटे बगीचे में अब लाल टमाटर तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि भूटान और थाईलैंड से लाए गए लाल मिर्च के बीज भी तेजी से पनप रहे हैं। मैं इसका इंतजार कर रही हूं कि थाई मिर्च वास्तव में तीखी होती है या नहीं, क्योंकि हम दक्षिण एशियाई लोग मिर्च बहुत पसंद करते हैं। जब ये लाल हो जाएंगे, तो उन्हें सुखाकर पूरे वर्ष रसोई में इस्तेमाल किया जाएगा।

सर्दियों की सुस्ती के बाद देसी पुदीना भी शवाब पर है और इसका सूखा पाउडर लस्सी पर छिड़कने के लिहाज से बेहतर होता है। लेकिन एप्पल मिंट वाकई लाजवाब होता है और इसकी पत्तियों से अच्छा शरबत बनता है और इसे सलाद में डाला जाता है। नाशपाती पाकिस्तान में काफी लोकप्रिय हो रही है और मैंने कई पुराने घरों में बहुत से नाशपाती के पुराने पेड़ों में फल लदे देखे हैं। मेरा पेड़ मात्र तीन साल पुराना है, इसलिए वह फल लगने के लिहाज से अभी छोटा है।

जब मैं नई दिल्ली में थी, तो मैंने एक बड़ा फर्क यह देखा कि वहां सैकड़ों साल पुराने पेड़ों की भी बड़े करीने से देखभाल की जाती है। मैंने इतनी हरी-भरी राजधानी कभी नहीं देखी। दिल्ली में ऐसा कोई भी इलाका नहीं है, जहां पेड़ न हों। लेकिन पाकिस्तान के शहरों में विकास के नाम पर पेड़ तेजी से काटे जा रहे हैं। खास तौर पर नवाज शरीफ सरकार को तो पेड़-पौधों के बजाय सीमेंट और इस्पात से ज्यादा प्यार है। रावलपिंडी और इस्लामाबाद में छोटे-बड़े 4,000 से ज्यादा पेड़ मेट्रो बस सेवा के लिए काटे गए हैं। शहर की हरियाली को रेगिस्तान में बदलने के इस अपराध के लिए न तो यहां के लोग और न ही प्रकृति शरीफ सरकार को माफ करेगी।

दिल्ली के कई इलाकों में अब भी देसी फूल खिलते हैं, जो मुझे अपने बचपन की याद दिलाते हैं। पाकिस्तान में नई आयातित किस्मों ने संध्या मालती जैसे देसी फूलों को बेदखल कर दिया है। यहां तक कि हमारे देसी गुलाब भी मुश्किल से ही दिखते हैं। इसकी नई प्रजाति आकार में तो बड़ी होती है, लेकिन उसमें वह मीठी खुशबू नहीं होती, जो देसी गुलाबों में होती थी।


उत्तर में स्वात और मालकंद अब तालिबान की पकड़ से मुक्त हो गए हैं, जहां अच्छी गुणवत्ता वाले जैतून का उत्पादन हो रहा है। यहां पहली बार खाना पकाने के लिए जैतून के तेल का उत्पादन होता दिख रहा है।

इस उपमहाद्वीप की धरती ऐसे विनाश के बावजूद हमारे प्रति उदार है। कितने अफसोस की बात है कि प्रकृति के संरक्षण के बजाय हम इसे खत्म करने की जल्दी में हैं।

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