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भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जनादेश

Fri, 10 May 2013 10:38 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Fri, 10 May 2013 10:38 PM IST
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mandate against corruption

आखिरकार कर्नाटक में भाजपा का बिस्तर बंध ही गया। दो महीने पहले कर्नाटक में कांग्रेस की जीत की मेरी भविष्यवाणी हालिया रुझानों पर आधारित थी, जब स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा का सफाया हो गया था।

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मतदाताओं ने स्थिर बहुमत के पक्ष में एक पार्टी को वोट दिया था, क्योंकि ज्यादातर लोग कर्नाटक में राजनीतिक खरीद-फरोख्त और एक के बाद एक खुलेआम भ्रष्टाचार के बाद एक बदहाल गठबंधन से तंग आ चुके थे।
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आश्चर्य नहीं कि मीडिया के कुछ लोग कई वजहों से हैरान हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि हर रोज बद से बदतर हालात की जानकारी देने वाली खबरों के दर्शक बेहद सीमित होते हैं, और इनमें से ज्यादातर मतदान नहीं करते।
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हिमाचल प्रदेश के बाद अब कर्नाटक इसका ताजा उदाहरण है। भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा और झारखंड चुनाव के बाद यह उसके लिए दूसरा बड़ा झटका है। इससे केंद्र के भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके अभियान की धार कुंद हुई है।

वास्तविकता तो यह है कि संभवतः वाम दलों को छोड़कर भ्रष्टाचार का वायरस सभी राजनीतिक दलों में गहरी पैठ बनाए हुए है। राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का हमेशा नियंत्रण नहीं रहता और उनके वित्तीय हितों को तभी चुनौती दी जाती है, जब शीर्ष नेतृत्व की सत्ता को चुनौती मिलती है।

भाजपा का रेड्डी बंधुओं, पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा एवं उनके परिजनों पर कोई नियंत्रण नहीं था। कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में और फिर उसके सहयोगी द्रमुक को तमिलनाडु में ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा। इनका नतीजा यह हुआ कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को (चाहे केंद्र में हो या राज्य में) चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और जेल जाना पड़ा।

मीडिया कभी गलत नहीं हो सकता और न ही विशेषज्ञ, इसलिए हर कोई हालात पर अपनी राय को उचित ठहराएगा, पर सच्चाई यही है कि भाजपा एवं येदियुरप्पा की पार्टी केजीपी की भारी हार हुई है और कांग्रेस, जद (एस) एवं निर्दलीय को फायदा हुआ है।

स्थानीय मुद्दों की वजह से भी कुछ दलों को दूसरों से ज्यादा सीटें मिली हैं। भाजपा ने हरसंभव कोशिश की, लेकिन हिमाचल प्रदेश की तरह कर्नाटक में भी नरेंद्र मोदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तटीय कर्नाटक के जिन इलाकों में उन्होंने ज्यादा ध्यान दिया, वहां भाजपा कोई सीट नहीं जीत पाई।

भाजपा को उस इलाके में केवल एक सीट मिली, जहां नरेंद्र मोदी प्रचार के लिए नहीं गए थे! मेरा अनुमान है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 18 से 25 सीटें मिलेंगी। इस चुनाव में कांग्रेस विरोधी वोट भाजपा से जद (एस) में चला गया, लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा, इसलिए भविष्य पर ध्यान देने की जरूरत है।
मैंने चुनाव से काफी पहले कांग्रेस को 120 सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी, लेकिन उसने 121 सीटें जीतीं।  इस चुनाव में कांग्रेस के सबसे बड़े प्रचारक पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी थे, जिन्होंने राज्य के नौ जिलों का दौरा किया था।

स्वाभाविक है कि इस जीत का श्रेय उन्हें दिया गया है। अपने शीर्ष नेतृत्व के भ्रम को निशाना बनाने के बजाय हार के बाद भाजपा बाकी हर किसी पर दोष मढ़ रही है। यह चलता रहेगा। भाजपा की बैठक में राम जेठमलानी के घुस जाने की कोई कैसे व्याख्या कर सकता है।

यह भाजपा में शीर्ष स्तर पर व्याप्त झगड़े को बताने के लिए काफी है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस मामले में फैसला लेने वाला कोई नहीं है। सबकी निगाहें चुनाव की तरफ लगी हैं और सभी भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि जैसे ही नतीजे बदलने लगे, हमारे कई विशेषज्ञों ने हर आधे घंटे में अपनी राय बदल ली।

कांग्रेस में नेतृत्व का मसला स्पष्ट है, लेकिन भाजपा में इसको लेकर ज्यादा उलझन हो रही है। विश्वसनीय नेतृत्व वाली दो क्षेत्रीय पार्टियां-अन्नाद्रमुक एवं बीजद चुप हैं। इसके बावजूद कि सभी दलों के तेवर आखिरी क्षणों में दिखेंगे, फिलहाल सपा एवं बसपा को इस बात से खुशी हुई होगी कि भाजपा कमजोर हुई और नरेंद्र मोदी का जादू नहीं चल पाया।

इससे जद(यू) बिहार में मजबूत होगी। पश्चिम बंगाल में गहरे संकटों में फंसी ममता बनर्जी को छोड़कर हर क्षेत्रीय पार्टी ठहरकर हालात का जायजा लेगी, क्योंकि हालात अस्थिर हैं और शायद ही कोई भविष्यवाणी कर सकता है कि इस वर्ष के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में क्या होगा!

इधर, रेल मंत्री से इस्तीफा लेने की भी खबर है। ऐसा उनके और उनके कुनबे के व्यावसायिक हितों से संबंधित खुलासे सामने आने के बाद हुआ है। जिस तेजी से जांच हो रही है, उसमें लगता है कि चुस्ती दिखाने वाला मीडिया भी पीछे रह जाएगा। दोषी के खिलाफ कार्रवाई तो जायज है और जब संसद स्थगित हो गई हो, तब इस पर फैसला अवश्यंभावी ही हो गया था।

बंसल परिवार के व्यावसायिक हितों के साथ कुछ अन्य लोगों के भी संलिप्त रहने की अफवाहें हैं। मेरा मानना है कि हर पार्टी को अपनी और अपने नेताओं की सुरक्षा के लिए पार्टी से जुड़े मंत्रियों एवं उनके परिवार की संपत्ति की आंतरिक लेखा-परीक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।


रेलवे बोर्ड में काफी कुछ गड़बड़ियां हैं। इसलिए इसकी व्यवस्था की गंभीरता से जांच कर सैम पित्रोदा के पेशेवर सुझावों को लागू करना चाहिए। बहरहाल, सीबीआई ने अच्छा काम किया है, और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर कार्रवाई तो लाजिमी ही थी।

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