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आदमी जंगल में, बंदर घरों में...आतंकित लोग छोड़ रहे गांव

Sun, 11 Oct 2020 04:58 AM IST
सुरेश भाई सुरेश भाई
सुरेश भाई Published by: सुरेश भाई Updated Sun, 11 Oct 2020 04:58 AM IST
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Man in the forest, monkey in houses, terrorized people leaving the village
monkeys in street - फोटो : अमर उजाला

वनों में कंद-मूल फल खाकर मस्ती में रहने वाले बंदर अब गांव में पहुंच गए हैं। ये किसानों की तमाम फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। घरों में खाना बनाने वाली महिलाओं के दरवाजे पर बंदर झांकते रहते हैं, जैसे ही उनको मौका मिले वे किचन का सारा कच्चा-पक्का सामान उठाकर छत में आराम से खाते नजर आते हैं। यदि घरों में रहने वाले लोगों ने उन्हें भगाने के लिए हाथ में डंडा अथवा पत्थर उठा लिया, तो समझ लीजिये कि सारे बंदर चारों ओर से झपटने लगते हैं। ये समूह में आकर एक जैसी डरावनी आवाज में लोगों को भयभीत कर देते हैं। अजीबो गरीब स्थिति है कि महिलाओं से बंदर बिल्कुल नहीं डरते हैं। एक बंदर भी कई महिलाओं को डराने लगता है। अक्सर यह स्थिति तब आती है, जब खेतों में फसल काटी जाती है या घर में अकेली महिला अपने किचन गार्डन आदि बचाने की जब हिम्मत करने का प्रयास करती है। किसी गांव में जाइये जब खेती-बाड़ी की बात होती है, तो खासकर महिला किसानों से यही सुनने को मिलेगा कि बंदरों से फसल कैसे बचाएंगे?


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लोग बंदरों के आतंक से भी भयभीत हैं, जिसमें अपनी खेती-बाड़ी की रक्षा करना भी उनके बलबूते से बाहर होता जा रहा है। गांव छोड़कर शहरों में जा रहे लोगों का भी यही कहना है कि उनकी मेहनत की फसल बंदर एक ही दिन में चौपट कर देते हैं। जिसकी कहीं से कोई भरपाई नहीं हो पाती है। इससे अच्छा वे मेहनत मजदूरी करके दो जून रोटी का जुगाड़ करना पसंद कर रहे हैं।

हकीकत यह है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में बंदरों से खेती सुरक्षा करने की कोई ठोस नीति नहीं है। जबकि पुराने समय में गांव के लोग अपनी खेती व वन सुरक्षा के लिए एक गार्ड चौकीदार के रूप में नियुक्त करते थे और सारे लोग मिलकर गार्ड को हर फसल पर अनाज या नगद के रूप में भुगतान करते थे। वर्तमान में यह व्यवस्था मनरेगा के द्वारा भी पुनर्जीवित की जा सकती है। लेकिन समाज-सरकार के बीच खेती सुरक्षा के उपाय पर कोई जिम्मेदाराना रवैया न दिखाई देने के कारण कितनी ही योजनाएं खेती के नाम पर करो फिर भी बंदरों के अलावा अन्य जंगली जानवरों से फसल नहीं बच पा रही है। कई राज्य जो अपने यहां के लोगों के पलायन से चिंतित हैं, उनमें स्कूल, स्वास्थ्य, रोजगार के अलावा फसल सुरक्षा भी एक अहम सवाल है।

गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित भटवाड़ी ब्लाक के बार्सू गांव के एक प्रगतिशील किसान जगमोहन रावत ने फसल सुरक्षा के लिए अपने खेतों के चारों ओर लगभग 15-18 फीट ऊंची बांस व कटीले तार की बाड़ बनाई है। इस ऊंची बाड़ को बंदर नहीं लांघ पाते हैं, जिसके कारण वे आलू, सेब, राजमा आदि फसल सुरक्षित ले पाते हैं। इसे देखने के लिए कई खेती विशेषज्ञ वहां जाते रहते हैं। फसल सुरक्षा में इस तकनीक का इस्तेमाल तभी हो सकता है। जब मनरेगा कार्य के अंतर्गत इसे शामिल किया जाए, तो लोग व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप में इस सुरक्षा बाड़ बना सकते हैं।

कोविड-19 के कारण घर लौटे प्रवासियों को खेती-बाड़ी के साथ बंदरों से फसल सुरक्षा हेतु रखे जाने वाले पारंपरिक गार्ड और समुचित तकनीक के प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है, क्योंकि जिस तरह से स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के नाम पर अतिरिक्त कर्मचारी रखे जा रहे हैं। यही व्यवस्था गांव में भी फसल सुरक्षा के लिए क्यों नहीं की जा सकती?

जहां जंगलों में बंदरों का निवास था, वहां से अब वे बस्तियों में आए हैं, क्योंकि जैवविविधता पहले की तरह नहीं बची हुई है। पहले भरपूर जंगली फल-फूल, जड़ी-बूटियां आदि होती थीं। चौड़ी पत्ती के वृक्षों के स्थानों पर चीड़ प्रजाति के वन अधिक मात्रा में फैल गये हैं, जिनका कोई भी फल-फूल बंदर नहीं खाते हैं। यदि इन वृक्षों के बीच फल प्रजाति जैसे अमरूद ,शहतूत  आदि शीघ्र वृद्धि करने वाले फल -पौधों का रोपण हो, तो बंदर फिर से अपने पुराने स्थानों की ओर लौट सकते हैं। वनों में बार-बार आग लगने से भी बंदर बस्तियों की तरफ आ रहे हैं। बंदर सुबह उठकर जब घरों की ओर आते हैं, तो वे कई बच्चों के हाथों से कुरकुरे, चिप्स आदि भी छीनकर ले जाते हैं।

शहरों में गंदगी के ढेरों से सड़े-गले भोजन को जिस तरह सियार, चील, कौवे आदि बीनकर खाते हैं, ठीक उसी तरह बंदरों का समूह भी पेट पूर्ति के लिए इन्हीं के साथ नजर आने लगे हैं। जिन कुत्तों का सहारा लेकर पहले बंदर भगाए जाते थे, उनके साथ भी बंदरों ने दोस्ती कर दी ली है, क्योंकि कई स्थानों पर बंदर व कुत्ते साथ-साथ शहरों की गंदगी में से भोजन के टुकड़े खाते रहते हैं। हिमाचल राज्य में बंदरों की संख्या कम करने के लिए कुछ प्रयास किए जा रहे हैं। जिसका अभी तक कोई आशाजनक परिणाम नहीं आया है। वन विभाग के पास भी बंदरों को बस्ती से दूर पहुंचाने की व्यवस्था के बारे में सुनने को मिलता है, जो कहीं दिखाई नहीं देता है। लेकिन यह पूरे देश की समस्या है, जिसके लिए सभी राज्यों को केंद्र के साथ मिलकर बंदरों की संख्या घटाने व नियंत्रण के उपाय ढूंढ़ने होंगे। 
 

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