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चौतरफा दबाव से घिरीं दीदी : भारतीय राजनीति में तूफान खड़ा कर देनी वाली नेता कितनी कमजोर हो चुकी हैं

Wed, 26 Jun 2019 02:28 AM IST
ajay bosh अजय बोस
Updated Wed, 26 Jun 2019 02:28 AM IST
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mamta banarjee face Surrounded pressures
अजय बोस, वरिष्ठ पत्रकार - फोटो : a

पिछले हफ्ते राज्य के हड़ताली डॉक्टरों को आंदोलन खत्म करने के लिए राजी करने के वास्ते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिस तरह से उनके आगे झुकना पड़ा, उससे पता चलता है कि भारतीय राजनीति में तूफान खड़ा कर देनी वाली नेता कितनी कमजोर हो चुकी हैं।


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पिछले हफ्ते राज्य के हड़ताली डॉक्टरों को आंदोलन खत्म करने के लिए राजी करने के वास्ते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिस तरह से उनके आगे झुकना पड़ा, उससे पता चलता है कि भारतीय राजनीति में तूफान खड़ा कर देनी वाली नेता कितनी कमजोर हो चुकी हैं।

कुछ दिन पहले ही उन्होंने डॉक्टरों से कहा था कि वे काम पर नहीं लौटे, तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। ऐसे में यह कदम उस नेता के लिए अपमानजनक कहा जा सकता, जिन्हें किसी टकराव में पीछे हटते नहीं देखा गया। यह दिखाता है कि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के खराब प्रदर्शन और राज्य में भाजपा से मिल रही कड़ी चुनौती के कारण किस तरह से उनका आत्मविश्वास डगमगा गया है।

पिछले कई वर्षों से दीदी के करीबी रहे एक नेता ने निजी बातचीत में स्वीकार किया कि उनके लंबे उतार-चढ़ाव भरे रहे करियर में वह कभी ऐसे दबाव में नहीं दिखीं, जैसी वह आज नजर आ रही हैं। यह गौर करने लायक है कि तृणमूल कांग्रेस की जो तेजतर्रार नेता कभी चुनौतियों से टकराने में पीछे नहीं रहती थीं, आज ऐसा लगता है कि अपने विपक्षियों से मुकाबला करने को लेकर दुविधा में हैं।

डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर पहले तो उन्होंने अनावश्यक रूप से अड़ंगा लगाया और फिर जिस तरह से उन्होंने उनके आगे समर्पण किया, उससे पता चलता है कि उनकी ढीली होती पकड़ किस तरह से उनके प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक इच्छा शक्ति दोनों को ही प्रभावित कर रही है।

वास्तव में 2011 में ताकतवर मार्क्सवादी साम्राज्य को परास्त करने के बाद से ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य पर इस तरह से प्रभुत्व कायम कर लिया था कि वह अब यह स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रही हैं कि राजनीतिक नियति का पहिया एक बार फिर घूम रहा है और इस बार उसके नीचे वह खुद और उनकी पार्टी आ गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री दोहरे जोखिम का सामना कर रही हैं।

उन्हें न केवल स्थानीय स्तर पर गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि राज्य की आबादी के विभिन्न तबके उन्हें बेदखल करने के लिए भाजपा के पीछे गोलबंद हो रहे हैं। वहीं वह भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार के निशाने पर भी हैं, जो कि ऐसा लगता है कि ऐसे हर संस्थान का इस्तेमाल कर रही है, जो उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है। नगरपालिका से लेकर विधानसभा स्तर तक के नेताओं के पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामने का जो सिलसिला चल रहा है, उससे तृणमूल को खासा नुकसान हुआ है।

पार्टी के रोजाना हो रहे इस क्षरण से ममता बेबस नजर आ रही हैं और भारत में आज जिस तरह की राजनीतिक हवा बह रही है, उसमें दल बदल कानून निष्प्रभावी हो गया है। अपनी पार्टी की दुर्दशा को लेकर दीदी शिकायत करने की स्थिति में भी नहीं हैं, क्योंकि अतीत में मार्क्सवादियों और कांग्रेस को कमजोर करने के लिए उन्होंने खुद यही कौशल अपनाया था।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित रखने का भी लगातार दबाव झेलना पड़ रहा है, क्योंकि वहां उनकी पार्टी और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव बढ़ रहा है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि भाजपा ने चुनाव में राज्य में अच्छा प्रदर्शन तो किया ही है और वह लगातार दूसरी बार मजबूती के साथ केंद्र की सत्ता में भी आ गई है। अमित शाह के गृह मंत्री बनने और राज्य में ऐसे राज्यपाल के होने से, जो लगता नहीं कि ममता के प्रति बहुत सहानुभूति रखते हों, चौतरफा घिरी राज्य सरकार का प्रशासनिक सिरदर्द बढ़ना ही है।

दिल्ली की मजबूत केंद्र सरकार के खिलाफ बंगालियों में प्रांतीय उप राष्ट्रवाद का आह्वान कर भाजपा को घेरने की ममता की कोशिश सिरे नहीं चढ़ पा रही है। दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में जहां भाजपा को बाहरी बताकर किनारे किया जा सकता है, इसके उलट पश्चिम बंगाल में पार्टी असाधारण ढंग से उभर रही है, जैसा कि हाल के लोकसभा चुनाव में उसके मत प्रतिशत और सीटों में हुई वृद्धि दिखाती है। मुख्यमंत्री ने राज्य में रह रहे लोगों से बांग्ला सीखने की मांग कर भावनात्मक भाषायी मुद्दा छेड़ने और भाजपा को हिंदी पट्टी की पार्टी बताने की कोशिश की, लेकिन उनके इस कदम को ज्यादा समर्थन नहीं मिला।

वास्तविकता यह है कि पश्चिम बंगाल में गरीब लोगों की बड़ी आबादी जिनमें संथाल आदिवासी, दलित और पिछड़ी जातियों के साथ ही अच्छी खासी संख्या में मौजूद गैर बंगाली आबादी के लिए बांग्ला भाषा या संस्कृति शायद ही भावनात्मक मुद्दा है और क्षेत्रीय उप राष्ट्रवाद में ऐसे पर नहीं लगे हैं कि वह सियासी उड़ान भर सके। जहां तक उच्च जाति के बंगाली भद्रलोक मध्य वर्ग की बात है, जो कि अपनी पारंपरिक भाषा और संस्कृति से अधिक जुड़ाव महसूस करता है, तो वह दीदी का बहुत समर्थन नहीं करता। बल्कि बंगाली भद्रलोक में पिछले कुछ समय से मुस्लिम मौलवियों की पैरवी करने और अल्पसंख्यक वोट बैंक की उनकी राजनीति के कारण उनके प्रति बेरुखी है।  

लगातार बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों के बीच राज्य में उनके एकमात्र राजनीतिक विपक्ष को लेकर ममता बनर्जी के पक्ष में एक बात है। भाजपा को अभी कोई ऐसा स्थानीय नेता तलाशना है, जिसका कद और विश्वसनीयता ऐसी हो कि वह दूर से ही सही मुख्यमंत्री को चुनौती दे सके। ऐसे दौर में जब आदमकद राजनीतिक हस्तियां देश में शासन कर रही हों, यही एक बात ममता के पक्ष में हो सकती है। यदि दिल्ली की भाजपा सरकार ने राज्य में कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को लेकर उन्हें सत्ता से बेदखल किया, तो इससे ममता को ही मदद मिलेगी और वह खुद को पीड़ित बताएंगी।
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