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छवि खराब करने की रणनीति
तवलीन सिंह
Updated Sun, 12 Jul 2015 08:14 PM IST
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पहले कुछ दिन हर समाचार चैनल पर चली ललित गेट नाम की एक दिलचस्प फिल्म। दर्शक उससे ऊबने लग गए, तो महाराष्ट्र के दो मंत्रियों के नाम से एक नए घोटाले वाली पिक्चर चली। 'इस्तीफा दो, इस्तीफा दो' के नारे गूंज उठे। इस नई पिक्चर से भी जब दर्शकों के ऊब जाने के आसार दिखने लगे, तब व्यापम नाम के पुराने घोटाले पर एक नई पिक्चर बनी। 'इस्तीफा दो, इस्तीफा दो' के नारे फिर गूंजे। आखिरकार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को सीबीआई जांच मंजूर करनी पड़ी।
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इन तीनों घोटालों का अगर विश्लेषण किया जाए, तो कांग्रेस की रणनीति बिल्कुल साफ दिखने लगती है। ऐसा नहीं है कि इन घोटालों में कोई तथ्य नहीं है, लेकिन ऐसा जरूर है कि इन दिनों कांग्रेस को भ्रष्टाचार सिर्फ उन्हीं राज्यों में दिख रहा है, जहां भाजपा की सरकारें हैं।
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व्यापम घोटाले पर पहली बार बीती सदी के नब्बे के दशक में चर्चा हुई थी। पहली एफआईआर दर्ज हुई थी वर्ष 2000 में। साफ है कि इस घोटाले का सारा दोष शिवराज सिंह चौहान के सिर नहीं थोपा जा सकता। लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ताओं से यह बात किसी ने नहीं की। टीवी पर जब रोज हल्ला मचने लगा, तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहने की कोशिश की कि इस घोटाले का पर्दाफाश तो उन्होंने ही किया है। पहली बार गिरफ्तारियां हुई थीं वर्ष 2009 में, जिनमें एक पूर्व शिक्षा मंत्री भी थे। तब से लेकर आज तक इस घोटाले से जुड़े दो हजार से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए हैं। कायदे से इसका श्रेय मिलना चाहिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को। लेकिन श्रेय देने के बदले कांग्रेस ने चौहान का इस्तीफ मांगा है। व्यापम पर हम सब का ऐसा ध्यान आकर्षित हुआ है कि हम भूल गए हैं कि कुछ ही दिन पहले इस्तीफा मांगने जा रहे थे सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और महाराष्ट्र सरकार के दो मंत्रियों से।
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क्या आपको कांग्रेस की रणनीति दिखने लगी है? दिल्ली की राजनीतिक गलियों में अफवाहों के मुताबिक, कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मोदी सरकार को अस्थिर करने की ठान ली है। व्यापम के बाद जरूर किसी और घोटाले की खबर मिलेगी भाजपा की किसी सरकार से जुड़ी हुई। वैसे तो बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी ढूंढने से मिल जाएंगे घोटाले। लेकिन इन राज्यों में न तो खोजी पत्रकार पहुंचेंगे, न ही कांग्रेस के जासूस। सोनिया गांधी ने साफ-साफ इशारा किया है कि मोदी सरकार की छवि खराब करने के लिए वह किसी भी विपक्षी दल के साथ हाथ मिलाने के लिए सहर्ष तैयार हैं।
हकीकत यह है कि न गांधी परिवार को विपक्ष में रहने की आदत है, न कांग्रेस को। और अगर नरेंद्र मोदी अगले चार वर्षों में किसी न किसी तरह परिवर्तन और विकास लाने में सफल हो जाते हैं, तो संभव है कि कांग्रेस को पांच वर्ष और विपक्ष में रहना पड़े। यह भी संभव है कि अगर 2024 तक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने का मौका नहीं मिलता है, तो कभी नहीं मिलेगा। सो, मोदी सरकार को निकम्मा साबित करना कांग्रेस के लिए बहुत जरूरी है। अगर तथाकथित घोटालों से ही घिरे रहते हैं हमारे प्रधानमंत्री, तो जाहिर है, वह नहीं ला पाएंगे वह परिवर्तन और विकास, जिसकी अपने इस देश को सख्त जरूरत है।