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कृषि कानूनों को व्यावहारिक बनाएं, होंगे ये फायदे

Thu, 29 Oct 2020 02:39 AM IST
राजेश प्रताप सिंह राजेश प्रताप सिंह
राजेश प्रताप सिंह Published by: राजेश प्रताप सिंह Updated Thu, 29 Oct 2020 02:39 AM IST
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Make agricultural laws practical, will get these benefits
किसान - फोटो : PTI

सितंबर 2020 भारतीय किसानों के लिए एक नई सुबह लेकर आया। सरकार इसे एक क्रांतिकारी कदम बता रही है, तो विपक्ष और किसान संगठन इसे किसान-विरोधी बता रहे हैं। सच्चाई क्या है, यह भविष्य बताएगा, पर तब वापस आना बहुत मुश्किल होगा। वर्तमान में जो हो-हल्ला हो रहा है, उससे तय है कि सच कहीं और है। अभी अस्तित्व में आए ये दो कृषि कानून हैं, ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020’ और ‘कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020’। प्रथम दृष्टया दोनों अधिनियम बहुत अच्छे प्रतीत होते हैं। पर व्यावहारिक रूप पर गौर करना जरूरी है। एक ही झटके में राज्य की मंडियों का अस्तित्व खत्म कर दिया गया। यह सही है कि मंडियों में भी किसानों का शोषण होता है। वहां पर भी माफिया हैं, इसके बावजूद किसान वहां जाता है और अपना सामान/ उपज बेचता है, जिसके उसे ठीक-ठाक दाम मिल जाते हैं। 


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सबसे बड़ी बात सरकार एक जगह विकसित कर किसानों को मार्केट के रूप में देती है। अब क्या निजी लोग इस तरह की जगह विकसित करके देंगे? मुझे संदेह है। यदि करेंगे, तो निश्चित तौर पर किसानों से अतिरिक्त शुल्क लेंगे। यह कहना आसान है कि अब उत्तर प्रदेश का किसान बिना रोक-टोक के केरल या पश्चिम बंगाल में अपना सामान बेच सकेगा। मगर ध्यान रखना होगा कि आज भी छोटे किसान अपने उत्पाद सरकार समर्थित मूल्य पर इसलिए नहीं बेच पाते, क्योंकि उनके पास इतने संसाधन नहीं होते कि तौल केंद्रों तक जा सकें और फिर उन्हें अपनी देनदारी तुरंत चुकानी होती है, जबकि सरकारी खरीद में पैसा खाते में कुछ दिन बाद आता है। यह पूरा सिस्टम छोटे किसानों के लिए अत्यंत अहितकर है। इससे बिचौलियों का एक नया समुदाय उत्पन्न होगा। 

अब एक नजर विवाद की स्थिति से निपटने की प्रक्रिया पर डालते हैं। एक्ट के अनुसार किसी तरह के विवाद की स्थिति में उप खंड-अधिकारी एक सुलह बोर्ड के माध्यम से उसे निपटाएंगे। इस तरह के विवाद में सिविल कोर्ट का कोई अधिकार नहीं होगा। दस क्विंटल पैदा करने वाला एक किसान किसी संपन्न व्यापारी से कैसे न्याय पाएगा, हम कल्पना कर सकते हैं। वैसे भी यह सोचना कि हर उप खंड अधिकारी, दुर्गा नागपाल जैसा होगा, बेमानी है। कुल मिलाकर बड़े और संपन्न किसान तथा व्यापारी ही इस ऐक्ट का फायदा लेंगे, वही छोटे किसानों का उत्पाद खरीद कर अपने तरीके से बेचेंगे। 

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात है कि किसान कौन है? अगर कोई उत्तर प्रदेश का किसान एक ट्रक अनाज बिहार ले जाता है, तो रास्ते में पड़ताल के दौरान वह कैसे सिद्ध करेगा कि वह किसान है। जाहिर है, उसे अपने खेत की खतौनी लेकर चलना होगा। फिर यह भी बताना होगा कि सारी पैदावार उसके खेत की है। अगर यह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होता है, तो उसे अपनी खतौनी पहले ही अप लोड करनी पड़ेगी। यह कितना व्यावहारिक है, यह हम कल्पना ही कर सकते हैं। आज भी सुदूर ग्रामों में इंटरनेट की दिक्कत रहती है। दूसरा ऐक्ट मुख्य रूप से कृषि सेवा पर करार को वैध करता है। प्रथम दृष्टया यह बहुत अच्छा लगता है। प्रश्न यह है कि क्या अब कोई सुधार की गुंजाइश है कि नहीं? उत्तर सकारात्मक है, बशर्ते सरकार कुछ नियमों को समावेशित करे।

मेरे विचार से मंडी प्रणाली को और पारदर्शी एवं प्रभावशाली बनाया जाए और निजी लोगों को इसका प्रयोग करने दें, जिससे उन पर सरकार का नियंत्रण बना रहे। खाद्यान्न के मामले में जोखिम लेना उचित नहीं है। अभी कोविड काल में हमने देखा कि कैसे निजी अस्पतालों ने लूट मचाई है। करार प्रणाली में निम्न बात एकदम स्पष्ट होनी चाहिए- पहला, अधिक से अधिक कितने एकड़ तक एक एजेंसी करार कर सकती है। दूसरे, जो छोटी जोत के किसानों के साथ करार करे, उसे कुछ अतिरिक्त सुविधा दी जाए। तीसरा सबसे जरूरी है कि कर की राशि न्यूनतम समर्थित मूल्य से किसी भी दशा में 15 फीसदी से अधिक न हो। चौथा, किसानों को खाद-पानी की सुविधा सही ढंग से दी जाए, इसे निजी क्षेत्र के सहारे न छोड़ा जाए। यह सही समय है जब सभी राजनीतिक पार्टियां अपने निजी स्वार्थ किसानों के मामले में छोड़ें और सही दिशा में चल कर उनका विकास करें, इसी में हम सबकी और समाज की भलाई है। 

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