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महाराष्ट्र चुनाव: राजनीति संभावनाओं का खेल है... क्या महायुति की प्रबंधन क्षमता 'नाराजगी' पर काबू पा सकेगी?

Tue, 19 Nov 2024 05:10 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 19 Nov 2024 05:10 AM IST
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सार
दोनों गठबंधनों का अपने-अपने इलाकों में वर्चस्व है। पश्चिमी महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर महाराष्ट्र और शहरी क्षेत्रों में भाजपा और ठाणे व कोंकण में शिंदे की शिवसेना का वर्चस्व है। सिनेमा की तरह राज्य की राजनीति कई नायकों वाली हो गई है। संभावनाओं की सुई कांटे की टक्कर की ओर इशारा कर रही है।
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Maharashtra Elections Politics is a game of possibilities Mahayuti vs MVA and claims of majority
महाराष्ट्र चुनाव 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कल बीस नवंबर (बुधवार) को महाराष्ट्र के मतदाता विधानसभा चुनाव के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह फैसला राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा, क्योंकि इस चुनाव से कई राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं का भविष्य तय होगा। महाराष्ट्र का महत्व लोकसभा की सीटों और जीडीपी के आकार से कहीं ज्यादा है। यह सॉफ्ट पावर और हार्ड कैश का केंद्र है। यहां भारत की व्यावसायिक राजधानी है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने राजनीति के एक पूंजी आधारित वेंचर बनने की प्रक्रिया को उजागर किया है। सिनेमाई दुनिया की तरह राज्य का राजनीतिक शासन एक नायक से कई नायकों वाला बन गया है। राज्य की पार्टियां इस कहावत को सही ठहराती हैं कि ‘राजनीति संभावनाओं की कला है।’



राजनीतिक मुहावरों को नए तरीके से गढ़ने में यह ट्रेंड-सेटर रहा है। 1970 के दशक में शरद पवार की राजनीतिक चतुराई को परिभाषित करते हुए एक दर्जन से ज्यादा पार्टियां एकजुट हुईं। 1995 में बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन ने विरोधी दलों के बिखरे हुए मतदाताओं का फायदा उठाने की रूपरेखा तैयार की। 1999 में एक-दूसरे से अलग हो चुकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए फिर से हाथ मिलाया। और वर्ष 2019 से पार्टियों ने राजनीतिक निष्ठा की अवधारणा को नए ढंग से परिभाषित किया है। एक तरह से कल राज्य के मतदाताओं की लोकतंत्र के साथ अनिश्चित-सी मुलाकात होगी। पिछले पांच वर्षों में देखा गया है कि सत्ता का रास्ता ईवीएम से नहीं, बल्कि राजनीतिक स्टॉक एक्सचेंज से गुजरता है। शब्दकोश वादा को एक अनुबंध के रूप में परिभाषित करता है, जो खरीदार को एक निश्चित तारीख पर संपत्ति खरीदने या बेचने के लिए बाध्य करता है। विकल्प (ऑप्शन) भी खरीदार को यही अधिकार देता है, लेकिन उस पर खरीदने या बेचने की बाध्यता नहीं होती।


महाराष्ट्र वास्तव में एक जीवंत प्रयोगशाला है, जो संभावित विलय और सुविधाजनक अधिग्रहण के लिए वादा और विकल्प के इस्तेमाल का एक खुला राजनीतिक एक्सचेंज है। निवेश का सूचकांक पार्टियों द्वारा जीती गई सीटों के गणित पर निर्भर करता है। निश्चित रूप से दोनों गठबंधन-महायुति और महा विकास अघाड़ी-स्पष्ट बहुमत से जीत का दावा कर रहे हैं। हालांकि आम सहमति त्रिशंकु विधानसभा से इन्कार नहीं करती है, जिसमें आईपीएल की शब्दावली उधार लेकर कहें, तो इंपैक्ट सब्स्टीट्यूट (प्रभावी विकल्प) सक्रिय होंगे। 2,000 से अधिक निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी संख्या चुनने का विकल्प प्रदान करती है। जैसा कि 1995 में हुआ था, क्षेत्रीय क्षत्रपों ने प्रतिस्पर्धा की संभावनाओं को कम करने के लिए गठबंधन के भीतर छद्म उम्मीदवारों को प्रोत्साहित किया था। दल-बदलुओं की भीड़ के कारण होने वाली अराजकता चुनाव चिह्नों की उलझन के कारण और बढ़ जाती है, जिसमें 163 उम्मीदवार असमंजस भरे चुनाव चिह्नों के साथ लड़ रहे हैं और राकांपा उम्मीदवार उलझन पैदा करने वाली पार्टियों के चुनाव चिह्न पर लड़ रहे हैं। हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि स्पष्ट बहुमत आने से गठबंधन में कोई बदलाव नहीं होगा।

मुख्यमंत्री पद की लड़ाई और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए गठबंधन में शामिल पार्टियों को पर्याप्त सीटें जीतनी होंगी या यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोधी घटक अच्छा प्रदर्शन न करें। दूरसंचार की तरह मतदाताओं से संपर्क रोमिंग व्यवस्था की प्रभावशीलता एवं गठबंधन के भीतर वोटों के हस्तांतरण पर निर्भर करती है-और अजित पवार की राकांपा तथा उद्धव ठाकरे की शिवसेना इस मामले में कमजोर नजर आती है। यदि भाजपा को करीब सौ सीटें मिलती हैं, तो इससे एकनाथ शिंदे की फिर से मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षाओं पर ग्रहण लग सकता है, 50 से कम सीटें उद्धव की शिवसेना की तस्वीर बदल सकती हैं और भाजपा और शिंदे सेना के बीच 130 का आंकड़ा अजित पवार को परेशान करेगा। पार्टियों की सफलता की दर राजनीति के भूगोल पर भी निर्भर करेगी, खासकर आरक्षण की मांग वाले क्षेत्र में। सोशल इंजीनियरिंग के सभी प्रयास सीमाओं के नियम से नियंत्रित होते हैं। प्रभावी रूप से, किसी एक वर्ग को लुभाने के प्रयास (जैसे, माली, धनगर और बंजारा समुदायों में ओबीसी एकीकरण का प्रयास) ने मराठवाड़ा में मराठों और उत्तरी महाराष्ट्र में आदिवासियों के बीच नाराजगी और उल्टी एकजुटता को जन्म दिया है। दोनों गठबंधनों का अपने-अपने इलाकों में वर्चस्व है। जैसे, पश्चिमी महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर महाराष्ट्र और शहरी क्षेत्रों में भाजपा और ठाणे व कोंकण में शिंदे की शिवसेना का वर्चस्व है। महत्वपूर्ण बात यह होगी कि 35 से अधिक सीटों पर कांग्रेस कैसा प्रदर्शन करती है, जहां उसका मुकाबला भाजपा से है, खासकर विदर्भ में। उद्धव शिवसेना का खासकर मुंबई और कोंकण की सीटों पर शिंदे शिवसेना से आमने-सामने का मुकाबला है। वास्तव में, इसका नतीजा मराठवाड़ा, विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र की महा-लड़ाई में तय होगा। इन तीनों क्षेत्रों में भारी असंतोष है। मराठवाड़ा और विदर्भ का जातिगत आरक्षण से परे उपेक्षा का इतिहास है।

1983 में वीएम दांडेकर के नेतृत्व वाली फैक्ट फाइंडिंग कमेटी द्वारा पहली बार पहचाने गए पिछड़ेपन का मुद्दा अब भी बना हुआ है और इससे प्रति व्यक्ति आय की क्षेत्रीय असमानता का पता चलता है। अब जाति के नक्शे पर उपेक्षा, कृषि संकट और किसानों के बीच गुस्से के मुद्दे भी हावी हो गए हैं। मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों को ऋण और इनपुट तक पहुंच की समस्या से जूझना पड़ रहा है, जिससे उन्हें उत्पादन बढ़ाने में कठिनाई हो रही है। उत्तर महाराष्ट्र में निर्यात के लिए निर्धारित उत्पादों पर नीतियों में लगातार बदलाव के कारण फसल का मुद्रीकरण करना चुनौती है। हालांकि अभी सब कुछ धुंधला है, लेकिन इसकी रूपरेखा लोकसभा चुनाव के नतीजों से तैयार होती है, जिसमें महा विकास अघाड़ी ने 48 संसदीय सीटों में से 30 पर जीत हासिल कर महायुति को मात दी थी। हालांकि, बारीक विवरण बताते हैं कि मुकाबला ज्यादा कड़ा था। एमवीए ने 153 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की, जबकि महायुति ने 127 पर बढ़त हासिल की। सवाल यह है कि क्या शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई लाडकी बहिन योजना और महायुति की चुनाव प्रबंधन क्षमताएं आर्थिक चिंता और राजनीतिक नाराजगी पर काबू पा सकती हैं।

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