बाजार का बढ़ता तिलिस्म
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आज बाजार का जमाना है, जिसमें हमारा पूरा अस्तित्व बाजार के नियंत्रण में आता जा रहा है। और जो शेष है, जल्दी ही उसकी परिधि में दिखाई पड़ेगा। कोई क्या खाए, क्या पिए, कहां जाए, क्या पढ़े, क्या देखे, क्या सुने सब पर बाजार का पहरा है। बाजार ही यह सब तय करता है और अपने हिसाब से हमारे सामने परोसता है। हमारा स्वाद, हमारा जायका, सभी आज बाजार के इशारे पर नाच रहा है। ज्ञान और कर्म की सारी इंद्रियों पर बाजार काबिज होता जा रहा है। ऊपर से देखने पर लगता है कि बाजार एक उन्मुक्तता देता है, चुनने की छूट देता है और एक हद तक समर्थ होने का एहसास देता है। ऐसे में हम खुद को शक्तिशाली भी महसूस करने लगते हैं। पर यह हमारे मन का कोरा भ्रम होता है, क्योंकि इसका आधार आदमी की अपनी बुद्धि या विवेक न होकर लुभावने विज्ञापन होते हैं, जो एक नया यथार्थ गढ़ते हैं, आकर्षक और दिलासा देनेवाला यथार्थ।
आज विज्ञापन हमें रचने लगा है और विज्ञापन की डोर व्यापारी के हाथ में है, जिसकी नजर केवल अपने फायदे पर ही गड़ी रहती है। आज नमक से लेकर वायुयान तक सब चीजों का विज्ञापन होता है। बाजार की परिभाषा में विज्ञापन एक जायज व्यवहार है और केवल व्यापारी ही नहीं, सामाजिक संस्थाएं और सरकारें तक इनसे अछूती नहीं रहीं। हर व्यापार में विज्ञापन का अच्छा-खासा बजट होता है और इसे बनाने वाले बड़े-बड़े प्रशिक्षित विशेषज्ञ होते हैं। ये विज्ञापन केवल सूचना ही नहीं देते, वे (नकली!) साक्ष्य भी मुहैया कराते हैं कि अमुक चीज अमुक अभिनेता, गायक, नर्तक या खिलाड़ी से जुड़ी है- वह उन्हें अच्छी लगती है या फिर वे वस्तु की उपयोगिता की कसम खाते हैं और उसे उपयोग में लाने की सलाह देते हैं। दर्शक के लिए उनके चहेते नायक की जुबान बड़ी कीमती होती है। उनकी प्रतिष्ठा से जुड़कर वह सामान एक नया अर्थ पा जाता है। और फिर ऐसे सामान से अपने आप को जोड़ कर गाहक मगन हो उठता है।
यहां गौर करें, तो यह बात साफ हो जाती है कि यहां जरूरतों का व्यापार और सौदा हो रहा है। विज्ञापन जरूरतें बेचता है, जरूरी और गैरजरूरी, दोनों तरह की, और हम सभी इन अंतहीन जरूरतों को खरीदते जाते हैं। इनको सही ठहराने के लिए सही गलत हर तरह के तर्क गढ़े जाते हैं और हम नई जरूरतों से लैस हो जाते हैं। जरूरतें बनी रहें, कम न हों इस हेतु यह भी बताया जाता है कि जरूरतें बासी पड़ रही हैं और ऐसा होना आधुनिक होने के लिए नुकसानदेह है। इस बदलते मिजाज के नए जमाने में अगर किसी के पास कम जरूरत हो, तो वह गंवार या असभ्य करार दिया जाता है।
बाजार अपनी जरूरत के मुताबिक जरूरतें बेच रहा है, उसे इसकी खुली छूट मिली हुई है। आज हम विज्ञापनों की प्रखर छाया तले जीवन जी रहे हैं। अखबार, टी वी, पत्रिकाएं, सड़कों के किनारे खड़े बोर्ड, नियोन लाइट के दूधिया बल्ब सब मिलकर विज्ञापन की एक जबर्दस्त दुनिया खड़ी करते हैं, जिसके असर से सामान्य व्यक्ति को अपने चंचल मन को सुरक्षित बचा ले जाना एक बेहद मुश्किल चुनौती बन जाती है। वह फंस जाता है और बेहिसाब खरीदता जाता है। खरीद को आसान बनाने के लिए रुपये नहीं, प्लास्टिक का क्रेडिट कार्ड है, जो ऊपर से लगता है कि बिना किसी खर्च के ही हमारा काम आसान हो गया है। पर यह गलतफहमी सिर्फ खरीदारी को बढ़ावा देने के लिए ही होती है। सच्चाई यह भी है कि लोग खरीदार होकर बिक रहे हैं और परेशानियां इतनी कि लोग संतप्त होकर आत्महत्या तक पर उतारू हो उठते हैं।
आज भारत देसी और विदेशी हर किस्म के व्यापारियों के लिए स्वर्ग सरीखा हो रहा है। वे यहां हर चीज खपाने को तैयार हैं। देश एक कूड़ा या कचरा का घर बनता जा रहा है। यहां बढ़ती आबादी के चलते उपभोक्ताओं की कमी नहीं है। मध्य वर्ग खोखली प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए खरीदारी की और बढ़ रहा है, ताकि उच्च वर्ग की नकल कर आगे बढ़ सके। आज केवल बाजार बढ़ रहा है और खरीदारी प्रतिष्ठा और सभ्यता का पैमाना बनती जा रही है। खरीदारी का अब जरूरतों से उतना घना रिश्ता नहीं होता, जितना औरों की तुलना में अपने लिए ऊंची जगह बनाने और बनी हुई जगह को सुरक्षित रखने से होता है। जो है उससे ऊब कर, नए-नए फैशन और चाल-ढाल कहीं किसी से पिछड़ न जाएं इस डर से लोग जरूरी, गैरजरूरी यहाँ तक की कभी-कभी उलजलूल किस्म की यानी हर तरह की खरीदारी में लगे हुए हैं। खरीदारी व्यसन बन रही है।
जो है उससे संतुष्टि तो कम है, पर जो नहीं है, उसकी असंतुष्टि ज्यादा है। और बाजार है कि रोज चीजों के नए-नए मॉडल बनाकर कमी और अभाव का तीव्र एहसास दिलाने से बाज नहीं आता। इस तरह की निरंतर असंतुष्टि और उससे उपजी कुंठा में जीना आज बहुतों की नियति-सी बनती जा रही है। बाजार के चमचमाते मॉल के पीछे छिपी कहानी बड़ी दर्दनाक और खतरनाक ढंग से जीवन विरोधी है। कच्चे माल को नैसर्गिक पर्यावरण को नष्ट कर प्राप्त करना, पर्यावरण के संतुलन को खोना, उत्पादन में विषैले रसायनों का प्रयोग करना, यंत्रों की सहायता से कम लागत पर अधिक मात्रा में उत्पाद को पैदा कर आकर्षक रूप में इस तरह पेश करना, कि वह ‘बेहद जरूरी है’-एक बड़ी साजिश रची जाती है।
इस तरह ऐसा क्रम बनता है कि आदमी खरीदने पर मजबूर हो जाए। पूंजीपति की लाभ की आशा के आगे सारे सच झूठे हो जाते हैं और आदमी एक वस्तु बनता जाता है। बाजार का विन्यास और चरित्र बदल रहा है। कभी मेले-ठेले और बाजार करना उत्सव होता था, पर अब बाजार विमानवीकरण का बहाना बनाता जा रहा है। इस कठिन समय में हमें यह समझना होगा कि बाजार हमारे लिए है, न कि हम बाजार के लिए। जीवन जीने का विवेक यदि नहीं होगा, तो न यह धरती बचेगी, न हम लोग, क्योंकि धरती का कोष सीमित है।
(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति हैं)