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मदारी पासी उर्फ एक सदी पूर्व की किसान-गाथा
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
मदारी पासी के किसान आंदोलन का समय 1920 से 1928 के बीच का था। वही समय काकोरी कांड के क्रांतिकारी घटनाक्रम का था, तथा उसके बाद 1931 में चंद्रशेखर आजाद-भगत सिंह-गणेश शंकर विद्यार्थी के बलिदानों की उस कड़ी तक भी ‘एका’ के सूत्र खोजने पर हमें मिल जाते हैं।
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1920 से 1931 तक के उस कालखंड को मुक्ति-संग्र्राम के इतिहास के रूप में दर्ज करने की पहल तब तक आधी-अधूरी ही रहेगी, जब तक कि उसमें बाबा रामचंद्र और मदारी पासी के किसान आंदोलन के पृष्ठों को चस्पां न किया जाए। मदारी हरदोई के थे और उनके ‘एका’ आंदोलन का प्रभाव इस इलाके से जुड़ा उन्नाव और कानपुर के आसपास का रहा था, जिसकी जड़ें अवध तक थीं। यह इस क्षेत्र की ऐसी अग्निधर्मी किसान चेतना थी, जिसे तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं ने भी स्वीकार किया था, भले ही अपने वर्ग चरित्र के मुताबिक वे उससे वैसा सघन तादाम्य स्थापित नहीं कर पाए।
किसान उन दिनों साम्राज्यवाद और सामंतवाद की दो पाटी चक्की के बीच घुट-पिस रहे थे। उन बेहद अमानवीय स्थितियों के बीच बाबा रामचंद्र और मदारी पासी ने अपनी जिजीविषा और चेतना से खेत जोतने-बोने वाले किसान को सत्ता-शासन के षड्यंत्रों के विरुद्ध लामबंद करने का जो कौशल दिखाया था, वह सलाम करने योग्य है।
तब जो बड़े नेता किसानों के संघर्ष के साथ दिखाई भी पड़ रहे थे, वे सब शहरी मिजाज के थे, इस कारण बाबा रामचंद्र इस तरह के किसान नेतृत्व के प्रति सदैव ही आशंकित ही बने रहे। उस आंदोलन की एक विशेषता यह थी कि लोग बाबा रामचंद्र की जय के साथ गांधी की जय का भी हुंकारा भरते थे। किसानों का वह संघर्ष सिर्फ उनकी जीवन स्थितियों की तब्दीली के लिए ही नहीं था, बल्कि गुलामी से मुक्ति के लिए उसने देहात की बड़ी आबादी को एकताबद्ध भी किया था।
उस किसान संघर्ष के मध्य धार्मिक और जाति के खांचे पूरी तरह निरर्थक हो गए थे। वहां सिर्फ दो ही जातियां थीं-एक जमींदार और दूसरी किसान। पूरे उत्तर भारत में वह किसान आंदोलन साम्राज्यवादी हुकूमत और सामंतों- जमींदारों के लिए बड़ी चुनौती बन गया था, जो ‘नजराना’, ‘मुर्दाफरोशी’ तथा ‘लड़ाई-चंदा’, ’घोड़ावन’, ‘फोड़ावन’ और 'चारावन’ जैसे न जाने कितने टैक्सों को अपने कंधों से उतार फेंकने के लिए उद्धत था।
मदारी और उनके सहयोगी प्रतापपुर के देव पासी जाति के थे। सत्तावनी क्रांति में अवध में सबसे ज्यादा सहयोग इसी जाति के लोगों का रहा। जवाहरलाल नेहरू की डायरी में इस किसान आंदोलन के ब्योरे हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी और उनका 'प्रताप' अखबार इस किसान आंदोलन के प्रेरक और प्रचारक थे। किसानों पर बाबा रामचंद्र के भाषणों का जबर्दस्त असर होता था।
किसान इस कदर उनके पीछे लामबंद हो गए कि ब्रिटिश सरकार उनसे खौफ खाने लगी। दरअसल, मदारी एक लंबी लड़ाई के लिए जमीन तैयार कर रहे थे। उन्होंने किसानों से कराई जाने वाली प्रतिज्ञाओं में कुछ और जोड़ दिया था, जैसे कि वे जब भी बेदखल होंगे, अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे, लगान रबी और खरीफ में ही देंगे, बिना रसीद लिए लगान नहीं देंगे, बिना पैसे लिए बेगार नहीं करेंगे, बिना पैसा दिए तालाब का पानी सिंचाई के लिए लेंगे, जंगल और परती जमीन पर अपने जानवर चराएंगे, जमींदार और कारिंदा के हाथ कोई ज्यादती या बेइज्जती नहीं सहेंगे, जमींदारों के जुल्म का विरोध करेंगे, किसी भी अपराधी को गांव में कोई सहायता नहीं करेंगे और ‘एका’ का प्रचार करेंगे। गांधी के स्वराज्य में उनकी आस्था थी और वह देश की आजादी में किसानों की मुक्ति का सपना भी देख रहे थे।
मदारी गांधीवादी नहीं, निखालिस लड़ैये किसान नेता थे। वह जिलेदार और उनके तालुकेदारों की ओर से सिपाहियों द्वारा किसानों पर चलवाई गई लाठियों के विरुद्ध धनुष चला सकते थे। उनके मोर्चारत रहते ग्रामीण कमजोर किसान जनता को आवाज मिली। उनके द्वारा सण्डीला तहसील की घेरेबंदी और थक-हारकर एसडीएम की लखनऊ भिजवाई गई चिट्ठी इसका मुंह बोलता नमूना था। कांग्रेस और खिलाफतियों के लिए मदारी का यह चरित्र असुविधाजनक ही था। कांग्र्रेस वैसे भी जमींदारों के खिलाफ इस तरह खड़े होने के लिए तैयार नहीं थी। आखिर कुंजरू में होने वाली किसान सभा में कांग्रेस ने खुलकर किसानों को हिस्सेदारी करने से रोका ही।
अंग्रेजों की तो बड़ी चिंता यह थी कि बाबा रामचंद्र और मदारी पासी का किसान आंदोलन ज्यादा उग्र न हो जाए। पुलिस तंत्र को उन दिनों यह जाहिर होने लग गया था कि शायद काकोरी के क्रांतिकारियों और मदारी पासी के बीच रिश्तों की कोई डोर हो। क्रांतिकारी शिव वर्मा, जयदेव कपूर और कॉमरेड शिवकुमार मिश्र का मदारी से जुड़ाव था। वर्ष 1931 में मदारी नहीं रहे। बाबा रामचंद्र और उन जैसा ईमानदार व समर्पित किसान नेतृत्व आजादी के बाद फिर इस देश को नहीं मिल सका।