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घाटी में अमन की तलाश

Thu, 14 Jun 2018 06:13 PM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Thu, 14 Jun 2018 06:13 PM IST
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Looking for peace in the valley
घाटी में अमन की तलाश
जम्मू-कश्मीर, खासतौर से घाटी में गर्मियों के मौसम में अमन की यादें हमारी साझा स्मृतियों में धुंधली पड़ती जा रही हैं। इन गर्मियों का सिर्फ एक हासिल यह है कि केंद्र और श्रीनगर स्थित गठबंधन सरकार के बीच शांति कायम करने को लेकर समन्वय है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह की कुपवाड़ा की संयुक्त यात्रा को अहम कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।

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हालांकि वे भिन्न पृष्ठभूमि के राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा हैं और उनके रिश्तों में अंतर्निहित विरोधाभास हैं, लेकिन मतभेदों के बावजूद रमजान के महीने में संघर्ष विराम के राज्य सरकार के प्रस्ताव पर न केवल केंद्र सरकार की प्रतिध्वनि सुनाई दी, बल्कि उसने सुरक्षा बलों के सभी हिस्सों से विरोध के बावजूद इस पर अमल किया। पत्थरबाजों को माफी देने का फैसला भी घाटी में माहौल सुधारने की दिशा में एक अहम कदम है। भारत के घरेलू दृष्टिकोण के आधार पर कोई इन्हें सांकेतिक कदम कह सकता है, क्योंकि रमजान हो या न हो, पाकिस्तान के रवैये और वहां से संचालित गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं आने वाला। 

रमजान से ऐन पहले भारतीय सेना उस त्रासद घटना से उबर नहीं पाई थी, जब मार्च के आखिर में पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा के पास उसने अपना एक जवान सीमा पार की गोलीबारी में खो दिया। अप्रैल के आखिर में पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत के डीजीएमओ से नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलाबारी को लेकर फोन पर बात की, क्योंकि पाकिस्तान भारत की जवाबी कार्रवाई से परेशान हो गया। 

इसके बाद रमजान के मध्य में पाकिस्तान के रेंजरों ने बीएसएफ की चार चौकियों को निशाना बनाया। तीन जून को अखनूर, कानाचक और खौर सेक्टरों में पाकिस्तान की फायरिंग और गोलाबारी में बीएसएफ के एक अधिकारी और एक जवान की मौत हो गई और 14 अन्य लोग घायल हो गए, जिनमें अधिकांश नागरिक थे। जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी रेंजरों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तनाव घटाने के लिए फ्लैग मीटिंग का आग्रह किया। इसके बावजूद बुधवार को सांबा में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की ओर से हुई गोलाबारी में एक कमांडेंट सहित बीएसएफ के चार जवान मारे गए।

अहम सवाल यह है कि क्या घाटी में आतंकी हिंसा में कोई कमी आई है। ऐसा लगता नहीं। श्रीनगर के ह्रदयस्थल पर आतंकवादियों की गोलीबारी में एक पंचायत सदस्य सात जून को गंभीर रूप से घायल हो गया। जून की शुरुआत से श्रीनगर में कर्फ्यू लागू है। दक्षिणी जिले शोपियां में मार्च से कायम तनाव कम नहीं हुआ है, जब पाकिस्तान से सरहद पार कर आए एक आतंकी और लश्करे तैयबा के कमांडर की मौत के विरोध में वहां प्रदर्शन शुरू हो गए थे। 

हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकारों के साझा प्रयासों के बावजूद कोई क्रांतिकारी सकारात्मक बदलाव के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, बल्कि कुछ संदेश स्पष्ट तौर पर उभर रहे हैं। यह छिपा नहीं है कि पाकिस्तान का ध्यान जम्मू-कश्मीर के दक्षिणी हिस्से पर केंद्रित है। भौगोलिक रूप से और सूक्ष्मता के साथ कहें, तो यह पुंछ से लेकर शोपियां और फिर अनंतनाग तक फैला  हिस्सा है, जहां सारी भड़काने वाली कार्रवाइयां केंद्रित हैं। इस क्षेत्र में पूर्व की तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमा में जहां उत्तर की ओर नियंत्रण रेखा से मिलती है, स्थिति सबसे विस्फोटक हो गई है और हाल के समय में सर्वाधिक फायरिंग वहीं हुई है। 

पुंछ और शोपियां से यह पूर्व की ओर क्रमशः 120 किलोमीटर और 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जहां जिला मुख्यालय हैं और इसके आगे ही अनंतनाग का रेलवे स्टेशन है। अमरनाथ जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए अनंतनाग अहम पड़ाव है। यह पहलगाम और शेषनाग होकर अमरनाथ जाने का सबसे छोटा रास्ता है। आठ जून की रिपोर्ट के मुताबिक छोटे समूहों और सुरक्षा बलों के बीच अनंतनाग में जुमे की नमाज के बाद भारी टकराव पैदा हो गया था। केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों के लिए अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा रणनीतिक रूप से अहम है।

सिर्फ हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुस्लिमों के लिए भी उतना ही महत्व है, क्योंकि वे मानते हैं कि अमरनाथ तीर्थयात्रियों के कारण उनकी गुजर-बसर हो जाती है। उनका जीवन अमरनाथ यात्रा पर निर्भर है। इसीलिए पुलिस यात्रा के मार्ग की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है और उसी के अनुसार सुरक्षा बलों की तैनाती होती है।

पुलिस सूत्र बताते हैं कि उन्होंने दक्षिणी कश्मीर में पहलगाम और उत्तरी कश्मीर में सोनमर्ग से होकर गुजरने वाले यात्रा के रास्तों पर तैनाती के लिए 22,000 अतिरिक्त बलों की मांग की है। सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी के अलावा कुछ इलाकों में सेना की भी तैनाती की जाएगी, ताकि किसी भी आतंकी हमले का करारा जवाब दिया जा सके। अमरनाथ यात्रा 28 जून से शुरू होगी और दो महीनों तक जारी रहेगी। 

अमरनाथ तीर्थ के प्रति स्थानीय स्तर की श्रद्धा और सम्मान के उलट लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुटों के निशाने पर अमरनाथ यात्रा होती है, क्योंकि इसके जरिये वे जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करते हैँ। उन्होंने स्थानीय आबादी में गहरी जड़ें जमा ली हैं। सैन्य बलों की कार्रवाई में मारा गया आतंकी बुरहान वानी हिज्बुल मुजाहिदीन का स्थानीय कमांडर था। 

केंद्र और राज्य की सरकारों के राजनीतिक शोर-शराबे के बावजूद यह एक लंबा सैन्य संघर्ष कायम रहेगा, जिसके लिए उन्हें खुद को तैयार करना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों में कुछ अंतरालों के बाद सुस्ती भले आए, लेकिन वहां टकराव जारी रहेगा। यह इस युद्ध की प्रकृति है। लेकिन अगर केंद्र और राज्य सरकारें वर्तमान जैसे संयुक्त विश्वास योग्य कदम उठाती हैं, तो वास्तव में दीर्घकालिक समाधान निकल सकता है।  
-लेखक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।
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