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बरस-बतकही: चौबीस की चार सौ बीसी, देश का मूड दिखा रहे हैं चैनल

Mon, 01 Jan 2024 07:43 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Mon, 01 Jan 2024 07:43 AM IST
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सार
जो कल तक एक-दूसरे के दुश्मन थे, अब एक-दूसरे के वकील बनकर ‘दोष’ को भी ‘गुण’ बताते हैं। 2024 के बाद इनके बीच कैसी ‘तू तू मैं मैं’ होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। फिर ‘इंडी’ के उथले पानी में कांग्रेस रूपी बड़ी मछली, दूसरी छोटी मछलियों को कब निगल ले, इसकी फिक्र अलग!
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Lok Sabha Elections 2024 News Channels Reporting Survey Modi in power again Ayodhya Ram Mandir politics
New Year 2024 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

‘डंकी’ फेल! ‘एनिमल’ हिट!!


‘इंडी’ फेल!‘एनडीए’ हिट!!
ढांचा फेल! मंदिर हिट!! जो हिट! वही फिट!!
अपनी राजनीति में इंडी ‘पोकेमेन’ खेल रहा है तो एनडीए ‘ठोकेमेन’ खेल रहा है।

चैनल राष्ट्र का मूड दिखा रहे हैं, जिनमें यह राष्ट्र तीन दिन में सौ बार अपनी मुंडी हिलाकर कह चुका है कि मोदी फिर आ रहा है, विद गारंटी ‘चार सौ’ लेकर आ रहा है, अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कराता हुआ आ रहा है।
लेकिन कैसी विडंबना कि जिन दिनों ‘मंदिर मंदिर’ हो रहा था, उन्हीं दिनों ‘इंडी वाले’ संसद के हमलावरों को ‘बेरोजगारी की अभिव्यक्ति’ कहकर महिमा मंडित कर रहे थे और संसदीय नियमों को तोड़ और एवजी में संसद से निलंबन आमंत्रित कर, संसद की सीढ़ियों पर बैठ, एक सांसद द्वारा आदरणीय उपराष्ट्रपति की ‘मिमिक्री’ को देख ठहाके लगा रहे थे। सच! ‘केष्टो मुखर्जी’ फिल्मों में चल सकता है, संसद में नहीं।


और अब ‘इंडी विपक्ष’ में इस पर हाय-हाय है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह में राम मंदिर ट्रस्ट ने इसे, उसे बुलाया और हमें न बुलाया...कुछ कह रहे हैं कि बुलाएंगे तो जाएंगे। सेक्यूलर कह रहे हैं कि हम सेक्यूलर, हम क्यों जाएं?
राम के परम भक्त एक आचार्य कह रहे हैं कि भगवान राम के जन्म का यह मुहूर्त त्रेता के बाद अब आया है...वे हिंदू को, सनातन को मिटाने की बात करते हैं। अब यह नहीं चलने का...अब हिंदू जाग गया है...
कल तक जो कहानी हिंदुओं पर हंसती थी, वही अब रो रही है।

एक एंकर सर्वे दिखाकर ‘इंडीवालों’ का पहले दिल तोड़ता है कि अगर आज चुनाव हों, तो बीजेपी/एनडीए को 330-335 सीट तक मिल सकती हैं और प्राण प्रतिष्ठा के बाद तीन-चार प्रतिशत वोट और बढ़ा समझिए।
एक एंकर कटाक्ष करता है कि 224 सीटों पर तो बीजेपी ने पहले से ही 50 प्रतिशत वोट लिए हैं यानी ये सीट तो कहीं गई नहीं, फिर ‘इंडी’ में जैसे ‘समूराई’ हैं, वे तो सभी ‘पीएम’ बनने के लिए जी रहे हैं। जरा देखिए तो, दो समुराइयों ने एक का नाम आगे कर दिया, तो बिहार भर का मुंह सूज गया, क्योंकि जिस बंदे ने ‘इंडी’ का ‘आइडिया’ दिया, उसी को बाकियों ने ‘भिंडी’ बना दिया!

सच कहूं, तो चौबीस के लिए आम जनता वोट दे चुकी है। बहस है, तो इस पर कि एनडीए कितनी सीटों से जीत रहा है और इंडी के ‘समूराई’ कितनी सीटें बचा पा रहे हैं। और, यही बात बोर करती है। अभी पांच महीने और बोर होना है।
तो भी, हमारी हमदर्दी ‘इंडी’ वालों के साथ है, लेकिन हम भी क्या करें, ज्यादातर ‘इंडी’ वाले अभी तक अपनी ‘सुस्ती’ में ही ‘मस्त’ हैं। हां एक कुंवर जी अवश्य ‘पूरब से पश्चिम’ करने जा रहे हैं, जबकि चुस्त-चौकस एनडीए वाले’ अभी से हर सीट, हर बूथ और माइक्रो बूथ तक की तैयारी में जुटे हैं!

यों, कुछ पहले इन्हीं कुंवर जी ने ‘दक्षिण से उत्तर’ तक मुहब्बत की पैदल दुकान चलाई थी, लेकिन जैसे ही पिछले पांच राज्यों के चुनावों में से तीन बड़े राज्यों में बीजेपी ने ‘इंडी’ का सूपड़ा साफ किया, त्यों ही इंडी वालों ने ‘उत्तर दक्षिण’ करना शुरू कर दिया। तय मानिए कि कुछ दिन बाद कुछ लोग ‘पूरब बरक्स पश्चिम’ को आपस में लड़वाने के चक्कर में होंगे। इधर भाजपा 2024 के लिए हर बूथ पर अपना झंडा गाड़ती दिखेगी, उधर विपक्षी सिर्फ ‘लेफ्ट राइट’ करते दिखेंगे और फिर क्रंदन करते दिखेंगे कि ‘हाय ईवीएम’, ‘हाय चुनाव आयोग’, ‘हाय सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग’, ‘हाय अदाणी, हाय अदाणी’ हाय हाय...!

एक आफत हो, तो कहें। ‘इंडी’ के पास अभी तक न ‘चेहरा’ है, न ‘सीट आबंटन’ है, न बीजेपी व संघ के सघन हिंदुत्ववादी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की काट करने वाला कोई पॉपुलर विकल्पी नारा है, न मोदी जैसा आत्मविश्वासी, भविष्यवादी नेता, न मोदी जैसा गारंटीशुदा राजनीतिक आख्यान; नेरेटिव है, जिस पर रीझकर आम जनता ‘इंडी’ को अपना वोट डाल दे।

इधर भाजपा-संघ का ‘एकचालकानुवर्तते’, उधर ‘इंडी’ की अधबनी रसोई में अट्ठाईस रसोइए! इधर एक फैसला, एक देवता, उधर दो दर्जन से अधिक देवता और ‘नो फैसला’ या ‘स्लो फैसला। इधर अयोध्या का भव्य राम मंदिर और अब मथुरा, काशी का एजेंडा, उधर राम विरोधी, मंदिर विरोधी, कारसेवकों के हत्यारे, सनातन को मिटाने वाले, गौमूत्र क्षेत्र को हेय कहने वाले और हिंदी वालों को दक्षिण का ‘मेहतर’ कहने वाले नफरतिये...

इस आत्मघृणावादी ‘उपनिवेशी मानसिकता’ के विरुद्ध ही संघ का ‘हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ जन स्वीकृति पाता है। ‘इंडी’ विपक्ष इसे जितना ठोकता है, उतना ही यह हमदर्दी पाकर बढ़ता जाता है! 2024 के चुनाव को भाजपा से भी पहले, यही ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ लड़ रहा है और हर चुनाव के बाद यह घनीभूत हो रहा है।

इसीलिए इसकी हर आलोचना इसे और अधिक ‘स्वीकार्य’ बनाती है। विपक्ष ‘सांस्कृतिक राजनीति’ की इस ‘गूढ़ व्यंजना’ को समझ ही नहीं सकता, इसलिए उसकी हर चोट अब आम हिंदू को और अधिक एकजुट करती है।
‘इंडी’ की संरचनात्मक मुसीबतें भी कम नहीं : एक तो जितने नेता, उतने पीएम, अट्ठाईस देवता, अट्ठाईस अहंकार, सब की अपनी-अपनी बात, ऊपर से साथ, अंदर से घात!

जो, कल तक एक-दूसरे के दुश्मन थे, अब एक-दूसरे के वकील बनकर ‘दोष’ को भी ‘गुण’ बताते हैं। 2024 के बाद इनके बीच कैसी ‘तू तू मैं मैं’ होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। फिर ‘इंडी’ के उथले पानी में कांग्रेस रूपी बड़ी मछली, दूसरी छोटी मछलियों को कब निगल ले, इसकी फिक्र अलग!

तिस पर अपने कुंवर जी का ‘जाति गणना’ का आत्महंता राग और यह तक न समझ पाना कि जाति आधारित हर आरक्षण अंततः ‘हिंदुत्व’ के ‘महाकाय’ को ही मजबूत करेगा! मंडल के बाद यही हुआ और ‘मंडल-2’ हुआ, तो फिर इसी ‘हिंदू कमंडल-2’ का शंख और जोर-शोर से बजेगा।

मोदी युग के बीते दस बरस में और कुछ हुआ हो या न हुआ हो, इतना जरूर हुआ है कि कभी न बोलने वाला ‘हिंदू’ अब बोलने लगा है। चालू ‘ग्लोबल हिंदूफोबिया’ के दौर में आम हिंदू को हिंदुत्व में अपना भविष्य दिखने लगा है। विपक्ष इसे ‘बहुसंख्यकवाद’ कहकर लाख कोसे, जनतंत्र बहुसंख्या’ से ही चलता है। इसलिए जब तक अपनी राजनीति में, ‘सांस्कृतिक राजनीति’ का ‘हिंदू अखाड़ा’ खुला है, तब तक हिंदुत्व से सिर्फ हिंदुत्व ही जीत सकता है!
यही चौबीस की चार सौ बीसी है।

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