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लोकसभा चुनाव 2024: कांग्रेस के वादों और इरादों को छह कसौटियों पर परखें

Sun, 14 Apr 2024 06:07 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 14 Apr 2024 06:07 AM IST
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सार
देश में अखिल भारतीय स्तर वाले दो प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही हैं। भाजपा ने 30 मार्च को अपनी घोषणापत्र समिति का गठन किया, जबकि कांग्रेस ने पांच अप्रैल को अपना घोषणापत्र जारी किया।
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Lok Sabha Election 2024: Manifesto of Intentions
कांग्रेस का घोषणापत्र - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

उनके सिपहसालार पहले किए गए वायदों को चुनावी जुमला बताकर फारिग हो सकते हैं, लेकिन मेरा वोट उसे जाएगा, जो संघीय मूल्यों की रक्षा करेगा, अपने वायदों को याद रखेगा और संविधान, संसदीय लोकतंत्र, मानवाधिकार, स्वतंत्रता व निजता के आदर्शों को कायम रखेगा।



एक घोषणापत्र उन मुद्दों पर इरादों और विचारों का एक लिखित रूप है, जो लोगों के लिए मायने रखते हैं। इसकी कुछ मिसालें जो ध्यान में आती हैं, वे हैं, अमेरिका में 1776 की स्वतंत्रता घोषणा और 14-15 अगस्त,1947 के दरम्यान जवाहरलाल नेहरू का ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ वाला भाषण। इसी तरह 24 जुलाई, 1991 को डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने यादगार भाषण में, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा को ही बदल दिया था, विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था, ‘पृथ्वी की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ गया हो।’ इन बयानों/भाषणों ने नए शासकों के इरादों की स्पष्ट रूप से घोषणा की।


दूसरी ओर, यह भी संभव हो सकता है कि किसी व्यक्ति द्वारा दिया गया कोई बयान या भाषण उसके असल इरादों को छिपाने वाला हो। ऐसे ही कुछ बयान हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी को परेशान करने वाले हैं। मिसाल के तौर पर, ‘मैं प्रत्येक भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपये डालूंगा’, ‘मैं प्रति वर्ष दो करोड़ नौकरियां पैदा करूंगा’, ‘मैं किसानों की आय दोगुनी करूंगा’ इत्यादि। उनके सिपहसालार इन्हें चुनावी जुमला बताते हैं। देश में अखिल भारतीय स्तर वाले दो प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही हैं। भाजपा ने 30 मार्च को अपनी घोषणापत्र समिति का गठन किया, जबकि कांग्रेस ने पांच अप्रैल को अपना घोषणापत्र जारी किया। काश, मैं अपने इस लेख में दोनों घोषणापत्रों की तुलना कर पाता, लेकिन फिलहाल सिर्फ कांग्रेस का ही घोषणापत्र उपलब्ध है। इसलिए मैं उन प्रमुख कसौटियों का जिक्र करूंगा, जिनके आधार पर पाठकों और मतदाताओं को दोनों राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों की तुलना करनी चाहिए।

भारत का संविधान
कांग्रेस ने कहा, ‘हम दोहराते हैं कि भारत का संविधान हमारी कभी न खत्म होने वाली यात्रा में एकमात्र मार्गदर्शक और साथी रहेगा।’ लोग यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या भाजपा संविधान का पालन करेगी या इसमें आमूल-चूल संशोधन करेगी। यह सवाल एक राष्ट्र, एक चुनाव, समान नागरिक संहिता, नागरिकता संशोधन अधिनियम (जो फिलहाल शीर्ष न्यायालय में चुनौती के अधीन) जैसे अस्थिर करने वाले और विभाजनकारी विचारों के संदर्भ में उठा है। भाजपा को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह संविधान में निहित संसदीय लोकतंत्र के वेस्टमिंस्टर सिद्धांतों का पालन करेगी।

सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना, आरक्षण
कांग्रेस ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार देशव्यापी सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना कराएगी। वह आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा को बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन कराएगी। आर्थिक तौर पर कमजोर वर्गों के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 फीसदी का आरक्षण सभी जातियों और समुदायों के लिए खुला रहेगा। कांग्रेस एक विविधता आयोग की भी स्थापना करेगी, जो रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में विविधता को बढ़ावा देगा। भाजपा को भी अपने इरादे स्पष्ट करने चाहिए, ताकि लोग समझ सकें कि समानता के मुद्दे पर दोनों दल कहां खड़े हैं।

अल्पसंख्यक
भारत में धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक हैं। कांग्रेस ने कहा है कि उसका मानना है कि सभी भारतीयों को समान रूप से मानव अधिकार प्राप्त हैं, जिनमें किसी धर्म का पालन करने का अधिकार भी शामिल है और इसमें बहुसंख्यवाद और अधिनायकवाद के लिए कोई जगह नहीं होगी। बहुलतावाद और विविधता भारत के लोकाचार के हिस्से हैं। भाजपा ने कांग्रेस पर ‘तुष्टिकरण’ का आरोप लगाया है, जो उसके जग-जाहिर अल्पसंख्यक विरोधी दृष्टिकोण का कोड-नाम है। क्या भाजपा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को लागू करने और समान नागरिक संहिता पारित करने के अपने दृढ़ संकल्प को फिर से दोहराएगी? चूंकि, धार्मिक अल्पसंख्यक इन दोनों कानूनों को भेदभावपूर्ण मानते हैं, इसलिए उन्हें भाजपा के घोषणापत्र का इंतजार है।

युवा और नौकरियां
असंतोषकारी औसत विकास दर (5.9 फीसदी), स्थिर विनिर्माण क्षेत्र (जीडीपी का 14 फीसदी), कम श्रमबल भागीदारी दर (50 फीसदी) और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी (स्नातकों में 42 फीसदी) के चलते देश का जनसांख्यिकीय लाभांश कम हो रहा है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की नौकरियों में 30 लाख रिक्तियों को भरने, अप्रेंटिसशिप के अधिकार संबंधी कानून को पारित करने, कॉरपोरेट्स के लिए रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना लागू करने, जो नई नौकरियां पैदा करेगी और स्टार्ट-अप योजना को बढ़ावा देने के लिए एक कोष की स्थापना करने का वादा किया है। इससे जाहिर तौर पर युवा उत्साहित हैं। भाजपा-राजग सरकार के पास युवाओं के लिए नौकरियों की कोई भरोसेमंद योजना कभी रही ही नहीं। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल भाजपा इससे ज्यादा आकर्षक योजना पेश कर पाएगी।

महिलाएं
चुनावी प्रक्रिया में महिलाएं सबसे उत्साही भागीदार रही हैं। वे प्रचार के लिए दिए जा रहे भाषणों को सुनती हैं और फिर आपस में बहस करती हैं। यह बिल्कुल प्रामाणिक बात है कि कांग्रेस के तमाम वादे सही साबित हुए हैं। चाहे वह महालक्ष्मी योजना (प्रत्येक गरीब परिवार को हर साल एक लाख रुपये) हो, मनरेगा के तहत रुपये 400 की दैनिक मजदूरी हो, महिला बैंक का पुनरुद्धार हो या फिर चाहे केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का वादा ही क्यों न हो। क्या भाजपा हिंदुत्व की अपील से आगे बढ़कर ठोस योजनाओं के साथ आएगी, यह देखना है।

संघवाद
सबसे चर्चित मुद्दा है भाजपा का अधिनायकवाद। भाजपा ने संघवाद और भारत के राज्यों का संघ होने की सांविधानिक घोषणा को कमजोर किया है। एक राष्ट्र, एक चुनाव का विचार बेहद संदेहास्पद है। यह सिर्फ एक सरकार, एक पार्टी और एक नेता का मार्ग प्रशस्त करेगा। कांग्रेस के घोषणापत्र में संघवाद पर एक अध्याय में 12 बिंदु हैं, क्या भाजपा इनमें से किसी पर भी सहमत है? इसमें सबसे दूरगामी वादा कुछ क्षेत्रों को समवर्ती सूची से राज्य सूची में स्थानांतरित करने पर आम सहमति बनाना है। इन 12 बिंदुओं पर ही भाजपा की साख की परख होगी। जहां तक मेरा मानना है, सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा संविधान, संसदीय लोकतंत्र, मानवाधिकार, स्वतंत्रता व निजता और सांविधानिक नैतिकता के प्रति चुनाव लड़ने वाले दलों की प्रतिबद्धता है। मेरा वोट उसको जाएगा, जो इन सिद्धांतों की शपथ लेगा और इन्हें कायम रखेगा।

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