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सियासत: विपक्ष में विचारों की कमी, आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के बजाय देशहित हो सर्वोपरि

Fri, 18 Aug 2023 07:23 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Fri, 18 Aug 2023 07:23 AM IST
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सार
देशहित में विपक्ष केवल यह न दर्शाए कि वह सरकार के खिलाफ है, बल्कि यह भी बताए कि आखिर वह चाहता क्या है। सिर्फ आलोचना करने के बजाय वह यह भी सुझाए कि किसी काम को बेहतर कैसे किया जा सकता है।
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lok sabha election 2024 instead of criticising govt opposition should suggest issues in interest of country
Bengaluru Opposition Meeting - फोटो : Agency

विस्तार

प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर के मुताबिक, किसी भी रणनीति का मूल तत्व यह चुनना होता है कि क्या नहीं करना है। कुछ साल पहले एक कामयाब एंटरप्रैन्योर ने अनौपचारिक बातचीत में कुछ न करने की रणनीति के भारतीय तर्क के बारे में बताया। इससे पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की वह मशहूर उक्ति भी याद आती है कि, 'निर्णय न लेना भी एक निर्णय होता है।' एंटरप्रैन्योर को उसके पिता से मिली सीख का सार यह था कि विरोधी हमेशा आपकी बुद्धिमत्ता और सही काम करने की क्षमता पर संदेह करेंगे। लेकिन किसी भी तरह के प्रलोभन में फंसना और कुछ कर या कहकर संदेह को सही साबित करना बड़ी भूल साबित हो सकता है। भारत के विपक्षी राजनीतिक दलों के गठबंधन 'इंडिया' का मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला कुछ ऐसा ही था।



इस पूरी कसरत ने इंडिया समूह के अनुयायियों और उनके समर्थकों के सबसे भयावह डर को सामने ला दिया। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी ने इस पूरी प्रक्रिया को 2024 के अपने चुनावी अभियान के शुभारंभ में तब्दील कर दिया। गौरतलब है कि विपक्षी दलों का गठबंधन पिछले काफी समय से लोकतांत्रिक संस्थाओं को  कमजोर करने, महंगाई के मुद्दे की अनदेखी करने और ध्रुवीकरण के बढ़ते खतरे जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। पर अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान विपक्षी दलों की खराब रणनीति, राजनीतिक कौशल व तैयारी की कमी और आरोप लगाने की प्रक्रिया के बुनियादी तरीके को लेकर अनभिज्ञता साफ झलक रही थी।


विपक्षी गठबंधन का दावा है कि अविश्वास प्रस्ताव ने प्रधानमंत्री को संसद में आकर बोलने के लिए मजबूर किया है। हालांकि उसका यह भी आरोप है कि प्रधानमंत्री ने मणिपुर पर सिर्फ दो मिनट बोला और उसके बाद भी कई महत्वपूर्ण सवालों पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। रणनीति कितनी ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसके नतीजे ही मायने रखते हैं। नेपोलियन ने एक बार अपनी सेना से कहा था कि जब दुश्मन गलती कर रहा हो, तब हस्तक्षेप न करना ही बेहतर होता है। सवाल उठता है कि क्या विपक्षी दलों के उद्देश्य 'कुछ न करने' की रणनीति से ज्यादा बेहतर ढंग से पूरे हो सकते थे?

बेंजामिन फ्रेंकलिन की एक कहावत है कि अगर आप तैयारी करने में असफल रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप विफल होने की ही तैयारी कर रहे हैं। विपक्षी दलों की तैयारी कितनी पुख्ता थी? 2018 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री ने विपक्षियों को धन्यवाद देते हुए अपनी बात रखी थी। तब उन्होंने भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित की पंक्तियों के जरिये विपक्षियों की खराब तैयारी पर निशाना साधा था।

2023 में उन्होंने भगवान और विपक्षी दलों को धन्यवाद देते हुए एक दूसरे कवि की पंक्तियों की मदद से गठबंधन की दरारों को उजागर किया और 2028 में फिर से कोशिश करने के लिए आमंत्रित किया। मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए मौके का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने अपने द्वारा पारिभाषित भारत के राजनीतिक इतिहास की भूलों को गिनाया, चाहे वह 1966 में मिजोरम में इंदिरा गांधी के कृत्य हों या फिर कानून-व्यवस्था लागू करने में उनकी नाकामी। कांग्रेस पर निशाना साधने का मकसद भारत के समग्र राजनीतिक भूगोल को एक संदेश देना था।

2019 के चुनाव में 180 से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस के खिलाफ भाजपा ने 91 फीसदी से ज्यादा सीटें जीती थीं। वह उस रिकॉर्ड को दोहराना चाहेगी। दूसरी ओर, विपक्ष के हमले में न धार थी, न फोकस था। 18 राजनीतिक दलों में जो सांसद अच्छे वक्ता थे, उन्हें सामने नहीं लाया गया। भारत जोड़ो यात्रा के बाद एक बार फिर से उभरे और हाल ही में सांसद के तौर पर बहाल हुए राहुल गांधी को असहमति की आवाज का नेतृत्व की भूमिका के लिए चुना गया, ताकि वह अविश्वास प्रस्ताव के औचित्य को समझा पाएं। उन्होंने जोश तो दिखाया, फिर भी वह भटके हुए दिखे। दूसरे विपक्षी दल भी बिखरे थे और नारेबाजी करते रहे। 'इंडिया' गठबंधन का कहना था कि अविश्वास प्रस्ताव सरकार पलटने के लिए नहीं, बल्कि 'धारणा' की लड़ाई जीतने के लिए लाया गया था।

सवाल उठता है कि क्या यह हो पाया। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार कामयाबी के कई दावे कर रही है, लेकिन उन्हें सवालों के जवाब भी देने होंगे। विपक्ष सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि महिलाओं पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। यह भी कि समुदायों को बांटने वाले नफरती अभियानों पर सरकार मौन बनी हुई है। विपक्ष यह भी कहता आया है कि सरकार महंगाई पर काबू पाने में, बेरोजगारी की समस्या से निपटने में, शहरों में बार-बार आने वाली बाढ़ों व इनसे होने वाली मुश्किलों को कम करने में और न्यायालयों में लंबित मामलों के 5.02 करोड़ के ऐतिहासिक आंकड़े तक पहुंचने जैसी समस्याओं से निपटने में नाकामयाब रही है।

अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले विपक्ष को इन सभी पर समग्र ढंग से अपनी बात कहनी चाहिए थी, पर ऐसा हो नहीं पाया। आज के इंटरनेट युग में 'धारणा' की लड़ाई जीतने के लिए नई तरह की राजनीति जरूरी है। भाजपा इसके लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करती है। पर विपक्ष अब भी पुरानी मुहावरेबाजी में लगा है। क्या उन्हें इतने सारे वक्ताओं को मैदान में उतारने की जरूरत थी? क्या ऐसी कोई कोशिश की गई कि विषयों को भूगोल या फिर विशेषज्ञता के आधार पर वक्ताओं में आवंटित किया जाए? विपक्षी दल अपने मतदाताओं के सवाल और उनके अनुभव पेश कर सकते थे, जिनका जवाब देना सत्ताधारी दल के लिए भी चुनौती होता।

पिछले कुछ महीनों में विपक्षी दलों की कुछ उम्मीदें जगी हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि लोगों में कहीं न कहीं बेचैनी है। लेकिन इस आधार पर एक मुहिम चलाकर सत्ताधारी पार्टी को चोट पहुंचाने में उसे कामयाबी नहीं मिल सकी है। राजनीतिक बयानबाजियां देश की आकांक्षाओं और राजनीति में फर्क नहीं कर पा रहीं। राजनीतिक दलों को देश के सांस्कृतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों और राजनीतिक सत्ता में फर्क करना होगा। देशहित में जो जरूरी है, वह यह कि विपक्ष केवल यह न दर्शाए कि वह किसके खिलाफ है, बल्कि यह भी बताए कि वह आखिर चाहता क्या है। वह केवल आलोचना न करे, बल्कि यह भी सुझाए कि किसी काम को बेहतर कैसे किया जा सकता है। राजनीति केवल बहस करने का धंधा नहीं है। भारत को अपनी क्षमताओं को साकार करने के लिए राजनीतिक वर्ग से भी प्रतिस्पर्धी विचारों की दरकार है।

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