फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Lok Sabha Election 2019: People on margins in Democracy with increasing poll expenditure

लोकशाही में हाशिये पर लोक, करोड़ों रुपये का खेल बन चुका है लोकसभा चुनाव लड़ना

Sun, 21 Apr 2019 10:40 AM IST
आसिम खान गिरीश्वर मिश्र
गिरीश्वर मिश्र Published by: आसिम खान Updated Sun, 21 Apr 2019 10:40 AM IST
विज्ञापन
Lok Sabha Election 2019: People on margins in Democracy with increasing poll expenditure
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

जनता जब नेता चुनती है, तब स्वयं अपने को उससे जोड़ती है, उसके साथ अपना तादात्मीकरण करती है और आशा करती है कि वे उनका दुख-दर्द समझेंगे, उनकी बात सबके सामने रखेंगे, उपयोगी नीति बनाएंगे और जनहित के कार्य करेंगे। नेता वस्तुत: जनता का माध्यम होता है, जो स्वीकृत व्यवस्था में लोक-हित को सुरक्षित करने का प्रयास करता है। उसे जनता के हितों का पहरुआ होना चाहिए। 


loader

जनता जब नेता चुनती है, तब स्वयं अपने को उससे जोड़ती है, उसके साथ अपना तादात्मीकरण करती है और आशा करती है कि वे उनका दुख-दर्द समझेंगे, उनकी बात सबके सामने रखेंगे, उपयोगी नीति बनाएंगे और जनहित के कार्य करेंगे। नेता वस्तुत: जनता का माध्यम होता है, जो स्वीकृत व्यवस्था में लोक-हित को सुरक्षित करने का प्रयास करता है। उसे जनता के हितों का पहरुआ होना चाहिए। 

नेता से यह अपेक्षा होती है कि वह निजी स्वार्थों से आगे बढ़कर देश की चिंता करे। यही बात उसके सारे प्रयासों के केंद्र में होनी चाहिए। आज यह बात फिर से दोहराने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में जो राजनीतिक दौर चला, उसकी परिणति घोटालों, नैतिक मूल्यों के क्षय और घोर अकर्मण्यता की संस्कृति में हुई, जो देशहित में कदापि नहीं हैं। 

रसूखदार बड़े नेताओं, मंत्रियों और उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से भ्रष्टाचार और कामचोरी की संस्कृति ही स्थापित होती गई। जो जरूरी राजनीतिक साक्षरता और परिपक्वता हमसे अपेक्षित थी, उनसे हम दूर भटक गए। राष्ट्रीय राजनीति के लिए निजी स्वार्थ से तटस्थ होकर सोचने की जरूरत थी, जिस ओर हमने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय हमने राजनीति को अपने या अपने समुदाय के सीमित स्वार्थ को सिद्ध करने के साधन के रूप में काम में लाना शुरू कर दिया, जिसका खामियाजा आज हम सभी भुगत रहे हैं। 

आज हम विलक्षण असंगतियों के बीच जीने को अभिशप्त हैं। सुरक्षित न रख पाने के कारण हर साल लाखों टन अनाज सड़ता है, तो गरीब भुखमरी के शिकार हैं। युवा हर साल महंगी फीस देकर विदेश पढ़ने जाते हैं और अपने यहां के विश्वविद्यालयों की फीस में थोड़ी भी वृद्धि का विरोध करते हैं। पीने का पानी घटता जा रहा है और सस्ते जल शोधन के अभाव में करोड़ों लीटर पानी नित्य व्यर्थ बहाया जा रहा है। हर तरह का प्रदूषण जीवन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। 

औपचारिक शिक्षा बुद्धि पर अतिशय केंद्रित है तथा हृदय और हाथ, श्रम और करुणा से उसका वास्ता घटता जा रहा है। सरकारी व्यवस्था के समानांतर प्रभावी निजी शिक्षा के संस्थान तेजी से खड़े हो रहे हैं। छात्रों और अध्यापकों समेत शैक्षिक परिसर अस्त-व्यस्त हो रहे हैं और गुणवत्ता के सवाल गौण हो रहे हैं। चूंकि शिक्षा के परिणाम तत्काल नहीं दिखते, इसलिए किसी को उनकी चिंता नहीं है।  

अंग्रेजों से मुक्ति के बाद आभिजात्य से मुक्ति की आशा थी। सोचा गया था कि प्रजातंत्र में साधारण मनुष्य की, लोक की प्रतिष्ठा होगी। पर हुआ उल्टा। लोकशाही में लोक को हाशिये पर धकेल दिया गया है और अब राजनीति को सिर्फ पैसेवालों के लिए आरक्षित खेल का दर्जा देकर आम जन को उससे एक तरह से बहिष्कृत ही कर दिया गया। 

सामाजिक भेदभाव का अद्भुत उदाहरण संसद में महिलाओं के समुचित प्रतिनिधित्व का मामला है, जो अब भी खटाई में ही है, जबकि हमारी अधिकांश महिला सांसद अपनी योग्यता और कर्मठता का लोहा मनवा रही हैं। लोक तो तब आगे आता, जब नेता जन समुदाय से निकलता। आज की राजनीति में जनता को अपना नेता चुनने की छूट नहीं है। 

विभिन्न दलों के आलाकमान जिन्हें नामित करते हैं, उन्हीं महारथियों में से उसे किसी को चुनना होता है। इस तरह नेता उस पर थोपे जाते हैं। ऊपर से थोपे गए नेता कितना जन प्रतिनिधित्व करेंगे, यह संदेहास्पद रहता है। खुद उसकी दावेदारी पार्टी जिन पैमाने पर तय करती है, उनमें चयनित नेता की जाति, व्यवसाय, आय आदि ही प्रमुख होते हैं। वह समाज में वोट बटोरने वाला होना चाहिए। उससे भी ज्यादा मुश्किल है चुनावी खर्च ढोना। 

अब लोकसभा का चुनाव लड़ना करोड़ों रुपये का खेल बन चुका है और साधारण हैसियत वाले नेता की औकात से परे है। राजनीतिक पार्टियां चुनाव के लिए आर्थिक मदद करती हैं। लोग पार्टियों को ‘गुप्त दान’ देते हैं। किस्से तो ये भी सुनाई पड़ते हैं कि कुछ पार्टियां या उसके मालिक टिकट बेचते हैं। जो नेता टिकट खरीद सके, खरीद ले, उसे पार्टी का चुनाव चिह्न मिल जाएगा। 

आजकल दृश्य और श्रव्य मीडिया में बहुतेरे राजनेताओं की अनियंत्रित और कभी-कभी बेसिर पैर की बयानबाजी देख-सुनकर आम जन सकते में हैं कि इनके हाथों में देश की बागडोर थमाना कितना घातक हो सकता है। कोई नेता किसी प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं दे रहा। उनसे पूछा कुछ जाता है, उत्तर कुछ मिलता है। प्रत्याशियों को लेकर नितांत स्थानीय जातिगत समीकरण को आधार बनाया जा रहा है। इनके पास जनता के साथ साझा करने के लिए देश और समाज केंद्रित कोई नैरेटिव नहीं है।

अगले पांच साल के लिए भारत के राजनीतिक भविष्य का फैसला निश्चय ही एक बड़ा फैसला है, जिस पर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का भाग्य निर्भर करेगा। झूठे वादों और भड़काऊ नारों से आगे बढ़कर यह एक निहायत जिम्मेदारी भरा काम है, जिसे संजीदगी से लेने की जरूरत है। 

यह अवश्य दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का जो राग चुनावी दौर में अलापा जाता है, वह अगले पांच साल में अक्सर भुला दिया जाता है। पार्टियों के घोषणापत्र सिर्फ धोखे की पट्टी साबित हुआ करते हैं। हमें ऐसे प्रतिनिधि चुनने चाहिए, जो देश और समाज से सरोकार रखते हों तथा जिनमें नैतिकता का आग्रह और मानवीय संवेदनाएं भी हों।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed