फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Listen to each other

एक-दूसरे की सुनें

Sat, 30 Dec 2017 11:47 AM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Sat, 30 Dec 2017 11:47 AM IST
विज्ञापन
Listen to each other
बहस

भारत में राजनीतिक विमर्श बहुत हंगामेदार हो गया है। यह एक अलग तरह का ध्वनि प्रदूषण पैदा कर रहा है! यह राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों की सियासी सेहत के लिए नुकसानदेह है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए भी हानिकारक है। खासकर चुनाव प्रचार के दौरान विरोधी दलों द्वारा पूरी क्रूरता के साथ आरोप-प्रत्यारोप और अपमानजनक व भ्रामक टिप्पणियां की जाती हैं। हमेशा विरोधी पक्ष पर इसकी शुरुआत करने का आरोप लगाया जाता है। लगता ही नहीं कि महात्मा गांधी की इस सलाह पर कोई ध्यान देता है-महान लक्ष्यों को महान साधनों से प्राप्त करना चाहिए। इसके बजाय लगता है कि हमारे राजनेताओं ने चीन के नेता देंग श्याओ पिंग के मंत्र को दिल में उतार लिया है-जब तक बिल्ली चूहे पकड़ सकती है, तब तक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह काली है या सफेद! क्या यह भारतीय राजनीति का नया मानक है? क्या हर पक्ष यही मानता है कि लाखों भारतीय इस पर ध्यान नहीं देंगे?


loader

जो लोग कांग्रेस को बेकार बताते हुए दावा कर रहे हैं कि केंद्र में उसके लंबे शासन के दौरान कुछ नहीं हुआ और उससे ज्यादा राज्यों पर अब उनका शासन है, तो यह पूरी तरह से सच नहीं है। शशि थरूर की पुस्तक एन एरा ऑफ डार्कनेस में इसका विस्तृत ब्योरा दिया गया है कि 1947 में अंग्रेजों से किस हालत में भारत को छोड़ा था। कांग्रेस के शासन की अवधि पर एक सरसरी निगाह डालने से ही यह दिख जाएगा कि औपनिवेशिक शासन के लंबे दौर से उभरे एक राष्ट्र की अंतर्निहित कमजोरियों-विभाजन की भयावहता, अल्प वित्तीय और मानव संसाधन, सांप्रदायिक दंगे और भ्रष्टाचार के बावजूद बहुत कुछ हासिल किया गया। औद्योगिक आधार की नींव रखना और कई संस्थानों की स्थापना को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन यदि भारत ने दूसरी नीति अपनाई होती, तो क्या दक्षिण कोरिया, जापान और चीन की तरह तेज विकास नहीं कर सकती या अधिक कुशलतापूर्वक और प्रामाणिक रूप से शासन का संचालन नहीं होता, इन प्रश्नों पर विचार करने में कुछ भी गलत नहीं है।
 
मई 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुमलेबाजी, सपनों की भव्य बिक्री और कांग्रेस मुक्त भारत के जरिये किसी भी कीमत पर विभाजनकारी राजनीति का इस्तेमाल करते हुए क्या सब कुछ खारिज नहीं कर रहे हैं? क्या यह आत्मनिरीक्षण, विफलताओं से सबक सीखने, अपनी ताकत और कमजोरियों का आकलन करने तथा आगे की लड़ाई के लिए नई रणनीति अपनाने के प्रति अनिच्छा नहीं दर्शाती? सभी राजनीतिक दल ज्यादातर समय आधा सच ही बताते हैं! लेकिन किसको परवाह है? जो जीता वही सिकंदर!

प्रधानमंत्री मोदी ने 1,200 पुराने नियम और कानूनों को खत्म करने का दावा किया है, व्यापार सुगम बनाने वाले राष्ट्रों की सूची में भारत ने तीस पायदान की छलांग लगाई है, फिर भी आसियान एवं ओईसीडी की रैंकिंग में हम अब तक पीछे हैं। हालांकि यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए। इसी तरह जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों भारतीयों को बैंकिंग नेटवर्क में लाकर उन्हें अपने खाते में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की सुविधा उपलब्ध कराने को सिर्फ इसलिए नहीं खारिज किया जा सकता है कि बहुत से खातों में शून्य जमा राशि है। मोदी ने भारत को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान का नेतृत्व किया, इसे सिर्फ इसलिए दोष नहीं दिया जा सकता कि जल्दी से निर्मित हजारों शौचालयों में पानी की कमी, सीवरेज सिस्टम से कनेक्शन और पर्याप्त स्वच्छता का अभाव है।

ग्रामीण भारत में जरूरतमंद महिलाओं को उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलिंडर उपलब्ध कराना, सौभाग्य योजना के तहत ग्रामीण विद्युतीकरण, नकद विहीन लेन-देन को बढ़ावा देने के प्रयास, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं ने क्या करोड़ों भारतीयों के जीवन में सुधार नहीं लाया है? कुछ लोग इस बात से असहमत हैं कि विमुद्रीकरण और जीएसटी बड़े साहसिक सुधार हैं, जिन्हें दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करनी चाहिए। निस्संदेह अच्छी तरह से सोच-विचार कर लागू करने से लोगों को होने वाली गंभीर असुविधाओं और अवरोधों से बचा जाना चाहिए था, जो लोगों को सहना पड़ा। अगर प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई योजनाएं 60 फीसदी भी क्रियान्वित हो गईं, तो भारत बदल जाएगा। क्या हमें ऐसी संभावना का स्वागत नहीं करना चाहिए?

प्रधानमंत्री ने कहा है कि हमारे फैसले भले गलत हों, पर हम गलत इरादे से कुछ नहीं करते। यह एक स्वस्थ और आश्वस्तकारी दृष्टिकोण है। पर क्या हमें पिछली सरकारों द्वारा किए गए अच्छे कार्यों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए? आज नेहरू की आलोचना करना एक फैशन बन गया है, लेकिन क्या उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा के बल पर नवजात स्वतंत्र भारत को आगे नहीं बढ़ाया? अगर नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने मजबूत संदेहों के खिलाफ 1991-92 में आर्थिक उदारीकरण को लागू नहीं किया होता, तो क्या भारत भूमंडलीकरण का लाभ उठा पाता? अगर यूपीए-2 ने नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण का गठन नहीं किया जाता, तो क्या आज देश के एक अरब लोगों के पास आधार कार्ड होता?

यदि 2005 में मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने असैन्य परमाणु समझौता नहीं किया होता, तो क्या आज अमेरिका भारत को एक प्रमुख रक्षा और रणनीतिक साझेदार मानता? रिसाव की गंभीर समस्या के बावजूद क्या विश्व बैंक ने मनरेगा की प्रशंसा नहीं की है? तो फिर दूसरे को उसके किए का श्रेय देने के लिए अपना दिल बड़ा क्यों नहीं करना चाहिए। कोई भी नीति/ योजना/ पहल, जो भारत की सेवा करे, वह अच्छी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे किसने शुरू किया! हम इन बेकार की बहसों पर विराम क्यों नहीं लगा सकते? हम निरपेक्ष दृष्टि से देखें कि हम क्या कर रहे हैं और स्वयं से पूछें कि क्या यह भारत के व्यापक हित में है? दूसरों पर दोष मढ़ने से फायदा नहीं है, संतुलित विकल्प से ही देश का विकास होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed