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रियो छोड़ें, टोक्यो की बात करें

Mon, 22 Aug 2016 06:58 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Mon, 22 Aug 2016 06:58 PM IST
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Lets now talk about Tokyo 2020 olympic
शंकर अय्यर

यदि उसेन बोल्ट कोई राष्ट्र होता और राष्ट्रों के बीच उसकी रैंकिंग निर्धारित की जाती, तो बीजिंग ओलंपिक में उसका स्थान 27वां, लंदन ओलंपिक में 26वां और रियो ओलंपिक में 28वां होता। जबकि भारत का स्थान बीजिंग में 50वां, लंदन में 55वां और रियो में 67वां रहा। पिछले तीन ओलंपिक में बोल्ट ने नौ स्वर्ण पदक जीते, जबकि पूरे ओलंपिक इतिहास में भारतीय हॉकी टीम ने आठ और अभिनव बिंद्रा ने एक स्वर्ण पदक (कुल नौ) हासिल किए हैं। ऐसे में समाज में या सोशल मीडिया पर यह सवाल पूछा जाना आश्चर्यजनक नहीं है कि 131 करोड़ की आबादी और बीस खरब की अर्थव्यवस्था वाले देश का ओलंपिक में प्रदर्शन इतना खराब क्यों है!

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सिर्फ विलाप करने से नतीजे नहीं मिलते। बहस को इस तरफ मोड़ना होगा कि भारत ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन कैसे कर सकता है। अमूमन हम भारतीय अंतिम क्षण में रणनीति बनाते हैं। ऐसे में हम अगले ओलंपिक पर ध्यान केंद्रित करने से शुरुआत करते हैं। 2010 में होने वाले टोक्यो ओलंपिक में 1,433 दिन बचे हैं। अगले ओलंपिक के लिए अभी से योजना बनाना, फिर 2024 ओलंपिक के लिए भव्य योजना तैयार करने का विचार कैसा रहेगा? ऐसा पहले हुआ है। वर्ष 1996 में ब्रिटेन मात्र एक स्वर्ण और कुल 15 पदक के साथ 36वें पायदान पर पहुंच गया था। फिर उसने वर्ल्ड क्लास परफॉर्मेंस प्रोग्राम की शुरुआत की। नतीजतन सिडनी ओलंपिक में वह 10वें स्थान पर पहुंच गया। रियो में ब्रिटेन 27 स्वर्ण पदक के साथ कुल 67 पदक जीतकर दूसरे स्थान पर पहुंच गया। सफलता पसीना और प्रेरणा, दोनों की मांग करती है। इसलिए हमारी सरकार का सबसे पहला काम एक चैंपियन की तलाश करना है, फिर ऐसे प्रेरणादायक लोगों के समूह ढूंढना है, जो उसका मार्गदर्शन कर सके। यदि भारत योग को अभियान की तरह बढ़ावा दे सकता है, तो खेलों को उसका हिस्सा क्यों नहीं बनाता?
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सोशल मीडिया में खेल मंत्रालय के होने पर सवाल किए गए हैं। देश की आबादी और अर्थव्यवस्था के आकार से पदकों की संख्या जोड़कर भी टिप्पणियां की गई हैं। यूरोप के एस्सेन स्थित लेइब्निज इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च ने देश की आबादी और संपत्ति के आधार पर पदकों की भविष्यवाणी करने की कोशिश की थी। उसके अनुसार, भारत को 22 पदक जीतने चाहिए थे। पर पदकों का संबंध सिर्फ आबादी और संपत्ति से नहीं, बल्कि सामाजिक लोकाचार, खेल सुविधाओं में निवेश और प्रतिस्पर्धा से भी होता है। जब इन कारकों को शामिल किया गया, तो तस्वीर वास्तविकता के करीब पहुंची कि भारत को छह पदक मिल सकते हैं।
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खेल ढांचे का कोई एक सार्वभौमिक प्रारूप नहीं है। बीजिंग से रियो तक हर ओलंपिक में अमेरिका ने सौ से ज्यादा पदक जीते हैं और उसके कुल पदकों की संख्या 2,500 से अधिक है। वहां कोई खेल मंत्रालय नहीं है। वहां खेल का महत्वपूर्ण ढांचा स्कूलों में प्रतिभा की तलाश, विश्वविद्यालयों में छात्रवृत्ति और स्पांसरशिप तथा कुलीन एथलीटों के लिए चंदा जुटाने पर आधारित है। चीन ने 2008 से 2016 के बीच 258 पदक जीते हैं और वहां खेल कार्यक्रम सरकार द्वारा संचालित होते हैं। ब्रिटेन ने पिछले तीन ओलंपिक में लगातार औसतन 50 पदक जीते हैं। वहां खेल कार्यक्रमों को सार्वजनिक एवं निजी प्रयासों से संचालित किया जाता है।

भारत के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) वाला मॉडल आदर्श होगा। केंद्र एवं राज्य सरकारों को बुनियादी ढांचा तैयार करने के साथ वित्तीय सहयोग देना चाहिए। सरकारी कार्यक्रम यहां भूमिका निभा सकते हैं-स्मार्ट सिटी में खुली जगह और खेलों के लिए स्टेडियम जरूर होने चाहिए। खेल निकायों को पूरी तरह पेशेवर होना चाहिए, जिसमें राजनेता पूरी तरह बाहर रहें और खिलाड़ियों और खेल से जुड़े पेशेवरों को प्रतिभा चयन में योग्यता को सुनिश्चित करने दिया जाए। गोपीचंद पुलेला और उनके शिष्य की सफलता द्रोणाचार्य की जरूरत को रेखांकित करती है। यानी खेल निकायों को कोचों की तलाश करनी चाहिए, उन्हें पर्याप्त मानदेय देना चाहिए और प्रशिक्षित करना चाहिए। बेशक पैसे से ही सब कुछ नहीं होता, पर वित्त पोषण महत्वपूर्ण है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपना खेल बजट बढ़ाना होगा। इसके लिए लॉटरी, शराब, तंबाकू, पेय पदार्थों और ऑटो वाहनों पर कर लगाया जा सकता है। सुविधाओं के निर्माण से न केवल देश में खेल को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि लोग स्वस्थ भी रहेंगे। धन जुटाने के लिए खेल में कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी को शामिल करना चाहिए। भारत में 50 से ज्यादा अरबपति हैं, जिन्हें इस योजना के लिए प्रेरित किया जा सकता है। राष्ट्रीय खेल विकास कोष (जिसकी स्थिति अभी गड़बड़ है) का पेशेवर ढंग से प्रबंधन किया जाए, तो यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कॉरपोरेट फेलोशिप, संस्थानों के स्पांसरशिप, ब्रांड समर्थन और चंदे जुटाकर वित्त की व्यवस्था की जा सकती है।

कोई देश खेल में क्यों और कैसे अच्छा करता है, यह समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, जीवन विज्ञान, सांस्कृतिक राजनीति और अर्थशास्त्र का एक जटिल ढांचा है। जमैका मुश्किल से 30 लाख की आबादी और 16 अरब डॉलर की जीडीपी वाला देश है। उसेन बोल्ट तो हीरो है ही, पर तथ्य यह है कि सौ मीटर की दौड़ में सबसे तेज दौड़ने वाले 29 धावक जमैका के ही थे। उनके साथ जीवन विज्ञान है-वहां के लोगों के दिल का आकार बड़ा होता है, जो ऑक्सीजन के प्रवाह में मदद करता है और पेशियों का खिंचाव गति बढ़ाने में। वहां के सामाजिक जीवन में भी खेल संस्कृति दिखती है। स्कूल और कॉलेजों में एथलेटिक्स के कार्यक्रमों में स्टेडियम भरे रहते हैं।


जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी और सामाजिक लोकाचार का विकास नहीं होगा, तब तक खेल पुनर्गठन की कोई योजना सफल नहीं होगी। समाज को भी खेलों के लिए समय निकालना होगा, खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना होगा, स्कूलों और आवासीय इलाकों में खेलों के लिए खुली जगह सुनिश्चित करने के लिए लड़ना होगा।

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