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पश्चिम एशिया संकट और इससे उपजी अस्थिरताओं के बीच पहले के संकटों से क्या सीख सकते हैं?

Tue, 19 May 2026 05:53 AM IST
Devesh Tripathi पिनाकी चक्रवर्ती, रेशम नागपाल
पिनाकी चक्रवर्ती, रेशम नागपाल Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 19 May 2026 05:53 AM IST
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सार
पश्चिम एशियाई संकट और इससे उपजी अस्थिरताओं को लेकर सभी अपने-अपने समाधान बता रहे हैं। इन स्थितियों में, 1973-74 के पहले तेल संकट, 1990 के दशक के खाड़ी संकट और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से सीख लेकर हम कुछ नई चीजें जरूर कर सकते हैं।
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पश्चिम एशिया संकट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतों और रुपये के गिरते मूल्य की पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री ने हाल ही में लोगों से मितव्ययिता और संरक्षण के कई उपाय अपनाने की अपील की है। पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद तेल की कीमतों में आई तेजी ने देश के आयात बिल को बढ़ा दिया है, चालू खाता घाटे को विस्तृत कर दिया है, और रुपये का अवमूल्यन कर दिया है। नतीजतन, महंगाई का दबाव बढ़ा है और 2026 में आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ने का खतरा मंडरा रहा है, जिससे सरकारी वित्त पर गंभीर दबाव पड़ने की आशंका है।


पश्चिम एशियाई संकट तथा उससे जुड़ी आर्थिक अनिश्चितता को देखते हुए केंद्र सरकार ने चुनौतियों से निपटने के लिए 1,00,000 करोड़ रुपये का ‘आर्थिक स्थिरीकरण कोष’ बनाया है। सरकार का दावा है कि इस अतिरिक्त खर्च का राजकोषीय घाटे के स्तर पर असर बहुत कम होगा और वह वर्ष 2025-26 (संशोधित आकलन) के लिए तय राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का पालन करेगी, फिर भी मौजूदा संकट इन बजटीय अनुमानों को हासिल करने के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी 80 प्रतिशत से ज्यादा ऊर्जा आयात करता है, ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है। आने वाले साल में चालू खाता घाटा, महंगाई और जीडीपी वृद्धि पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।


अगर पिछली संकट की स्थितियां कोई मार्गदर्शन देती हैं, तो वर्ष 2026-27 में बेहतर मैक्रोइकनॉमिक प्रबंधन की कुंजी राजकोषीय-मौद्रिक समन्वय में ही निहित होगी। इन दोनों नीतियों के बीच प्रतिक्रिया को समायोजित करना काफी जटिल है, जो कुछ कारकों से प्रभावित होती है। पहला, क्या संकट अर्थव्यवस्था की मांग या आपूर्ति पक्ष को प्रभावित करता है? दूसरा, इससे होने वाली आर्थिक उथल-पुथल की सीमा क्या है? और तीसरा, इसके शुरू होने के समय की आर्थिक स्थितियां क्या हैं?

उदाहरण के लिए, 1973-74 के पहले तेल संकट के दौरान, जब तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गई थीं, अर्थव्यवस्था पहले से ही भारत-पाक युद्ध और 1972-73 के सूखे के कारण भारी घाटे से जूझ रही थी। मौद्रिक नीति ने क्रेडिट को सीमित करके और ब्याज दरों को नियंत्रित करके दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति को रोकने की कोशिश की, जबकि भुगतान संतुलन को नियंत्रित करने के लिए रुपये का अवमूल्यन किया गया। चूंकि, सरकार ने लगातार खाद्य सब्सिडी और अन्य विकासात्मक खर्चों वाली विस्तारवादी राजकोषीय नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, इसलिए इस वर्ष घाटा बढ़ता गया। इसी तरह, 1990 के दशक में खाड़ी युद्ध शुरू होने से पहले ही भुगतान संतुलन की स्थिति और सरकारी राजकोषीय संतुलन दबाव में थे। इस युद्ध ने भुगतान संतुलन की स्थिति को और भी ज्यादा नुकसान पहुंचाया, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने लगा और घाटा तेजी से बढ़ने लगा। बढ़ती हुई महंगाई को काबू में करने के लिए मौद्रिक नीति को सख्त किया गया, जबकि राजकोषीय नीति को घाटे को सीमित करने पर केंद्रित किया गया। संकट के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया ने देश में बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।

इसके बिल्कुल विपरीत, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान, सरकारी वित्त अपेक्षाकृत आरामदायक स्थिति में था। केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों का राजकोषीय घाटा जीडीपी के तीन प्रतिशत से कम था। राज्यों के पास राजस्व अधिशेष था, जबकि केंद्र सरकार का राजस्व घाटा जीडीपी का एक प्रतिशत था। संकट से पहले के पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था में लगातार वृद्धि देखी जा रही थी, जिसकी औसत दर 8.8 प्रतिशत थी। 2008-09 की दूसरी छमाही में विकास की गति धीमी पड़ गई, जब वित्तीय संकट का असर भारत तक पहुंचने लगा। ऐसे में, जब वैश्विक स्तर पर और भारत में मांग में कमी आई, तो राजकोषीय नीति को करों में कटौती और व्यय में वृद्धि, दोनों उपायों के माध्यम से पुनर्जीवित करने पर केंद्रित किया गया।

मौजूदा संकट में, मैक्रोइकनॉमिक स्थिति अलग है। जहां एक ओर अर्थव्यवस्था महामारी के असर से उबर चुकी थी, वहीं हाल के भू-राजनीतिक तनावों और आपसी टैरिफ ने ईरान युद्ध शुरू होने से पहले ही वैश्विक विकास के अनुमानों को धीमा कर दिया था। चूंकि, महंगाई रिजर्व बैंक की 2-6 प्रतिशत की तय सीमा के निचले स्तर पर है, इसलिए महंगाई को काबू में रखने के लिए मौद्रिक नीति पर तत्काल कोई दबाव नहीं है। केंद्रीय बैंक अभी रुपये में उतार-चढ़ाव को कम करने में लगा हुआ है और संभावना है कि वह तब तक ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा, जब तक कि तेल की बढ़ती कीमतों का महंगाई और असली विकास पर असर का साफ पता न चल जाए।

सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को सहारा देने से राजकोष पर गंभीर दबाव पड़ेगा, जिससे नियोजित राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पटरी से उतर सकता है। युद्ध शुरू होने से पहले भी, व्यापार शुल्कों में उतार-चढ़ाव और असमान वैश्विक विकास के कारण वैश्विक परिदृश्य निराशाजनक ही था। मौजूदा युद्ध के चलते अब, सरकारी वित्त पर काफी दबाव बढ़ जाने के कारण, 2026-27 के बजट के आंकड़ों पर टिके रहना मुश्किल ही लग रहा है और मौजूदा संकट का राजकोषीय संतुलन पर कितना बुरा असर पड़ेगा, यह तो बाद में ही पता चलेगा। वित्त वर्ष 2026-27 में उच्च महंगाई और विकास दर में सुस्ती के जोखिम को देखते हुए, मौद्रिक और राजकोषीय नीति से जुड़े मुश्किल फैसलों की लागत को कम से कम रखना ही आर्थिक प्रबंधन की कुंजी होगी।

ऐसी स्थिति में, मौद्रिक नीति को ब्याज दरें कुछ इस तरह बनाए रखनी होंगी, जो विकास को बढ़ावा दें, और महंगाई को भी काबू में रख सकें। खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बढ़ी हुई सब्सिडी के कारण अतिरिक्त खर्च को समायोजित करना होगा; मगर ऐसा करते हुए उसे राजकोषीय घाटे के उस रास्ते पर टिके रहना होगा, जो मध्यम-अवधि में ऋण को स्थिर करने के लक्ष्य को हासिल करने में सहायक हो। एक प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बीच तालमेल की आवश्यकता होगी।

-पिनाकी चक्रवर्ती नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक और रेशम नागपाल सहायक प्रोफेसर हैं।
      edit@amarujala.com
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