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लाल बहादुर शास्त्री: जिन्हें देख पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान को हो गई थी गलतफहमी
Sun, 04 Oct 2020 03:17 AM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा
Published by: रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 04 Oct 2020 03:17 AM IST
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लाल बहादुर शास्त्री
- फोटो : अमर उजाला
दो अक्तूबर को मोहनदास करमचंद गांधी की जयंती थी और महात्मा के एक जीवनीकार के रूप में मैं अक्सर उनके बारे में लिखता रहा हूं। लेकिन दो अक्तूबर, 2020 के लिए मैंने तय किया कि एक अन्य शानदार भारतीय के बारे में लिखूंगा, जिनका जन्म भी उसी दिन हुआ था। ये थे, लाल बहादुर शास्त्री। इस बदलाव की वजह : गांधी की विरासत समय से नहीं बंधी है और सार्वभौमिक है, जबकि शास्त्री की विरासत 2020 में भारत में विशेष रूप से प्रासंगिक है। हालांकि वह सिर्फ डेढ़ साल प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इस सीमित अवधि में उन्होंने अनेक उल्लेखनीय काम किए, जिनका अनुकरण भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री कर सकते हैं।
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दो अक्तूबर, 1902 को पैदा हुए लाल बहादुर शास्त्री ने युवा अवस्था में खुद को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया और उन्होंने कई वर्ष जेल में बिताए। शांत तथा साहसी होने के साथ ही उन्होंने नैतिक दृढ़ता का प्रदर्शन कर प्रतिष्ठा अर्जित की। उनका यह दूसरा वाला गुण मजबूती के साथ तब प्रकट हुआ था, जब एक रेल हादसे के बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, यह दुर्लभ किस्म की नैतिकता थी और आज तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बाद में उन्हें मंत्रिमंडल में फिर शामिल किया गया, और तेजी से नेहरू उन पर भरोसा करने लगे और अंततः शास्त्री को वह अपने उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे थे। जून, 1964 में प्रधानमंत्री के रूप में उनके शपथ लेने के कुछ देर बाद मैनचेस्टर गार्डियन के नई दिल्ली स्थित संवाददाता ने शास्त्री का साक्षात्कार लिया था।
उस पत्रकार ने उस बातचीत के आधार पर एक आलेख लिखा जिसका शीर्षक था, ए स्पैरोज स्ट्रेंथ (एक गौरैया की ताकत)। उन्होंने शास्त्री को 'खुद के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त', 'एक सचमुच मजबूत व्यक्ति पाया' जो संक्षिप्त तथा स्पष्ट वाक्यों में अपनी बात कहते हैं और 'एक भी शब्द जाया नहीं करते।' हालांकि कुछ दूसरे लोग उनसे कम प्रभावित हुए। अक्तूबर, 1964 में काहिरा में एक बैठक में शामिल होने के बाद लौटते हुए शास्त्री कुछ देर के लिए कराची में रुके थे। वहां उनकी मुलाकात पाकिस्तान के राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान से हुई। हट्टा-कट्टा तानाशाह छोटे कद के लोकतांत्रिक नेता और उसकी सादगी से कुछ खास प्रभावित नहीं हुआ। शास्त्री कुल मिलाकर अपने प्रसिद्ध और चमत्कारिक पूर्ववर्ती के कमतर उत्तराधिकारी लग रहे थे। हमारे प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद अयूब ने अपने एक सहयोगी से कहा, 'तो यह वह शख्स है, जिसने नेहरू की जगह ली है!'
नेहरू की जब मौत हुई, उस समय पाकिस्तान और भारत कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के कगार पर थे। शास्त्री को देखने और उनसे मिलने के बाद अयूब खान ने बातचीत और संवाद का रास्ता छोड़ दिया और ताकत के दम पर कश्मीर पर कब्जा करना चाहा।
अगस्त, 1965 में पाकिस्तान ने घाटी में घुसपैठिये भेजे। सितंबर की शुरुआत में पाकिस्तानी फौज ने चंबा सेक्टर में हमला शुरू कर दिया। लेकिन यह साबित हो गया कि फील्ड मार्शल ने एक छोटे कद के धोतीधारी गांधीवादी के संकल्प और लड़ने के हौसले को कम आंका था। इसके बाद शास्त्री ने तुरंत पंजाब में नया मोर्चा खोलने को मंजूरी दे दी। भारतीय बल सीमा पार कर पाकिस्तान के मुख्य शहर लाहौर की ओर बढ़ने लगे। तीन हफ्ते की भीषण लड़ाई के बाद संयुक्त राष्ट्र की पहल पर 22 सितंबर से संघर्ष विराम प्रभावी हो सका।
पाकिस्तानी पक्ष ने यह युद्ध गहरे धार्मिक मुहावरे के साथ लड़ा। उनके जवान मान रहे थे कि वे हिंदू काफिरों के खिलाफ पवित्र इस्लामी युद्ध लड़ रहे हैं। भारतीय पक्ष का मुहावरा एकदम अलग था। एक परमवीर चक्र विजेता उत्तर प्रदेश से था और उसका नाम था, अब्दुल हमीद। राजस्थान के एक सैनिक ने कम से कम दो पाकिस्तानी टैंकों को उड़ा दिया, यह विडंबना ही है कि उसका नाम था अयूब खान।
पाकिस्तान ने खुद को मुस्लिम के तौर पर परिभाषित किया, जबकि भारत ने खुद को हिंदू के रूप में परिभाषित नहीं किया था, यह ऐसा कुछ था, लाल बहादुर शास्त्री ने जिसे खुद समझा और इसकी पुष्टि की। संघर्ष विराम के प्रभावी होने के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में एक विशाल आम सभा को संबोधित किया। उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और कहा, 'मैं हिंदू हूं और इस सभा की अध्यक्षता कर रहे मीर मुश्ताक मुस्लिम हैं। आपको संबोधित कर चुके श्री फ्रैंक एंथनी ईसाई हैं। यहां सिख और पारसी भी हैं। हमारे देश की अनूठी बात यह है कि हमारे यहां हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी और अन्य सभी धर्मों के लोग रहते हैं। हमारे यहां मंदिर और मस्जिद हैं, गुरुद्वारे और चर्च हैं। लेकिन हम इन सबको राजनीति में नहीं लाते... यही भारत और पाकिस्तान का फर्क है। पाकिस्तान जहां खुद को एक इस्लामी राज्य बताता है और धर्म को एक राजनीतिक कारक के तौर पर इस्तेमाल करता है, हम भारतीयों के पास स्वतंत्रता है कि हम जो भी धर्म चुनें और किसी भी तरह से पूजा करें। जहां तक राजनीति की बात है, तो हममें से प्रत्येक उतना ही भारतीय है, जितना कोई और।'
यह देखना असंभव नहीं, तो मुश्किल जरूर है कि नरेंद्र मोदी शांति या युद्ध के दौरान ऐसा भाषण दें, जो दूर से भी इससे मिलता-जुलता हो। विशेष रूप से प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी ने अपनी नीतियों और राजनीति को बहुसंख्यकवाद में ढाला है। लाल बहादुर शास्त्री एक और अर्थ में नरेंद्र मोदी से अलग थे और वह थी कैबिनेट मंत्रियों को सशक्त बनाने की उनकी क्षमता और इच्छा। शास्त्री का नारा, 'जय जवान, जय किसान', जाना-पहचाना है; जो चीज भुला दी गई, वह यह कि उन्होंने इन दोनों महत्वपूर्ण क्षेत्रों रक्षा तथा कृषि का जिम्मा अपने दो सबसे काबिल मंत्रियों को सौंपा था। इसी वजह से शास्त्री के अधीन रक्षा मंत्री के रूप में काम करते हुए वाई बी चव्हाण हमारे सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण को आगे बढ़ा सके। वहीं शास्त्री के अधीन कृषि मंत्री के रूप में काम करते हुए सी सुब्रमण्यम ने हरित क्रांति की बुनियाद रखी थी। ये दोनों अपवाद नहीं थे। शास्त्री मंत्रिमंडल में एम सी छागला (शिक्षा), एस के डे (सामुदायिक विकास) और सुशीला नायर (स्वास्थ्य) जैसे शानदार मंत्री थे, जिन्हें वैसी ही स्वायत्तता और स्वतंत्रता थी, मोदी मंत्रिमडल में जिसकी कल्पना नहीं जा सकती।
लाल बहादुर शास्त्री को जो तीसरी चीज नरेंद्र मोदी से अलग करती है, वह है अपनी गलतियां पहचानना और उन्हें ठीक करना। 26 जनवरी, 1965 को दक्षिण भारत के अग्रणी कांग्रेसजनों की चेतावनी के बावजूद शास्त्री ने अंग्रेजी को सरकारी उपयोग की भाषा के रूप में हटा दिया और हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा रहने दिया। तमिलनाडु में हुए भारी विरोध के बाद प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि हिंदी थोपना चूक थी। उन्होंने यह बात 11 फरवरी, 1965 को ऑल इंडिया रेडियो पर कही। उल्लेखनीय है कि यह बात उन्होंने अंग्रेजी में कही। प्रधानमंत्री ने कहा, त्रासद घटनाओं से गहरी हताशा हुई है और धक्का लगा है। गलतफहमी और विरोध को दूर करने के लिए, उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह जवाहरलाल नेहरू के आश्वासन का पूरा सम्मान करेंगे कि दक्षिण भारत के लोग जब तक चाहेंगे, अंग्रेजी का उपयोग जारी रहेगा। इसके बाद उन्होंने चार आश्वासन भी दिए : पहला, प्रत्येक राज्य को अपनी पसंद की क्षेत्रीय भाषा या अंग्रेजी में कामकाज की छूट होगी। दूसरा, एक राज्य से दूसरे राज्य में होने वाला संवाद या तो अंग्रेजी में होगा या फिर प्रामाणिक अंग्रेजी अनुवाद में। तीसरा, गैर हिंदीभाषी राज्य केंद्र सरकार के साथ अंग्रेजी में संवाद कर सकेंगे और गैर हिंदी राज्यों की सहमति के बिना यह व्यवस्था नहीं बदलेगी। चौथा, केंद्रीय स्तर पर कामकाज में अंग्रेजी जारी रहेगी।
नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी और बिना सोचे-विचारे लॉकडाउन लागू कर दो बड़ी गलतियां की हैं। इन गलतियों की वजह से हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे सामाजिक ढांचे को हुए भारी नुकसान के बावजूद उन्होंने पछतावा या अफसोस नहीं किया है। हमारे प्रधानमंत्री के पास साढ़े तीन साल का कार्यकाल और है। उनके पास अब भी समय है कि वह अपने महान पूर्ववर्ती लाल बहादुर शास्त्री से सबक लें।