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विकसित देशों से सीखिए

Mon, 25 Nov 2013 07:46 PM IST
सुभाषिणी अली
सुभाषिणी अली Updated Mon, 25 Nov 2013 07:46 PM IST
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Learn from foreign country

वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव की गहमा-गहमी के बीच तमाम मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। ये मुद्दे किसी छोटे से समुदाय या समूह के हितों और स्वार्थों से संबंधित नहीं, जनता के बड़े और सबसे ज्यादा परेशान हिस्सों के मुद्दे हैं। बल्कि समाज के बहुत ही छोटे हिस्से के स्वार्थ और हितों से संबंधित विषय ही चुनाव के दंगल में आमने-सामने खड़े पहलवानों के बीच हो रहे शब्दों के युद्ध में सुनाई दे रहे हैं। ऐसा होना उस प्रजातंत्र के लिए बहुत घातक है, जिसमें समाज के बहुसंख्यक हिस्से की आवाज सुनी जानी चाहिए। चुनाव के दंगल में कुछ बातें बिना बहस के ही पेश की जा रही हैं। उनमें से सर्वोपरि यह है कि गरीबों के लिए कुछ भी करना बेकार और आर्थिक विकास के लिए नुकसानदेह है। जबकि धनाढ्यों के हित में काम करना, उन्हें और अधिक धनाढ्य बनाना, पूरे समाज की समृद्धि का राज है।

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इस सोच को हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने बहुत जल्दी अपनाया। केवल इसलिए नहीं कि खुद उन पर उन धनाढ्यों की श्रेणी में खड़े होने का स्वप्न तारी था, जिन्हें सरकार की उदारवादी नीतियां दिन दूनी और रात चौगुनी अमीर बना रही हैं, बल्कि इसलिए भी कि इस सोच के प्रसार में पश्चिम के विकसित देश और उनके द्वारा संचालित विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाएं जुटी हुई हैं। अजीब बात तो यह है कि हमारे बुद्धिजीवी उन विकसित देशों की आज की वस्तुस्थिति की तरफ देखने को तैयार नहीं हैं।
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दो दशकों से चल रही नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के जो नतीजे आज विकसित देशों में देखे जा रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। यूरोप और अमेरिका कभी अपनी जनवादी नीतियों और सामाजिक समानता पर गर्व करते थे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद उन्होंने अपने नागरिकों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया था। महिलाओं को समान नागरिक बनाने की ओर भी उन्होंने कई कदम उठाए थे। शिक्षा और रोजगार के साथ-साथ उन्हें प्रसव के समय लंबी छुट्टी उपलब्ध कराई गई। हर बच्चे के पालन-पोषण के लिए भत्ता दिया गया, उनके लिए क्रेच सुविधा मुहैया करवाई और बीमार व विकलांग लोगों की देखभाल का इंतजाम भी किया गया।
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1980 के दशक में इन नीतियों का विरोध अमेरिका और फिर यूरोप में दिखाई देने लगा। सोवियत रूस के बिखराव तक तो इन्हें त्यागने की प्रक्रिया तेज हो गई। ऐसा लगता था कि समाजवादी व्यवस्था से पूंजीवादी व्यवस्था के बेहतर होने का प्रमाण देने की आवश्यकता के समाप्त होते ही जनता के लिए चलाई जा रही तमाम कल्याणकारी नीतियों को ही त्याग देने का फैसला कर लिया गया। यह ऐसे दौर में हुआ, जब विकसित पूंजीवादी देशों के आर्थिक विकास और दुनिया के तमाम संसाधनों और बाजारों पर कब्जा बिना किसी रोक-टोक के मजबूत हो रहा था। उनके वर्चस्व को चुनौती देने वाली कोई ताकत उनका रास्ता रोकने के लिए थी ही नहीं। इस बात का प्रचार तेजी से होने लगा कि अब तो दुनिया में मौजूद तमाम दीवारें और सीमाएं समाप्त हो जाएंगी और वैश्वीकरण का ऐसा युग शुरू हो जाएगा, जिसके चलते तमाम असमानताएं दूर हो जाएंगी। इस प्रक्रिया की सफलता की एक ही शर्त थी कि धनाढ्य लोगों की मुनाफाखोरी पर लगे हर तरह के नियंत्रण का खात्मा। बैंकों और वित्तीय संस्थाओं पर नियंत्रण, आयात-निर्यात पर नियंत्रण, दामों पर नियंत्रण, पूंजी-निवेश पर नियंत्रण और रईसों की कमाई पर नियंत्रण को खत्म करने के बाद ही समाज और दुनिया की आर्थिक समृद्धि संभव होगी।

दो दशक पहले की गई वह भविष्यवाणी उतनी ही गलत साबित हुई है, जितनी यह कि सोवियत रूस के बिखराव के बाद कोई युद्ध नहीं होगा। यूरोप और अमेरिका, दोनों आज जबर्दस्त बेरोजगारी के शिकार हैं। इस बेरोजगारी की मार समाज के कमजोर हिस्सों और औरतों पर ज्यादा पड़ रही है। आज पूरे यूरोप में औसतन 12 फीसदी लोग बेरोजगार हैं और महिलाओं की बेरोजगारी ज्यादा है। यूनान और स्पेन में काम करने लायक औरतों का 25 फीसदी हिस्सा बेरोजगार है। इटली में जिन महिलाओं के बच्चे हैं, वे पुरुषों से नौ गुना अधिक बेरोजगार हैं। पूरे यूरोप में शिक्षा के क्षेत्र में 20,000 नौकरियां समाप्त कर दी गई हैं और इस साल के अंत तक 87,000 नौकरियां और कम करने का फैसला हो चुका है। इंग्लैंड में 2017 तक 7,10,000 सरकारी नौकरियां समाप्त करने की योजना है, जिनमें तीन चौथाई नौकरियां महिलाओं की होंगी। उदारवादी नीतियों के चलते यूरोप में औसतन 17 फीसदी महिलाएं गरीबी रेखा के नीचे हैं। पुर्तगाल में अब नर्सों को ठेके पर काम करना पड़ता है। कई देशों में शिक्षकों का वेतन 2008 के वेतन से 30 फीसदी कम है। पूरे यूरोप में प्रसव से संबंधित सुविधाओं में भारी कटौती की जा रही है। बूढ़ों, बीमार बच्चों और विकलांगों को भी सरकार अपने हाल पर छोड़ रही है।


विगत मई में अमेरिकी जनगणना विभाग ने स्वीकारा कि वहां 18 फीसदी लोग बहुत गरीब हैं, जबकि 50 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। वहां इतनी असमानता कभी नहीं थी। वामपंथी अर्थशास्त्री ही नहीं, बल्कि विश्व बैंक के प्रमुख रह चुके जोसेफ स्टिगलिट्ज और नोबल से सम्मानित पॉल क्रूगमैन का भी कहना है कि जब-जब समाज के बहुसंख्यक हिस्सों से सरकारें अपनी नजरें फेर लेंगी, तब-तब यही नतीजे सामने आएंगे। महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला लेने से पहले क्या हम जानने की कोशिश करेंगे कि संवेदनहीन और अमीरपरस्त नीतियों ने हमारे समाज में किस तरह की विकृतियां पैदा की हैं?

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