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झुकी पीठ को मजबूत सहारे की तलाश
सुनील शाह
Updated Tue, 30 Sep 2014 07:52 PM IST
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टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित होने वाले अधिकांश धारावाहिकों में हालांकि अब भी सास तेज-तर्रार दिखाई देती है, पर हेल्प एज इंडिया की ताजा रिपोर्ट में कहानी इसके विपरीत है। रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में बुजुर्गों से दुर्व्यवहार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। पिछले वर्ष की रिपोर्ट में जहां वरिष्ठ नागरिकों से दुर्व्यवहार का प्रतिशत 23 था, वह इस वर्ष बढ़कर 50 हो गया है। इसमें भी महिलाएं घर में ज्यादा दुर्व्यवहार का शिकार होती हैं।
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सबसे दुखद पहलू यह है कि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले ज्यादातर परिजन ही होते हैं। इसमें बहू (61 प्रतिशत) तो आगे है ही, बेटा (59 प्रतिशत) भी पीछे नहीं है। और तो और, बेटियां भी दुर्व्यवहार करती हैं, हालांकि इनका प्रतिशत कम (तीन) है।
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हेल्प एज इंडिया ने अपने शोध के लिए आठ राज्यों के 12 शहरों को चुना। मेट्रो शहरों में दिल्ली में वृद्धों से दुर्व्यवहार के 22 फीसदी मामले सामने आए, जबकि बंगलूरू में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत रहा। गैर मेट्रो शहरों में कानपुर में 13 प्रतिशत, तो नागपुर में बुजुर्गों के दुर्व्यवहार का आंकड़ा 85 फीसदी पाया गया।
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वृद्धों से जुबानी बदतमीजी ही नहीं होती, उन्हें बेइज्जत भी किया जाता है। उनकी उपेक्षा करना तो आम बात है। यही नहीं, उन पर हाथ उठाने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। जगहंसाई के डर और परिवार की इज्जत की खातिर 41 फीसदी वृद्ध अपना दुख किसी से साझा नहीं करते। सर्वे के अनुसार, चुपचाप प्रताड़ना स्वीकार करने वालों की संख्या इस साल पिछले साल के मुकाबले करीब दोगुनी (28 से बढ़कर 46 फीसदी) हो गई है। जाहिर है, 2007 में वरिष्ठों के लिए बने कानून से वृद्धों की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है। सर्वे में पाया गया कि सिर्फ 14 प्रतिशत वृद्धों को ही इस कानून की जानकारी है।
रोजगार, आर्थिक दबाव आदि के कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, जिसका बुजुर्गों पर दुष्प्रभाव इस रिपोर्ट से परिलक्षित होता है। अनियंत्रित धन की दुनिया में रिश्ते भी स्वार्थ से तय होते हैं। समाज में मनुष्य की स्थिति उपयोगिता से तय होने लगी है। यही कारण है कि बुजुर्गों की दुर्दशा हो रही है। विकसित देशों में वृद्धों की जिम्मेदारी सरकार उठाती है। नार्डिक देश तो गर्भवती महिलाओं, बच्चे और बुजुर्गों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनका मानना है कि गर्भवती महिला देश को भविष्य देती है, बच्चे भविष्य बनाते हैं और वृद्ध देश को सब कुछ समर्पित कर चुके होते हैं।
हमारे देश में खुली बाजार व्यवस्था में पश्चिमी देशों की तरह नियंत्रण और नियमों पर किसी का ध्यान नहीं है। जाहिर है, ऐसे में कमजोर तबके की सर्वाधिक उपेक्षा होती है। बुजुर्ग उन्हीं में से एक हैं। आयु सीमा बढ़ने से उनकी आबादी भी बढ़ रही है। हेल्प एज के सीईओ मैथ्यू चेरियन का कहना है कि हमारे समाज में मानव मूल्यों के घोर पतन ने इस समस्या को बढ़ा दिया है। बच्चों तक का वृद्धों से पारंपरिक स्नेहिल संबंध खत्म हो रहा है और वे बुजुर्गों का अपमान करते हैं। हमें अपने बच्चों को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा। उन्हें शिष्टाचार सिखाना होगा। हेल्प एज ने हग (हेल्प यूनाईट जनरेशन) अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य सभी पीढ़ियों में समान अधिकार, सम्मान और आदर के साथ एक परिवार में रहने की भावना विकसित करना है।