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देर से उठाया गया कदम
नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Sun, 06 May 2018 06:55 PM IST
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हमारे दैनंदिन जीवन में ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव को हाल ही में आए एक विज्ञापन से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इसमें दिखाया गया कि कैसे जब एक बुजुर्ग व्यक्ति रोजाना की खरीदारी के लिए घर से बाहर निकलने की तैयारी कर रहा होता है, तभी उससे कहा जाता है कि उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अब वह सामान और सेवाओं की ऑनलाइन खरीदारी कर सकते हैं। बेबसी के साथ वह खड़ा होता है और घर से बाहर जाने लगता है, तब उसकी पत्नी पूछती है कि कहां जा रहे हो, तो उसका जवाब होता है, हेयरकट के लिए क्योंकि इसे ऑनलाइन नहीं किया जा सकता। वाकई डिजिटल वर्ल्ड ने हमारी रोजाना की जिंदगी में काफी कुछ बदल दिया है।
ई-कॉमर्स के उभार के बाद, जो लोग कारोबार में हैं उनमें से अनेक लोग खुद को ऐसी स्थिति में पा रहे हैं, जिसकी प्रासंगिकता बहुत नहीं रह जाएगी या फिर कई मामलों में तो उनका कारोबार ही खत्म हो गया। मसलन, किताब की दुकानों को ही लीजिए, उनके शटर तेजी से नीचे गिर रहे हैं, वह भी तब, जब किताबों की बिक्री बढ़ रही है। यह वैसा ही है, जैसे रेल या हवाई जहाज का टिकट बुक करने के लिए अब अड़ोस-पड़ोस के एजेंट की बहुत जरूरत नहीं रह गई है। यह सूची लंबी होती जा रही है, बस आप जरा ऐसे उत्पादों और सेवाओं की गिनती तो कीजिए, जो तेजी से डिजिटल कंपनियों की ओर खिसक रही हैं। जो लोग इस प्रक्रिया में पिछड़ रहे हैं, उनकी शिकायत है कि ई-कॉमर्स नीति के नहीं होने से वह ठीक से कारोबार नहीं कर सक रहे हैं।
सरकार ने ई-कॉमर्स नीति के लिए रूपरेखा तैयार करने की घोषणा की है। इसकी जिम्मेदारी वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु की अगुआई में एक थिंक टैंक को सौंपी गई है, जिसे छह महीने में अपनी रिपोर्ट देनी है। यह कमेटी प्रतिस्पर्धा, नियंत्रण, डाटा की गोपनीयता, कर व्यवस्था और तकनीकी पहलुओं को देखेगी। जो लोग इस कारोबार में पहले से हैं उन्होंने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन इसके साथ ही परेशान होने के कुछ उनके अपने कारण भी हैं। अब तक वे बिना किसी नियंत्रण के कारोबार करते आए हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि नियंत्रण होने से उनका कारोबार प्रभावित हो सकता है।
ई-कॉमर्स पर राष्ट्रीय नीति के ढांचे को कुछ इस तरह होना चाहिए, ताकि वह कानूनी मुद्दों, फंडिंग और कारोबार के संचालन से संबंधित मुद्दों को नियंत्रित कर सके। मसलन छोटे कारोबारियों ने बड़े कारोबारियों पर बड़े पैमाने पर दी जाने वाली छूट और एफडीआई के कायदों के उल्लंघन की शिकायत की हैं। तकरीबन एक दशक से यह देखा जा रहा है कि उपभोक्ता सामान के उत्पादक ऑनलाइन खरीद पर व्यापारिक छूट मुहैया कराते हैं, मगर वही उत्पाद शो रूम में महंगा मिलता है। मसलन, यह हो सकता है कि ऑनलाइन खरीदे गए रेफ्रिरजरेटर की कीमत पड़ोस में स्थित वितरक के दाम से कम हो।
वास्तव में जो लोग मुक्त बाजार से लाभ हासिल करना चाहते हैं, उन्होंने सेवाओं और खरीद के लिए ऑनलाइन लेन-देन का स्वागत किया है। उपभोक्ताओं के लिहाज से तो यह अच्छा है, लेकिन पुराने तरह के कारोबारी मॉडल पर चलने वाले कारोबार और दलालों के लिए यह ठीक नहीं है। यदि थिंक टैंक सिर्फ ऑपरेटरों और कंपनियों के हितों के संरक्षण को तवज्जो देता है, तो यह उपभोक्ताओं के लिए चिंता का कारण हो सकता है, क्योंकि उपभोक्ता कई उत्पादों और सेवाओं के ऑनलाइन सौदे में दाम में विविधता के कारण उलझ सकता है। इसके बावजूद डिजिटल भुगतान, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध उत्पादों के हब और बेहतर सेवाओं के कारण भारत में ई-कॉमर्स का कारोबार तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ई-कॉमर्स ने बडे़ पैमाने पर रोजगार भी पैदा किए हैं, जिसमें उत्पादों की डिलिवरी को ही देखें तो इस काम में पूरे देश भर में दस लाख लोग आज ऑनलाइन होने वाले सौदों के आधार पर खाद्य सामग्री से लेकर किताबें और घरेलू सामान घर-घर तक पहुंचा रहे हैं। वैसे कार्यबल के गठन के समय पर भी गौर किया जाना चाहिए। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अगले आम चुनाव को एक वर्ष रह गए हैं। ठीक इसी समय अमेजन जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनी के अधीन रहकर अनेक भारतीय ऑपरेटर अपने उत्पादों को वैश्विक ऑनलाइन चेन की बिक्री सूची में जोड़कर और बड़ा फलक हासिल कर सकते हैं।
वास्तव में भारतीय हस्तशिल्प और दस्तकारी के लिए भी यह बड़ा अवसर है, जिन्हें भारत की सरहद के पार भी ऑनलाइन ग्राहक मिल रहे हैं। अमेजन एक्सपोर्ट्स डाइजेस्ट, 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेजन इंटरनेशनल के बाजार ने वैश्विक रूप से भारतीय उत्पादों में 5,000 फीसदी की और अमेजन ग्लोबल फुलफिलमेंट चैनल के जरिये भारतीय निर्यात ने 310 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। यह इस बात का साफ संकेत है कि जो लोग अपने कारोबार को लेकर गंभीर हैं, उनके लिए नया बाजार उपलब्ध हो रहा है। आज ई-कॉमर्स का मतलब सिर्फ उत्पादों और सेवाओं की ऑनलाइन खरीद-फरोख्त भर नहीं है। यह विभिन्न तरह के कारोबार से जुड़ी कंपनियों के आपसी तालमेल और एकीकरण से भी संबंधित है। इसे दूरसंचार से लेकर, हवाई और रेल टिकटों की बुकिंग तथा उपभोक्ता सामान की खरीद में देखा जा सकता है।
जाहिर है, भारतीय कारोबारी परिदृश्य बदल रहा है। ऐसे में प्रभु की अगुआई वाले थिंक टैंक का काम आसान नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी कमेटी उपभोक्ता फोरम के संबंध में भी कोई सिफारिश करती है, ताकि उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित रखा जा सके।
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ई-कॉमर्स के उभार के बाद, जो लोग कारोबार में हैं उनमें से अनेक लोग खुद को ऐसी स्थिति में पा रहे हैं, जिसकी प्रासंगिकता बहुत नहीं रह जाएगी या फिर कई मामलों में तो उनका कारोबार ही खत्म हो गया। मसलन, किताब की दुकानों को ही लीजिए, उनके शटर तेजी से नीचे गिर रहे हैं, वह भी तब, जब किताबों की बिक्री बढ़ रही है। यह वैसा ही है, जैसे रेल या हवाई जहाज का टिकट बुक करने के लिए अब अड़ोस-पड़ोस के एजेंट की बहुत जरूरत नहीं रह गई है। यह सूची लंबी होती जा रही है, बस आप जरा ऐसे उत्पादों और सेवाओं की गिनती तो कीजिए, जो तेजी से डिजिटल कंपनियों की ओर खिसक रही हैं। जो लोग इस प्रक्रिया में पिछड़ रहे हैं, उनकी शिकायत है कि ई-कॉमर्स नीति के नहीं होने से वह ठीक से कारोबार नहीं कर सक रहे हैं।
सरकार ने ई-कॉमर्स नीति के लिए रूपरेखा तैयार करने की घोषणा की है। इसकी जिम्मेदारी वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु की अगुआई में एक थिंक टैंक को सौंपी गई है, जिसे छह महीने में अपनी रिपोर्ट देनी है। यह कमेटी प्रतिस्पर्धा, नियंत्रण, डाटा की गोपनीयता, कर व्यवस्था और तकनीकी पहलुओं को देखेगी। जो लोग इस कारोबार में पहले से हैं उन्होंने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन इसके साथ ही परेशान होने के कुछ उनके अपने कारण भी हैं। अब तक वे बिना किसी नियंत्रण के कारोबार करते आए हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि नियंत्रण होने से उनका कारोबार प्रभावित हो सकता है।
ई-कॉमर्स पर राष्ट्रीय नीति के ढांचे को कुछ इस तरह होना चाहिए, ताकि वह कानूनी मुद्दों, फंडिंग और कारोबार के संचालन से संबंधित मुद्दों को नियंत्रित कर सके। मसलन छोटे कारोबारियों ने बड़े कारोबारियों पर बड़े पैमाने पर दी जाने वाली छूट और एफडीआई के कायदों के उल्लंघन की शिकायत की हैं। तकरीबन एक दशक से यह देखा जा रहा है कि उपभोक्ता सामान के उत्पादक ऑनलाइन खरीद पर व्यापारिक छूट मुहैया कराते हैं, मगर वही उत्पाद शो रूम में महंगा मिलता है। मसलन, यह हो सकता है कि ऑनलाइन खरीदे गए रेफ्रिरजरेटर की कीमत पड़ोस में स्थित वितरक के दाम से कम हो।
वास्तव में जो लोग मुक्त बाजार से लाभ हासिल करना चाहते हैं, उन्होंने सेवाओं और खरीद के लिए ऑनलाइन लेन-देन का स्वागत किया है। उपभोक्ताओं के लिहाज से तो यह अच्छा है, लेकिन पुराने तरह के कारोबारी मॉडल पर चलने वाले कारोबार और दलालों के लिए यह ठीक नहीं है। यदि थिंक टैंक सिर्फ ऑपरेटरों और कंपनियों के हितों के संरक्षण को तवज्जो देता है, तो यह उपभोक्ताओं के लिए चिंता का कारण हो सकता है, क्योंकि उपभोक्ता कई उत्पादों और सेवाओं के ऑनलाइन सौदे में दाम में विविधता के कारण उलझ सकता है। इसके बावजूद डिजिटल भुगतान, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध उत्पादों के हब और बेहतर सेवाओं के कारण भारत में ई-कॉमर्स का कारोबार तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ई-कॉमर्स ने बडे़ पैमाने पर रोजगार भी पैदा किए हैं, जिसमें उत्पादों की डिलिवरी को ही देखें तो इस काम में पूरे देश भर में दस लाख लोग आज ऑनलाइन होने वाले सौदों के आधार पर खाद्य सामग्री से लेकर किताबें और घरेलू सामान घर-घर तक पहुंचा रहे हैं। वैसे कार्यबल के गठन के समय पर भी गौर किया जाना चाहिए। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अगले आम चुनाव को एक वर्ष रह गए हैं। ठीक इसी समय अमेजन जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनी के अधीन रहकर अनेक भारतीय ऑपरेटर अपने उत्पादों को वैश्विक ऑनलाइन चेन की बिक्री सूची में जोड़कर और बड़ा फलक हासिल कर सकते हैं।
वास्तव में भारतीय हस्तशिल्प और दस्तकारी के लिए भी यह बड़ा अवसर है, जिन्हें भारत की सरहद के पार भी ऑनलाइन ग्राहक मिल रहे हैं। अमेजन एक्सपोर्ट्स डाइजेस्ट, 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेजन इंटरनेशनल के बाजार ने वैश्विक रूप से भारतीय उत्पादों में 5,000 फीसदी की और अमेजन ग्लोबल फुलफिलमेंट चैनल के जरिये भारतीय निर्यात ने 310 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। यह इस बात का साफ संकेत है कि जो लोग अपने कारोबार को लेकर गंभीर हैं, उनके लिए नया बाजार उपलब्ध हो रहा है। आज ई-कॉमर्स का मतलब सिर्फ उत्पादों और सेवाओं की ऑनलाइन खरीद-फरोख्त भर नहीं है। यह विभिन्न तरह के कारोबार से जुड़ी कंपनियों के आपसी तालमेल और एकीकरण से भी संबंधित है। इसे दूरसंचार से लेकर, हवाई और रेल टिकटों की बुकिंग तथा उपभोक्ता सामान की खरीद में देखा जा सकता है।
जाहिर है, भारतीय कारोबारी परिदृश्य बदल रहा है। ऐसे में प्रभु की अगुआई वाले थिंक टैंक का काम आसान नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी कमेटी उपभोक्ता फोरम के संबंध में भी कोई सिफारिश करती है, ताकि उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित रखा जा सके।