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दो दिन से नए साल के उत्सव की चिंता में परेशान

पूरन सरमा Updated Thu, 01 Jan 2015 03:17 PM IST
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Last two days in tension for new year
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दिवाली के अवसर पर लिया गया मोटा कर्ज चुका भी न पाया था कि पिछले दो दिन से नए साल के उत्सव की चिंता में परेशान था। नए साल की चिंता दिसंबर के प्रारंभ से ही शुरू हो जाती है। जबकि परिवार वाले कहते हैं कि चिंता छोड़ नया साल उल्लास से मनाओ। ये दोनों भाव मैं कहां से लाऊं?
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बाजार भाव इतने जानलेवा हैं कि मन के भीतर के सब भाव सूख गए हैं। सूखी जमीन पर उल्लास और उमंग की खेती मेरे बस की बात नहीं है। समझ में ही नहीं आ रहा कि इस नए साल का मैं क्या करूं। लेकिन औपचारिकताएं हमारे यहां गजब की हैं। पर्व, तीज, त्योहार के प्रति एक सनातन भाव हम लोग लेकर चल रहे हैं, इसलिए बतौर औपचारिकता कुछ करना पड़ेगा ही, वरना दुनिया क्या कहेगी?


गणपति जी मेरे भले पड़ोसी हैं। जब भी विपदा के बादल मंडराते हैं, मैं हल वहीं तलाशता हूं। समस्या लेकर मैं जब पहुंचा, तो वह भी समस्याओं में लिपटे पड़े थे। मैंने कहा, गणपति जी, नए साल का क्या करूं?

चेहरे पर गंभीरता को और सघन करके गणपति जी ने मुझे घूरा और कहा, शर्मा, तुम ठहरे पूरे अंधविश्वासी। अपने आपको उठाओ मेरे भाई। नए साल के चक्कर में मत पड़ो। क्या आज बाजार में महंगाई नहीं दिखी? क्या दुखी लोग आज हंसते दिख रहे हैं? क्या तुम परिवार और दफ्तर की चिंता से मुक्त हो चुके हो?

रुआंसा होकर मैं बोला, पर करूं क्या? पत्नी-बच्चों का इरादा नया साल पूरे उत्साह से मनाने का है। गणपति जी बोले, यदि उत्साह बचा हो, तो अवश्य मनाओ। मगर तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि नया साल एक फरेब है।

मैं बोला, कमाल करते हैं आप। बारह महीने का पर्व है। आज इसे नहीं मनाया, तो पूरे साल दरिद्रता पीछा नहीं छोड़ेगी। कहते हैं, नए साल के दिन जो करोगे, वह पूरे वर्ष होता रहेगा।

मेरे तर्कों का गणपति जी के पास कोई जवाब नहीं था। अब मैं भी मिठाई के पैकेट और न्यू ईयर केक लिए उत्साह के साथ घर जा रहा था।
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