फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Last chance for Rahul

राहुल के पास आखिरी मौका

Thu, 30 Nov 2017 10:05 AM IST
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत Updated Thu, 30 Nov 2017 10:05 AM IST
विज्ञापन
Last chance for Rahul
सुरेंद्र कुमार
ग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, जिनका मीडिया अक्सर 'पार्टी अध्यक्ष इन वेटिंग' कहकर मजाक उड़ाता है, के कंधों पर तमाम भारतीय राजनेताओं से ज्यादा बोझ है। उनके ऊपर 132 वर्ष पुरानी पार्टी को बचाने का बोझ है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने और देश को छह प्रधानमंत्री देने के बावजूद विस्मृति के कगार पर है।

loader

जबसे नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं, कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी राजनीतिक वर्चस्व घटता जा रहा है। राहुल के ऊपर अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने का बोझ है, जिसके सदस्यों ने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी और उनमें से तीन सदस्य 35 वर्षों से ज्यादा समय तक देश के प्रधानमंत्री रहे और जिन्होंने ब्रिटिश राज के 'अंधेरे युग' के बाद भारत के विकास में योगदान दिया, लेकिन उनकी आज उन आर्थिक नीतियों के लिए आलोचना हो रही है, जिसके चलते देश में लाइसेंस और परमिट राज कायम हो गया तथा 'हिंदू विकास दर' के कारण देश की प्रगति घट गई। राहुल के कंधों पर अपनी पार्टी को पुनःस्थापित करने और फिर से ब्रांडिंग करने का भी बोझ है, जो अभी अस्तित्व के संकट से गुजर रही है, लेकिन अब भी 'वंशवाद' से चिपकी हुई है। उनके ऊपर पार्टी कार्यकर्ताओं को फिर से ऊर्जस्वित करने का भी दायित्व है, जो एक के बाद एक चुनावी हार देखकर लज्जित, पराजित और लोगों के साथ जुड़ने और उनका विश्वास हासिल करने में असहाय दिखते हैं। राहुल को यह भी साबित करना है कि वह अनिच्छुक राजनेता नहीं हैं और न ही 'पप्पू' या 'शहजादा' हैं! बल्कि तीन प्रधानमंत्रियों के राजनीतिक जीन उन्हें विरासत में मिले हैं, उनके पास ऐसा डीएनए है, जो न केवल कांग्रेस का नेतृत्व कर सकता है, बल्कि ईश्वर ने चाहा, तो पूरे देश का नेतृत्व कर सकता है। 

लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती है कि एक चतुर प्रधानमंत्री का मुकाबला कैसे करें, जो जनता के बीच भारी लोकप्रिय हैं। असाधारण वक्तृत्व कौशल और लोगों से जुड़ने की क्षमता के साथ वह अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को अपनी कल्पनाशील दृष्टि, उच्च आत्मविश्वास, अतुल्य ऊर्जा, स्वच्छ छवि और सिद्ध नेतृत्व के गुणों से प्रेरित करते हैं। उन्होंने सैकड़ों योजनाओं की घोषणा की है, जिसने मतदाताओं को उनकी पार्टी की तरफ आकर्षित किया, भले ही उनकी कई योजनाएं वांछित परिणाम न दे पाई हों। उनमें लोगों को समझाने की शानदार प्रतिभा है कि उनके फैसले लोगों की बेहतरी के लिए हैं, भले ही उनके क्रियान्वयन से उन्हें थोड़ी मुश्किल और असुविधा हो, जैसा कि नोटबंदी और जीएसटी के मामले में हुआ। जब प्रारंभिक उत्साह और चर्चा थम जाएगी तथा भ्रम की स्थिति थोड़ी खत्म हो जाएगी, तो उनकी पहल और उनके अच्छे इरादों के बारे में कुछ प्रश्न पूछे जा सकते हैं। 

मीडिया और लाखों लोगों के मन में राहुल गांधी को लेकर जो नकारात्मकता है, उनमें से अधिकांश की रचना उन्होंने स्वयं की है। एक दशक से ज्यादा समय से वह सक्रिय राजनीति में हैं। जब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके राज्याभिषेक की कई घोषणाएं पूरी नहीं हुई, जो एक धारणा पैदा हुई कि वह वास्तव में भारतीय राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखते। जब उन्होंने मनमोहन सिंह द्वारा संसद में पेश किए गए अध्यादेश को उनके विदेश दौरे के दौरान फाड़ डाला, लोगों को उनके स्वभाव और प्रधानमंत्री की संस्था के प्रति सम्मान को लेकर संदेह पैदा हुआ। जब उनकी पार्टी देश में मुश्किलों से जूझ रही थी, तो वह लंबी अवधि के लिए अघोषित छुट्टी पर विदेश चले गए, इससे लगा कि वह पार्टी के भविष्य के प्रति उदासीन हैं। संसद में भी उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। वह कांग्रेस के प्रमुख प्रचारक हैं, लेकिन बिहार और पंजाब को छोड़कर उनके प्रयास उन्हें चुनावी जीत नहीं दिला पाए। बिहार में कांग्रेस वैसे भी छोटी खिलाड़ी थी, वह मुख्यतः लालू और नीतीश का शो था और पंजाब में जीत का श्रेय कैप्टन अमरिंदर सिंह को जाता है।  
  
इसलिए राहुल को सबसे पहले इस नकारात्मकता को दूर करना चाहिए। क्या वह कर सकते हैं? येल, एमआईटी, हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों और भारतीय अमेरिकियों के साथ बातचीत के दौरान उनके सकारात्मक उत्तर की वजह से लगा कि वह नकारात्मकता को छोड़ आए हैं। वह आश्वस्त, मुखर और पूरी तैयारी के साथ बोल रहे थे। उन्होंने तर्कसंगत ढंग से बात की और एक जिम्मेदार राजनेता की तरह सामने आए, जिसमें आगे बढ़ने की संभावना है। देर से ही सही उन्होंने मोदी के कुछ गुणों को अपनाया है-आम लोगों के साथ उनकी ही भाषा में बात करना और स्थानीय मुद्दों को उठाना, ताकि वे उनसे जुड़ सकें। उन्होंने मोदी और अमित शाह के गढ़ गुजरात में जाने का साहस किया और दलितों, मुस्लिमों, किसानों, बेरोजगार युवाओं, छोटे व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों के साथ संपर्क करने की कोशिश की तथा नोटबंदी व जीएसटी के खिलाफ उनके गुस्से का फायदा उठाया। एक राजनेता के रूप में उनका कायाकल्प हो रहा है-गब्बर सिंह टैक्स (जीएसटी) और शाहजादा (अमित शाह के बेटे जय) जैसे तीखे शब्दों का इस्तेमाल करके वह आक्रामक रूप से बोलते हैं। यदि इस बार भी राहुल गुजरात में सरकार बनाने में विफल रहे, पर कांग्रेस का प्रदर्शन गुजरात में अच्छा रहा, तो भी मोदी की अजेयता पर दाग जरूर लगेगा। 

अपने कामकाज और नेतृत्व के बूते अपने विरोधियों को चुप कराने का राहुल के पास यह आखिरी मौका है। मोदी सरकार की विफलताओं की लंबी सूची तैयार करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। क्या उनके पास भाजपा से अलग कोई कहानी है, जो जनता को भाजपा के विकल्प के रूप में कांग्रेस को चुनने के लिए प्रेरित करे? क्या बिहार फार्म्यूले को दोहराया जा सकता है? क्या वह एक महागठबंधन बनाने के लिए तैयार हैं? क्या मोदी के आसपास बन रही विकल्पहीनता की स्थति को वह खत्म कर सकते हैं-इन सवालों का जवाब अगले एक साल में मिल सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed