भूमि कानून के हाशिये पर किसान
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दो साल पहले की बात है, जब गौतमबुद्ध नगर जिले के भट्टा पारसौल गांव में राहुल गांधी ने घोषणा की थी कि अब किसानों की जमीनें उनकी मर्जी के बगैर अधिगृहीत नहीं की जाएंगी। इसके लिए सरकार नया कानून लाएगी। किसान तब से लगातार इंतजार करते रहे, आंदोलन करते रहे और बार-बार बिल्डरों की लॉबी से मात खाते रहे। अब जाकर सरकार जो कानून लेकर आई भी है, वह उनको कम और उन भू माफियाओं को ज्यादा मुफीद होगा, जो इसकी काट जानते हैं। किसानों से औने-पौने दामों में खरीदी गई जमीन बिल्डर हजारों रुपये वर्गफीट के हिसाब से बेचते हैं। और किसान अपनी ही जमीन की तरफ घूम कर न देखने को अभिशप्त होता है।
संसद के मानसून सत्र में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन विधेयक को मंजूरी मिल गई। सरकार ने खुद माना है कि इस बिल के आने के साथ ही जमीनों के बाजार दर में तीस प्रतिशत का उछाल आया है। 1894 में अंग्रेजों ने रेलवे, डाक-तार, स्कूल, सड़कें, अस्पताल तथा कारखाने खोलने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था। इससे कृषि योग्य तथा आवासीय भूमि का अधिग्रहण आसान हो गया था और किसानों की जमीन से खुदमुख्तारी खत्म हो गई थी। हालांकि 1824 में बंगाल रेवेन्यू ऐक्ट लाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने किसानों से जमीन अधिगृहीत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, पर तब जमीनें सिर्फ सैन्य छावनियों के लिए ही ली जाती थीं। पर बंगाल रेवेन्यू ऐक्ट के 70 साल बाद बने कानून ने तो कलेक्टर को असीम ताकत दे दी और किसान अपनी जमीन की मिल्कियत खो बैठे। इससे लाभ निलहे गोरों को हुआ, जो इस कानून की आड़ में नील की खेती करवाने लगे, पर गांधी जी के चंपारण आंदोलन से इस पर रोक लग गई।
आजादी के बाद जब जमींदारी उन्मूलन हुआ, तब किसानों को लगा कि शायद अब उनकी जमीन अधिगृहीत नहीं की जा सकेगी। लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी के समय में संविधान का 25वां संशोधन पेश किया गया और राज्य सरकारों को असीम शक्तियां दे दी गईं कि कभी भी वे किसानों की कृषि योग्य जमीनों का अधिग्रहण कर सकती हैं। बस इसके लिए आपत्तियां मंगाई जाती हैं कि उस जमीन पर कोई धार्मिक स्थल अथवा अस्पताल आदि तो नहीं है और इसके बाद किसान की जमीन सरकार अपने कब्जे में ले सकती है।
इसके सात साल बाद 1978 में 44वां संशोधन लाया गया और अनुच्छेद 31 (1) (एफ) के जरिये किसान को अपनी जमीन के लिए अदालतों में जाने पर पाबंदी लगा दी गई। जमीन एक बार गई, तो फिर गई। इस कानून का फायदा राज्य सरकारों ने उठाया और वे खुद बिल्डर की भूमिका में आ गईं। आज हर महानगर के आसपास की जमीनें राज्य सरकारें खुद बेच रही हैं। चाहे वह नोएडा हो, गाजियाबाद हो, गुड़गांव हो या फरीदाबाद अथवा अन्य महानगर सब जगह जमीनें राज्य सरकारें अधिगृहीत कर बड़ें बिल्डरों और डेवलपर्स को दे रही हैं।
नए भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास बिल में तमाम राहतें दी गई हैं। अब किसान की जमीन सिर्फ सार्वजनिक कार्यों के लिए ही अधिगृहीत की जा सकती है। मसलन सैन्य कारखानों, रेलवे और नए हाई वे बनाने, शैक्षिक संस्थानों, अस्पतालों तथा रोजगार सृजन हेतु नई फैक्ट्रियों को खोलने के लिए ही जमीन ली जाएगी और किसी भी हालत में उसका भू उपयोग नहीं बदला जाएगा। सरकारी और सरकारी संरक्षण में चल रहे पीएसयू भी जमीन ले सकते हैं, इसके अलावा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत खुलने वाले उद्योगों के लिए भी कृषि जमीन ली जा सकती है। किसानों से जमीन सरकार की देखरेख में ही अधिग्रहीत होगी और किसान की मर्जी से ही जमीन ली जाएगी।
एक तरह से यह बिल किसानों और राज्य सरकारों के बीच टकराव को भी खत्म करेगा। साथ में उन किसानों के जीवनयापन के नए रास्ते भी तलाशेगा, जो एक बार अपनी जमीन बेचकर अपने जीवनयापन के सारे रास्ते बंद कर लेते हैं। शायद भट्ठा पारसौल जैसी घटनाएं फिर दोहराए जाने का अंदेशा अब नहीं रहेगा। लेकिन इसके बाद भी पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अब किसानों से जमीनें नहीं ली जाएंगी और कृषि योग्य जमीनें बदस्तूर बनी रहेंगी।