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आखिर किन मुद्दों पर वोट डाले मतदाता

Mon, 10 Mar 2014 07:07 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Mon, 10 Mar 2014 07:07 PM IST
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Lack of issue in lok sabha poll

हमारे लोकतंत्र के सामने जबर्दस्त चुनौती है। कोई कह सकता है कि संसदीय लोकतंत्र में चुनावी महीनों में ऐसा होना स्वाभाविक है। लेकिन इस बार लगता है कि ऐसा कुछ हो गया है कि आगे का रास्ता वाकई चुनौती भरा है।

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पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा चुनाव और उसके बाद त्रिशंकु विधानसभा के भयावह नतीजे पूरे देश ने देखे हैं। दिल्लीवासी तो खुद को राजनीतिक ठगी का शिकार महसूस कर रहे हैं और अब लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली की पुनरावृत्ति की कोशिशें हो रही हैं। खासतौर पर अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से हलचल मचा रखी है, उससे तो लगता है कि देश का मतदाता अब पूरी तरह से भ्रमित होने की स्थिति में है।
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वैसे यह पहला मौका है कि चुनाव के ऐलान के बाद भी यह साफ नहीं है कि चुनाव किस प्रमुख मुद्दे पर लड़ा जाना है? भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में जैसा माहौल बनाया गया था, उसकी धार लोकपाल विधेयक पारित होने के बाद कुंद हो गई है। महंगाई एक शाश्वत मुद्दे जैसा ही असर रखती है, जिसे हम प्रमुख मुद्दा नहीं मान सकते। बेरोजगारी मुद्दा बन सकती थी, पर सत्तारूढ़ यूपीए ने इस मामले में पिछले 10 वर्षों से एड़ी-चोटी का दम लगा रखा है। मनरेगा और विकास की अन्य परियोजनाओं को वह आजमा चुका है। जाहिर है, विपक्षी दल शायद ही इस मुद्दे को छूना चाहें। हां, केजरीवाल की पार्टी जरूर कुछ भी दावा कर सकती है, पर दिल्ली की नाकामी के बाद अब उसकी भी हैसियत दावे या वायदे करने की नहीं बची है।
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ले-देकर एक ही मुद्दा विकास का बचता है। अभी दो हफ्ते पहले तक भाजपा ने गुजरात मॉडल के नाम पर इसे जिंदा रखा था, लेकिन पिछले दिनों केजरीवाल ने जिस तरह मोदी के खिलाफ ताबड़तोड़ अभियान चलाया, उसने कम से कम संदेह तो पैदा कर ही दिया है। यह अलग बात है कि कांग्रेस साल भर से वही बातें कह रही थी, पर केंद्र में सत्तारूढ़ होने के कारण उसके प्रतिवाद का कोई असर ही नहीं था। मीडिया पिछले साल भर से मोदी, गुजरात का विकास और भाजपा की पुनर्स्थापना की जैसी मुहिम चलाता रहा है, उसके बाद वह फौरन उससे पलट कैसे सकता था! जाहिर है, केजरीवाल के गुजरात दौरे का प्रचार सिर्फ बौद्धिक स्तर पर संभव नहीं था, इसीलिए उन्होंने सनसनीखेज और हठयोग का रास्ता अपनाया, जिसका असर भी हुआ। पिछले दिनों कई महत्वपूर्ण घटनाएं छूट गईं, केजरीवाल तथा आप नेताओं-कार्यकर्ताओं का हंगामा व तोड़फोड़ की खबरें ही छाई रहीं। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के ऐलान के बाद राजनीतिक कर्म और चुनाव संबंधी दूसरी बातों का अचानक गायब हो जाना हमारे लोकतंत्र के सामने क्या बड़ी चुनौती नहीं है?


आज मतदाताओं के सामने फैसला लेने लायक तथ्यों का टोटा पड़ा हुआ है। उसके सामने सबकुछ खराब-खराब परोस कर बता दिया गया है कि अगर ये खाओगे, तो पछताओगे। पर कोई उसे यह नहीं बताता कि वह खाए क्या, यानी किसी दल के पास भविष्य की ऐसी कोई योजना नहीं है। मसलन, हर बार की तरह इस बार भी महिलाओं, युवाओं, गरीबों की पुरानी बातें ही होंगी। तो क्या यह मानें कि भारतीय राजनीति में ऐसी दिमागी मुफलिसी आ गई है कि हम अपनी समस्याओं की पहचान तक नहीं कर पा रहे हैं। और उससे भी बड़ी बात कि हम अपनी समयसिद्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था में संदेह बढ़ाते ही चले जा रहे हैं। संभव है कि मौजूदा व्यवस्था में संदेह पैदा कर देने का कोई सकारात्मक पहलू भी हो, लेकिन यह तब कितना खतरनाक होगा, जब हम यह न बता पाते हों कि वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था क्या हो सकती है? क्योंकि कहते हैं कि कोई भी समाज राजनीतिक शून्यता की स्थिति में पल भर भी नहीं रह सकता।

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