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पाकिस्तान को लेकर स्पष्ट नीति का अभाव
तवलीन सिंह
Updated Sun, 17 Jan 2016 06:44 PM IST
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अपने यहां जब भी पाकिस्तान की बात होती है, तो ऐसा लगता है कि हमारे राजनेताओं के पास 1947 से लेकर आज तक कभी स्पष्ट नीति नहीं रही है। अगर स्पष्ट नीति होती, तो हम इस सवाल को लेकर नहीं उलझते कि विदेश सचिवों की वार्ता होनी चाहिए या नहीं। सच तो यह है इस वार्ता से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि ऐसी वार्ता हम दशकों से करते रहे हैं।
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जबकि भारत को लेकर पाकिस्तान की नीति शुरू से स्पष्ट है। जब से पाकिस्तान बना है, तबसे आज तक वहां के सैन्य शासकों की कोशिश यही रही है कि विश्व की दृष्टि में हम बराबर के देश देखे जाएं। इसी को लेकर पाकिस्तान ने दशकों से अपना तकरीबन 40 फीसदी बजट हत्यारों पर खर्च किया है। इसी कारण जुल्फिकार अली भुट्टो ने कभी कहा था कि चाहे उनके लोगों को हजार वर्षों तक घास खानी पड़े, पाकिस्तान परमाणु शक्ति बनकर रहेगा। पाकिस्तान की नीति का एक और पहलू है, और वह यह कि भारत को तोड़ना जरूरी है, क्योंकि जब तक भारत नहीं टूटता, दोनों देशों में समानता असंभव है। यानी यदि कश्मीर का विवाद न भी होता, तो भी किसी न किसी बहाने पाकिस्तान दुश्मनी निभाता।
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हमारी समस्या यह है कि हम पाकिस्तान को कभी समझे ही नहीं, सो हमारी नीतियां भी इसी नासमझी के आधार पर बनती हैं। हम तभी कोई कदम उठाते हैं, जब पाकिस्तान पहले कुछ करता है। बांग्लादेश का उदाहरण ले लीजिए। अगर पाकिस्तानी सेना ने वहां कत्ल-ए-आम न किया होता, तो क्या उस देश के निर्माण में हमने मदद की होती? अगर पश्चिम बंगाल में लाखों शरणार्थी न आए होते, तो क्या हमारी सेना हस्तक्षेप करती?
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युद्ध जीतने के बाद हमने जीती हुई बाजी फिर से हारी, जब इंदिरा गांधी ने शिमला समझौते पर दस्तखत किया। याद कीजिए, भारत में उस समय 90 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सेना के कब्जे में थे। सो इंदिरा गांधी भुट्टो साहब को कह सकती थीं कि जब तक कश्मीर मसले का हल समझौते का एक अहम हिस्सा न हो, तब तक उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। ऐसा क्यों नहीं किया गया? अपने आला अधिकारियों से पूछिए, तो वे कहते हैं कि भुट्टो ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अगर वह इस बात को मानकर अपने वतन वापस लौटते हैं, तो उन्हें जिंदा नहीं रहने दिया जाएगा। हमको कहना चाहिए था कि उससे हमको क्या। लेकिन हमने इस उम्मीद से ऐसा नहीं कहा कि पाकिस्तान के साथ शांति कायम हो सकेगी।
इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं हुआ। अब भी हमारी नीति पाकिस्तान को लेकर तभी बनती है, जब पाकिस्तान कोई चाल चले। नरेंद्र मोदी ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, ठीक वैसे ही, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने बढ़ाया था। भाजपा जानती है कि उनके प्रधानमंत्रियों की राष्ट्रीयता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, इसलिए वे ऐसी पहल करने के लिए आगे बढ़ सकते हैं। पर उनकी समस्या यह है कि पाकिस्तान पर विश्वास करना मुश्किल है। सो विदेशी सचिवों में बातचीत हो या नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ने वाला। फर्क तब पड़ेगा, जब हमारे राजनेता साबित कर सकें कि इस खेल में जीतने की क्षमता उनमें है। यह कैसे करें, वही तय करना होगा। जब हम यह दिखा सकें कि इस्राइल और अमेरिका की तरह हम भी अजहर मसूद और हाफिज सईद जैसे शत्रुओं को खत्म करने की क्षमता रखते हैं, तभी क्षितिज पर अमन के आसार दिखने लगेंगे।