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सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध, रास्ता दिखाता लाचेन

Tue, 24 Sep 2019 04:43 AM IST
पंकज चतुर्वेदी पंकज चतुर्वेदी
पंकज चतुर्वेदी Published by: पंकज चतुर्वेदी Updated Tue, 24 Sep 2019 04:43 AM IST
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Lachen Guiding the way
पंकज चतुर्वेदी - फोटो : a

तिब्बत से लगते उत्तरी सिक्किम जिले में समुद्र तल से 6,600 फुट की ऊंचाई पर लाचेन और लाचुंग नदियों के संगम पर स्थित लाचेन गांव का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है। गंगटोक से 125 किलोमीटर दूर इस गांव को ब्रिटिश घुमक्कड़ जोसेफ डॉल्टन हुकर ने 1855 में दुनिया का सबसे सुंदर गांव बताया था। इस छोटे-से गांव की अर्थव्यवस्था का आधार पर्यटन है। कहा जाता है कि गुरु नानक देव जी तिब्बत की यात्रा के दौरान इसी रास्ते से गुजरे थे और लाचेन से करीब 68 किलोमीटर दूर उन्होंने बर्फ में अपनी छड़ी घुसाकर पानी निकाला था। कहते हैं कि तभी से वहां एक झील बन गई, जिसे गुरुडोंगमर कहते हैं। जब तापमान शून्य से नीचे हो, तब भी इस झील का पानी बर्फ नहीं बनता। गुरुडोंगमर जाने वाले यात्रियों को ठहरने के लिए लाचेन ही आना होता है।


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कभी इस गांव का मौसम हमेशा ठंडा रहता था। लोग पूरे साल रजाई में सोते थे। भारत-चीन के बीच सीमा व्यापार शुरू होने के बाद इस क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी। राज्य सरकार ने लाचेन को 'हेरिटेज विलेज' घोषित किया और कुछ अफसरों ने घरों में पर्यटकों को ठहराने की योजना बना दी। शुरुआत में स्थानीय लोगों को अच्छा लगा कि इतने पर्यटक पहुंच रहे हैं। पैसे की गर्मी के बीच उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनके बीच गर्मी एक मौसम के रूप में आ गई। बरसात में पानी नहीं बरसता और बैमौसम ऐसी बारिश होती कि खेत- घर उजड़ जाते। पिछले साल वहां जंगल में आग लगने के बाद बढ़े तापमान से लोगों का जीना मुहाल हो गया था। यह गांव ग्लेशियर के करीब बनी झील षाको-चो से निकलने वाली कई सरिताओं का रास्ता रहा है। डीजल वाहनों के अंधाधुंध आगमन से उपजे भयंकर धुएं से सरिताओं पर असर होने लगा। गांव की संरक्षक झील गुरुडोंगमर की धारा कब सिकुड़ गई, पता ही नहीं चला। बढ़ते प्लास्टिक व अन्य कचरे से ऑर्गेनिक खेती पर विपरीत असर पड़ रहा था।

जब हालात असहनीय हो गए, तो स्थानीय समाज को अपनी गलतियां याद आईं। गांव के लोगों को समझ में आ गया कि प्रकृति है, तभी उनका जीवन है, और इसके लिए जरूरी है कि वैश्विक रूप से हो रहे मौसमी बदलाव के अनुसार अपनी जीवन शैली में सुधार लाएं। सरकारी आदेश या सजा के डर के बगैर उन्होंने तय किया कि गांव में न तो पानी की बोतल आएगी, न ही डिस्पोजेबल थर्मोकोल या प्लास्टिक के बर्तन।

लोग बायोडिग्रेडेबल कचरा खुद अलग करते हैं व उसका निपटान भी खुद करने लगे। गुरुडोंगमर झील के चारों ओर सफाई की गई और अब वहां कचरा फेंकना दंडनीय अपराध है। गांव के हर होटल और दुकान को आरओ का स्वच्छ पानी उपलब्ध कराया जाता है और पैक्ड पानी बेचने को अपराध घोषित किया गया है। स्थानीय समाज और पुलिस हर वाहन की तलाशी लेती है, ताकि प्लास्टिक की कोई बोतल न घुस पाए। यह सभी जानते हैं कि प्लास्टिक की बोतलों का जो अंबार जमा हो रहा है, उसका महज 20 फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है। बोतलबंद पानी की कीमत तो ज्यादा है ही,  इसके बावजूद जो जल परोसा जा रहा है, उसके सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है। आधुनिक विकास की कीमत चुका रहे नैसर्गिक परिवेश में पानी पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। जल जनित बीमारियों से भयभीत समाज पानी को निर्मल रखने के प्रयासों की जगह बाजार के फेर में फंस खुद को ठगा-सा महसूस कर रहा है। ऐसे में, लाचेन गांव उम्मीद की किरण जगाता है।

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