निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है

अशोक कुमार पांडेय Updated Tue, 27 Nov 2012 12:01 PM IST
Kavita ashok kumar pandey
तुमने मेरी उंगलियां पकड़ कर चलना सिखाया था पिता
आभारी हूं, पर रास्ता मैं ही चुनूंगा अपना
तुमने शब्दों का यह विस्मयकारी संसार दिया गुरुवर
आभारी हूं, पर लिखूंगा अपना ही सच मैं
मैं उदासियों के समय में उम्मीदें गढ़ता हूं और अकेला नहीं हूं बिलकुल
शब्दों के सहारे बना रहा हूं पुल इस उफनते महासागर में
हजारो-हज़ार हांथों में, जो एक अनचीन्हा हाथ है, वह मेरा है
हज़ारो-हज़ार पैरों में जो एक धीमा पांव है, वह मेरा है
थकान को पराजित करती आवाजों में एक आवाज़ मेरी भी है शामिल
और बेमक़सद कभी नहीं होती आवाजें...
निष्पक्ष सिर्फ पत्थर हो सकता है उसे फेंकने वाला हाथ नहीं
निष्पक्ष कागज हो सकता है कलम के लिए कहां मुमकिन है यह?
मैं हाड़-मांस का जीवित मनुष्य हूं
इतिहास और भविष्य के इस पुल पर खड़ा नहीं गुज़ार सकता अपनी उम्र
नियति है मेरी चलना और मैं पूरी ताक़त के साथ चलता हूं भविष्य की ओर

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