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कश्मीर : अशांति है, प्रतिरोध नहीं
Thu, 31 Oct 2019 07:48 AM IST
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़, सेवानिवृत्त मेजर जनरल
हर्ष कक्कड़, सेवानिवृत्त मेजर जनरल
Published by: हर्ष कक्कड़
Updated Thu, 31 Oct 2019 07:48 AM IST
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विगत पांच अगस्त को केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा लेने और उसके बाद वहां लोगों का जमावड़ा न होने देने तथा टेलीफोन तथा मोबाइलों पर प्रतिबंध लगा देने को कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मानवाधिकार हनन की संज्ञा दी। स्थानीय राजनेताओं को हिरासत में लेने के बाद तो ऐसी संस्थाओं की आवाज और भी तेज हो गई। इस समय सिर्फ इंटरनेट को छोड़कर तमाम प्रतिबंध हटा लिए गए हैं।
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हमारी सरकार के इस कदम ने भारत-पाक विमर्श को बदल दिया है, क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला स्थायी प्रकृति का है। कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान ने तीन लड़ाइयां लड़ीं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। दोनों देशों के बीच बातचीत हमेशा विफल रही, क्योंकि पाकिस्तान समस्या को बनाए रखना चाहता है और बातचीत के जरिये मसला हल करने के बारे में संजीदा नहीं है। भारत कश्मीर मुद्दे पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता कभी स्वीकार नहीं करेगा और वार्ता शुरू करने की उसकी शर्त यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद को वित्तपोषित करना बंद करे। पाकिस्तान चूंकि जानता है कि सैन्य क्षमता में वह भारत का मुकाबला नहीं कर सकता, इसलिए कश्मीर में भारत के फैसले के बाद इसे घेरने के लिए उसने कूटनीतिक प्रयासों के अलावा आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देना शुरू किया है।
हाल के दिनों में घाटी से प्रतिबंध हटाने की मांग तेज हुई है। अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की एशिया-प्रशांत की सब-कमेटी के कुछ सदस्यों ने इंटरनेट पर प्रतिबंध बरकरार रखने पर भारत को फटकारा है। उन्होंने अमेरिकी सीनेटर क्रिस वैन हॉलेन को घाटी का दौरा न करने देने के भारत सरकार के फैसले की भी आलोचना की है। कश्मीर पर वैश्विक आलोचना की धार कम करने के लिए मोदी सरकार ने यूरोपीय संसद के चुने हुए 27 सदस्यों को घाटी का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन उनमें से 23 सांसदों ने ही कश्मीर का दौरा किया। विदेशी सांसदों के इस दौरे के पीछे उन्हें घाटी के माहौल के बारे में जानने का अवसर देना तथा सेना से बातचीत करना था, जो जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर नजर रखे हुए है, और जिसने घाटी में हिंसा को बढ़ावा देने तथा आतंकियों की घुसपैठ कराने के पीछे पाकिस्तान की संलिप्तता का सुबूत दिया।
हमारी सरकार के इस फैसले का हालांकि विपक्षी राजनीतिक पार्टियां आलोचना कर रही हैं, लेकिन यह कश्मीर पर भारत के नजरिये के बारे में दुनिया को बताने का पहला कदम था कि घाटी में शांति है, और अगर कहीं हिंसा है, तो उसके पीछे पाकिस्तान की साजिश है। पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदायों की आलोचना को बेअसर करने के लिए आने वाले दिनों में कश्मीर में और भी विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का दौरा होगा। हालांकि विदेशियों के ऐसे दौरों से कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण होगा, लेकिन इस मामले में सरकार के पास विकल्प बहुत कम हैं। भारत की इस योजना से पाकिस्तान वाकिफ है, लिहाजा उसने घाटी में आतंकी हमले बढ़ा दिए हैं, ताकि यह प्रचारित किया जा सके कि कश्मीर अशांत है।
अनुच्छेद 370 को हटाए करीब तीन महीने हो गए हैं। इस दौरान न तो एक भी गोली चली और न ही सुरक्षा बलों के हाथों कोई नागरिक मारा ही गया। स्कूलों और अस्पतालों सहित तमाम सरकारी सेवाएं चालू हैं, हालांकि आतंकवादियों और पाक समर्थकों के बल प्रयोग से ये सेवाएं जरूर बाधित हुई हैं। प्रतिबंधों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कहने के पीछे की मंशा दरअसल यह प्रचारित करना है कि घाटी में अनिश्चय और हिंसा है तथा सरकार ने प्रतिबंध लगाए हैं। बेशक पत्थरबाजी की कुछ घटनाएं हुई हैं, लेकिन यह तो हमेशा होती रहती है।
वहां 10 वीं के बोर्ड की परीक्षा शुरू हुई है, जिसमें पहले दिन 99 प्रतिशत छात्रों की उपस्थिति थी। आतंकवादियों द्वारा परीक्षा के बहिष्कार के आह्वान के बावजूद इतनी उपस्थिति इसका सुबूत है कि आम कश्मीरी हिंसा का समर्थन नहीं करता। पाकिस्तान और कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार कह रही थी कि प्रतिबंध हटा लेने के बाद हिंसा बढ़ेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह महसूस कर, कि हिंसा फैलाने की उसकी कोशिश विफल हो चुकी है, पाकिस्तान ने अब आतंकियों की घुसपैठ कराने का काम तेज कर दिया है, ताकि जम्मू-कश्मीर में ध्वस्त कर दिए गए आतंकी ढांचे को दोबारा सक्रिय किया जा सके। ऊंचे पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी शुरू होने लगी है, ऐसे में, आने वाले दिनों में घाटी में घुसपैठ करना कठिन हो जाएगा। आतंकियों की घुसपैठ पाकिस्तान के सहयोग के बिना संभव नहीं है, इसलिए पाक सेना सुनियोजित तरीके से संघर्ष विराम का उल्लंघन कर घुसपैठ के काम को अंजाम देने की कोशिश में लगी है। पर चूंकि भारत इसका मुंहतोड़ जवाब देने की नीति पर चल रहा है, ऐसे में, पाक सेना का नुकसान बढ़ रहा है। कश्मीर में केंद्र सरकार के फैसलों के विरोध में हुई हिंसा पर कभी प्रतिबंधों और सुरक्षा बलों की उपस्थिति का असर नहीं पड़ा। 2010 और 2016 में घाटी में सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी थी, इसके बावजूद वहां अभूतपूर्व हिंसा हुई। 2016 में इंटरनेट पर तीन महीने तक जारी प्रतिबंध के बावजूद हिंसा जारी रही, जिसमें 75 लोग मारे गए थेे। लेकिन इस समय ऐसा नहीं है। ऐसे में पाक प्रायोजित आतंकी आसान शिकार चुन रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने 11 लोगों की जान ली है। यूरोपीय संसद के प्रतिनिधियों के दौरे के समय भी पत्थरबाजी की घटनाएं बढ़ीं।
सैनिक भर्ती अभियान में भीड़ और अब परीक्षा में छात्रों की मौजूदगी बताती है कि घाटी में व्याप्त हिंसा और हत्या में स्थानीय लोगों की भागीदारी नहीं है। अगर कश्मीरी नागरिक केंद्र सरकार के फैसले से नाराज होते, तो हिंसा का स्तर कुछ और होता। लिहाजा आतंकवादी कश्मीर को भले ही अशांत क्षेत्र बताएं, वे वहां स्थानीय प्रतिरोध को साबित नहीं कर सकते, जैसा कि पाकिस्तान दुनिया भर में प्रचारित कर रहा है। इसलिए दुनिया भर में यह संदेश जाना चाहिए कि कश्मीर सरकार के फैसले के साथ खड़ा है।