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फिल्म से अलग है कश्मीर की कहानी

Fri, 10 Oct 2014 06:34 PM IST
शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल Updated Fri, 10 Oct 2014 06:34 PM IST
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Kashmir story is different from film

जिनको कश्मीर का यथार्थ नहीं पता, वे निश्चित ही विशाल भारद्वाज की हैदर फिल्म देखकर यह अनुमान लगाने लगेंगे कि घाटी में सेना जबरिया थोप दी गई है। फिल्म देखकर लोग सोशल मीडिया पर सेना के कामकाज पर सवाल उठाने लगे हैं। कुछ लोग इस बहाने मोदी सरकार पर भी उंगली उठा रहे हैं। मगर यह नहीं बता पा रहे कि सेना तो वहां तब से है, जब केंद्र में भाजपा की सरकार बन जाने की कल्पना तक मुश्किल थी। सेना वहां बिगड़ते माहौल को शांत करने के वास्ते भेजी गई थी और अगर सेना कश्मीर घाटी न जाती, तो कश्मीर के अलगाववादी तत्व पाकिस्तान की शह में आकर कब के उसे एक नए पीओके में बदल देते। यह सेना का ही कमाल था, जिसने घाटी के लोगों को जीने के और जीवनयापन के साधन मुहैया कराए। एक फिल्मकार को कुछ सकारात्मक दिखाना चाहिए, मगर विशाल भारद्वाज ने अपनी बढ़त दिखाने के लिए एक ऐसा कल्पित माहौल और विषय चुना, जो सेना को कश्मीरियों की घृणा का प्रतीक बताता है। पर जो लोग कश्मीर को जानते हैं, उनके लिहाज से हैदर फिल्म विशाल की हताशा की उपज है।

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शांत कश्मीर घाटी में आतंक सेना ने नहीं, बल्कि उन यासीन मलिक और अशफाक माजिद वानी और फारुख मोहम्मद डार ने फैलाया, जिनके बारे में न तो यह फिल्म कुछ बोलती है, न विशाल के गुब्बारे को फुलाने वाले वामपंथी। सच तो यह है कि जब अफगानिस्तान में सोवियत दखलंदाजी शुरू हुई, तो अफगान लड़ाके भागकर कश्मीर में आ गए और कश्मीर घाटी को बफर स्टेट बनाने की खातिर उन्होंने यहां आतंकी गतिविधियां शुरू कीं। बाद में इन लड़ाकों को पाकिस्तान की मदद मिलनी शुरू हुई। तब इन अफगान लड़ाकों और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासीन मलिक, अब्दुल माजिद वानी तथा फारुख अहमद डार पर अंकुश लगाने में जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के नाकाम रहने पर सेना वहां गई और उसने यासीन मलिक को हथियार डालकर सरेंडर करने पर विवश किया और सद्भावना कार्यक्रम चलाकर कश्मीरियों का भारत संघ में भरोसा लौटाया। यह सेना का ही कमाल था कि 1995 में यासीन मलिक ने हिंसा का रास्ता छोड़ देने की प्रतिज्ञा ली। सेना का कश्मीर में रहना इसलिए भी अपरिहार्य है, क्योंकि वहां आज अल कायदा से लेकर पाकिस्तानी घुसपैठियों का डर हर वक्त सताया करता है।
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कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के बारे में कोई फिल्म हकीकत नहीं बयान कर सकती। कश्मीर को समझने के लिए पुंछ सेक्टर ही नहीं, बल्कि पुलवामा, कुलगाम और सोफियां में जाकर रहना होगा। जहां लगभग रोज रात मोर्टार और राकेट दागे जाते हैं और जहां किस ग्रामीण के घर आतंकी घुसकर पैठ बना लें, पता नहीं। पाकिस्तान यहां इतना पैसा और घुसपैठिये भेजता है कि वे लोग अकेले-दुकेले पाकर सीआरपीएफ के जवानों पर पथराव करते हैं और स्थानीय निवासियों को उकसाते हैं कि पत्थर फेंको, हर पत्थर के 500 रुपये मिलेंगे। मैं गत 24 जुलाई को सोफियां जिले के भलपुरा गांव में रुका था। वहां पर मोहम्मद बिलाल लोन ने बताया कि रात को यहां कब गोली चलने लगे, पता नहीं। तब पास की राष्ट्रीय राइफल्स के फौजियों का ही सहारा रहता है।
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सच तो यह है कि सेना पर लोगों को भरोसा है। उन्हें लगता है कि यह सेना ही है, जिसके जवानों की देखरेख के चलते वे चैन की नींद सोते हैं। ऐसे नाजुक विषय पर विशाल भारद्वाज ने बशारत पीर की कहानी पर फिल्म बनाई, पर एक बार भी घाटी जाकर हालात से रूबरू होने का प्रयास नहीं किया। यह फिल्म उनकी समझ को उजागर तो करती  ही है।

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