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कश्मीर : चुनाव के साथ नजरिया भी
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कश्मीर
कश्मीर का मुद्दा स्पष्ट तौर पर भारत के लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती है। यह चुनौती तब तक रहेगी, जब तक भारत विभिन्न आयामों में इस समस्या का समाधान करने के लिए अपना नजरिया पेश नहीं करता। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा की है कि सरकार कश्मीर में फिर से चुनाव कराने के लिए तैयार है। यह घोषणा केवल उन लोगों को खुश करेगी, जो इस विचार से मंत्रमुग्ध हैं कि लोगों को वोट डालने की अनुमति देना कश्मीर में व्याप्त गड़बड़ी का जवाब है।
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कश्मीर 'की' समस्या कश्मीर 'में' समस्याओं को पोषित करती है। कश्मीर की समस्या भारत की सामूहिक विफलताओं का नतीजा है, जिन्होंने पाकिस्तान को कश्मीर की अलग-थलग पड़ी जनता का विकल्प बनने की अनुमति दी है। यह कश्मीर के भीतर की गड़बड़ियों का परिणाम है, क्योंकि नई दिल्ली और श्रीनगर के राजनेताओं ने जम्मू-कश्मीर राज्य के मुद्दों को नियंत्रण से बाहर जाने दिया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वे या तो यह चाहते हैं कि कश्मीर मुद्दा अनंत काल तक जारी रहे या उनके पास चुनौतियों का सामना करने के लिए कोई दीर्घकालीन योजना नहीं है। बाद वाले निष्कर्ष की पुष्टि तो कई जानकार विशेषज्ञों ने भी की है।
लेकिन आइए, सबसे पहले कश्मीर में चुनाव के मुद्दे पर चर्चा करते हैं। अधिकांश लोग इस बात से सहमत हैं कि 1987 के चुनाव में जो धांधली हुई थी, उसी के चलते पिछले तीन दशकों से कश्मीर में उथल-पुथल का माहौल है। उस धांधली को उन्हीं पार्टियों ने अंजाम दिया था, जो जनता की बेहतरी का दम भरती हैं। और हालांकि कम से कम तीन अवसरों पर कश्मीर में प्रभावी आतंकवाद निरोधी अभियानों के चलते अपेक्षाकृत शांति का दौर रहा है, लेकिन हमारे राजनेताओं ने उन अवसरों को गंवाया है, मानो वे कश्मीर की इच्छा मृत्यु की कामना कर रहे हों!
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद पीडीपी तथा भाजपा और उनके प्रवक्ताओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद किसी भी पर्यवेक्षक के लिए यह स्पष्ट था कि जम्मू-कश्मीर में इनका 'गठबंधन' काम नहीं करने वाला है। उन दोनों ने एक राजनीतिक अवसर का अधिकतम लाभ उठाने के लिए गठबंधन किया था। यह एक परेशान करने वाला गठबंधन था, क्योंकि मुख्यमंत्री ने तब तक साझेदारी का मुखौटा ओढ़ रखा था, जब तक कि भाजपा नेतृत्व ने उनसे समर्थन नहीं हटा लिया। दरअसल 2019 का चुनाव करीब होने के कारण भाजपा नेतृत्व को अचानक इस गठबंधन की अस्थिरता का एहसास हुआ, क्योंकि घाटी में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ रही थीं। जबकि इस हास्यास्पद गठबंधन के पूरे तीन साल या उससे अधिक के कार्यकाल में घाटी के युवाओं के कट्टरपंथी होने की खबरें बार-बार सामने आईं।
इसलिए, चुनी हुई सरकार के अतीत के अनुभवों को देखते हुए कहा जा सकता है कि कश्मीरी लोगों को परेशान करने वाले मुद्दों का समाधान ढूंढे बिना वहां के लोगों की मांगों का जवाब अगर एक और चुनाव मान लिया जाए, तो उससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है। यह एक तरह से दिल्ली से श्रीनगर के पाले में गेंद फेंकने जैसा है। इससे एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का एक और दौर शुरू हो जाएगा। राजनेता और अलगाववादी (जो स्वयं को वहां के लोगों का स्वयंभू प्रवक्ता बताते हैं), दोनों इस पर जोर दे रहे हैं कि दूसरे पक्ष ने वह नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था और खुद उनके पास कश्मीर की समस्या को हल करने के लिए जादू की छड़ी है।
वास्तविकता यह है कि वहां केवल चुनाव की नहीं, बल्कि सुशासन और विकास की भी जरूरत है। पिछले कुछ दशकों में इस दिशा में अगर कुछ हुआ भी है, तो वह बहुत कम। हालांकि नई दिल्ली की तरफ से जम्मू एवं कश्मीर प्रांत में काफी पैसा खर्च किया गया है, लेकिन वह पैसा कहां खर्च हुआ, यह दिखाने के लिए कुछ नहीं है।
दिल्ली के मंत्री कहते हैं कि धन का हस्तांतरण पारदर्शिता की मांग से जुड़ा है कि उसे कहां खर्च किया जा रहा है, वहीं श्रीनगर के नेता अनुच्छेद 370 के तहत अपनी वित्तीय स्वायत्तता का हवाला देते हुए धनराशि न लेने की बात करते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि विकास स्थानीय नेताओं का लक्ष्य नहीं है। दरअसल विकास की कमी का ही वे बाद में राजनीतिक लाभ लेते हैं, क्योंकि वोट बटोरने और अपने लालच की पूर्ति के लिए ऐसा करना मुफीद होता है। ऐसे में दिल्ली के नेता असहाय नजर आते हैं।
ऐसे ही हर स्थानीय कश्मीरी राजनेता का आग्रह है कि सेना को बैरकों में वापस चले जाना चाहिए, मानो चुनावों के साथ आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। क्या ऐसा इसलिए है कि वे भारत विरोधी समूहों को घाटी में स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति देकर भीतर की समस्याओं को हल नहीं करना चाहते हैं?
आतंकवाद के मूल में कोई कारण अवश्य होता है, चाहे वह राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक हो। और कश्मीर में, ऐसा पिछले तीन दशकों से है। और इन कारणों का दोहन वहां आंतरिक शक्ति और पाकिस्तान जैसी बाहरी शक्ति द्वारा किया जा रहा है। और एक अलग-थलग पड़ी आबादी, जिसे मौजूदा गड़बड़ी में कोई उम्मीद नजर नहीं आती है, सीमा पार आतंकवाद में पांचवें स्तंभ के रूप में शामिल हो जाते हैं या उनके अनुसार काम करने के लिए मजबूर होते हैं।
इस तरह की घातक स्थिति घाटी में लंबे समय से है, और एक दूरदृष्टि वाले नेतृत्व को चुनावी अभियान चलाने से अलग जम्मू-कश्मीर के लिए एक पंचवर्षीय योजना तैयार करनी चाहिए और उसे अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ लागू करना चाहिए। जब तक नई दिल्ली ऐसा नहीं करती, कश्मीर में समस्या बनी रहेगी, जिसका समाधान 25 वर्ष पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि कश्मीर एक धंधा बन चुका है, जिससे अनेक लोग लाभान्वित होते हैं।