अनुच्छेद 370 का हटना : कश्मीर से मतलब कश्मीरियों से नहीं
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जब हमारे देश के लोग अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो हम उनसे एक नैतिक हक मांग रहे थे कि भारतीयों को खुद के निर्णय लेने का हक होना चाहिए यानी राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन। तब हमारी मांग यह थी कि भारतीय लोगों की राय ही (अंग्रेजों की नहीं) यह तय करेगी कि यहां किसका राज हो।
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जब हमारे देश के लोग अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो हम उनसे एक नैतिक हक मांग रहे थे कि भारतीयों को खुद के निर्णय लेने का हक होना चाहिए यानी राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन। तब हमारी मांग यह थी कि भारतीय लोगों की राय ही (अंग्रेजों की नहीं) यह तय करेगी कि यहां किसका राज हो।
कश्मीर जब भारत के साथ चलने के लिए तैयार हुआ, तब उसने कुछ शर्तें रखी थीं। उसमें से एक शर्त थी यह हक (राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन) जताने का मौका उसे भी दिया जाएगा। हमारी आजादी की लड़ाई 1947 में खत्म हो गई, लेकिन कश्मीरियों के लिए जारी रही। कश्मीर में कश्मीर वादी के सुन्नी, कश्मीरी पंडित, लद्दाख के बौद्ध लोग, कारगिल के शिया, जम्मू के हिंदू और अन्य समुदाय (सिख भी!) के लोगों के भविष्य का सवाल है।
वहां का इतिहास और वर्तमान पेचीदा है, वह किन शर्तों पर भारत में शामिल हुआ, हम न जानें, लेकिन हमें यह तो पता ही है कि वहां संघर्ष चल रहा है। कश्मीर के कई लोग अपने आप को न भारत का और न ही पाकिस्तान का हिस्सा मानते हैं। लेकिन बीते पांच अगस्त, 2019 को जब कश्मीरियों के बारे में केंद्र सरकार ने फैसला लिया, तो वही हक कश्मीरियों से पूरी तरह से छीन लिया गया।
पांच अगस्त, 2019 को जो हुआ, उसका नैतिकता के अलावे कानूनी पक्ष भी है। जब कश्मीर ने भारत के साथ जुड़ने का फैसला किया, तो उसने कई शर्तें रखी थीं। अनुच्छेद 370 के तहत अंदरूनी मामलों में कश्मीर को अपने नियम-कानून बनाने की आजादी दी गई थी। एक शर्त थी कि अनुच्छेद 370 में कोई बदलाव करने से पहले राज्य की 'संविधान सभा' की सहमति लेनी होगी।
चूंकि जम्मू-कश्मीर अलग था, उनकी खुद की संविधान सभा थी, और जनवरी, 1957 में जब उसे भंग किया गया, तब न तो अनुच्छेद 370 को बदला गया और न ही उसे रद्द किया गया। इससे अनुच्छेद 370 एक तरह से 'स्थायी' हो गया।
हां, इस पूरी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक ढांचे में ढाला जरूर गया है। उदाहरण के लिए, लोकसभा और राज्यसभा में इससे संबंधित विधेयक को लाना, उस पर चर्चा करना, इत्यादि। लेकिन वास्तव में यह संविधान, लोकतंत्र और शालीनता के दायरे से बाहर है। एक छोटा-सा उदहारण- जब संसद में चर्चा हुई, तब गृहमंत्री ने कहा कि 'अनुच्छेद 370 के कारण ही वहां गरीबी घर कर गई। अनुच्छेद 370 के कारण ही वहां विकास, शिक्षा और बेहतर चिकित्सा सुविधाएं नहीं पहुंच पाईं।'
केंद्रीय गृह मंत्री का यह बयान सच के बिल्कुल विपरीत है। गुजरात (जिसे 'विकास का मॉडल' कहा गया है) में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का प्रतिशत (लगभग 20 फीसदी) जम्मू-कश्मीर से दोगुना (लगभग 10 फीसदी) है। लड़कियों की शिक्षा के मामले में भी कश्मीर (गुजरात से भी) आगे है। उदाहरण के लिए, 15-19 साल की लड़कियों (जिन्होंने आठ साल शिक्षा पाई है) का प्रतिशत जम्मू-कश्मीर में 87 फीसदी है, जबकि गुजरात में 75 फीसदी।
कश्मीर में लोग ज्यादा जीते हैं (74 साल), जबकि गुजरात में औसत जीवन अवधि इससे पांच साल कम है। वहां प्रजनन दर 1.7 है, जबकि गुजरात में 2.2 है। कुपोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि कई पहलुओं में जम्मू-कश्मीर कई अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति में है। यह सब तब है, जबकि वहां दशकों से हिंसा का माहौल रहा है।
यदि यह सब कश्मीर के लोगों के लिए किया जा रहा है, तो उन्हें, उनके नेताओं को घरों में कैद करने की जरूरत क्यों है? संपर्क के सारे साधन-फोन, इंटरनेट आदि बंद कर दिए गए हैं। सलाह करना तो दूर, निर्णय लेने के बाद भी कश्मीर के लोगों को नहीं बताया गया कि उनके बारे में क्या निर्णय लिया गया है। अखबारों के अनुसार, इस समय कश्मीर में हर 16 व्यक्ति पर एक सुरक्षा कर्मी है। आम लोगों पर इतनी फौज लगाने की जरूरत क्यों है?
सरकार के इस निर्णय के बाद देश के शेष हिस्सों में कुछ लोग खुशी माना रहे थे। कुछ लोग ट्विटर पर कश्मीरी युवतियों की तस्वीर साझा करते हुए कह रहे हैं कि अब ससुराल कश्मीर में, तो व्हाट्सऐप पर श्रीनगर में जमीन खरीदने के मैसेज भी चलने लगे। गुजराती अखबार में भी ऐसी खबर छपी कि आप अब कश्मीर में चालीस लाख रुपये में छह मंजिला इमारत खरीद सकते हैं। कुछ लोग इसे पकिस्तान पर विजय बताकर खुशी मना रहे हैं। इन सबसे प्रतीत होता है कि हमें कश्मीरियों से कोई मतलब नहीं, केवल कश्मीर से है।