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काशी-तमिल संगम : एक भारत का आह्वान, विभाजनकारी विचारों को तिलांजलि देने की तैयारी
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काशी तमिल संगमम।
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अमर उजाला
विस्तार
विभाजनकारी परिभाषाएं देना एवं कोटियां बनाना पूरी दुनिया में औपनिवेशिक शासन की प्रशासकीय तकनीकी रही है। इसी से ‘डिवाइड एंड रूल’ का उनका लक्ष्य पूरा होता रहा है। दुनिया भर में आजादी के बाद किसी भी राजनीतिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है कि धीरे-धीरे ऐसी हरेक राजनीतिक स्मृतियों एवं विभाजनकारी परिभाषाओं को ध्वस्त कर एक समाहारी एवं समरस राष्ट्र निर्मित करें।
उत्तर-दक्षिण, आर्य-अनार्य और आर्य-द्रविड़ के अनेक विभाजनकारी संबंध, परिभाषाएं एवं नाम के संबंध औपनिवेशिक अध्ययनों एवं एंथ्रोपोलॉजिकल विमर्शों के माध्यम से स्थापित होते रहे हैं। औपनिवेशिक विचार हमारे कुछ देशी विचारकों को भी प्रभावित करते रहे हैं। वहीं कुछ भारतीय चिंतकों ने उत्तर-दक्षिण, आर्य-अनार्य एवं आर्य-द्रविड़ के विभाजनकारी दायरों को तोड़ते हुए अनेक औपनिवेशिक मिथकों को ध्वस्त किया है। हिंदी के महत्वपूर्ण चिंतक रामविलास शर्मा, पुरातत्वविद वसंत शिंदे एवं भगवान सिंह के अध्ययनों ने ऐसे अनेक विभाजनकारी औपनिवेशिक मिथकों को तोड़ा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पंच प्राण में ऐसे ही औपनिवेशिक विभाजनों को तोड़ने को एक महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में प्रतिपादित किया है। इसी क्रम में उत्तर-दक्षिण, आर्य-द्रविड़ इत्यादि जैसे विभाजनों को तोड़ने के लिए उन्होंने दो वर्ष पूर्व ‘काशी-तमिल संगमम’ की अवधारणा विकसित की, जिसमें काशी और तमिलनाडु, उत्तर भारत एवं तमिल संस्कृति के आपस में जुड़े अनेक धागों, स्मृतियों एवं जीवंत संबंधों को नए संदर्भ में पुनः आविष्कृत कर उन्हें संवाद, सम्मिलन के माध्यम से जीवंत करने का एक अभियान प्रारंभ किया गया है। काशी-तमिल संगमम में तमिलनाडु एवं उत्तर भारत की कला, संस्कृति, ज्ञान और तकनीकी दक्षता का एक साथ समन्वय एवं संवाद काशी में आयोजित किया जाता है। इस बार 15 फरवरी को तीसरा काशी-तमिल संगमम प्रारंभ होने जा रहा है। यह आयोजन केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में भारत सरकार के अन्य संबंधित विभागों के समन्वय से आयोजित कराया जाता रहा है। इस वर्ष इस समवाय का केंद्रीय प्रतीक ‘अगस्त्य मुनि’ हैं।
अगस्त्य ऋषि की स्मृति के इर्द-गिर्द इस बार काशी-तमिल संगमम की रूपरेखा विकसित की जा रही है और इसके माध्यम से भारत की एकता का संदेश देने की कोशिश भी हो रही है। यह विदित है कि अगस्त्य मुनि उत्तर एवं दक्षिण के मध्य संवाद एवं संचरण स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण प्रतीक पुरुष रहे हैं। कहा जाता है कि उन्हें हिमालय से भगवान शंकर ने तमिलनाडु भेजा था। यह भी मान्यता है कि वे तमिलनाडु के वासी थे, उन्हें भगवान शंकर ने हिमालय बुलाया। उनका प्रतीक एक प्रकार से हिमालय एवं समुद्र, उत्तर एवं दक्षिण, उत्तर की भूमि एवं दक्षिण की भूमि के बीच संवाद का वृतांत भी है। यह भी माना जाता है कि दक्षिण एवं उत्तर के बीच की यात्रा की दुरूहता समाप्त करने के लिए उन्होंने विंध्याचल की उत्तुंगता को अपने अंगूठे से दबाकर कम कर दिया था, ताकि दोनों भौगोलिक क्षेत्रों में आवाजाही एवं संवाद बढ़ सके।
अगस्त्य ऋषि को 300 ऋग्वैदिक मंत्रों का सृष्टा तो माना ही जाता है, वे ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी के उत्कृष्ट ज्ञानी भी माने जाते हैं। काशी-तमिल संगमम ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और तकनीकी में संवाद का सम्मिलन है। अतः अगस्त्य ऋषि इस काशी-तमिल संगमम के प्रभावी प्रतीक हैं। वे सिद्ध चिकित्सा के जनक, ऋग्वेद के मंत्र सृष्टा, तमिल व्याकरण रचने वाले एवं कावेरी जैसे नदियों को पृथ्वी पर खोजने वाले ऋषि माने जाते हैं। उत्तर-दक्षिण एकता के संवाद प्रतीक के रूप में उन्हें इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि हिमालय पर वास करने वाले भगवान शिव ने उन्हें तमिल भूमि पर तमिल व्याकरण को विकसित करने के लिए भेजा था, या वे तमिल भूमि में अवस्थित थे, उन्हें भगवान शिव ने हिमालय बुलाकर तमिल व्याकरण के विकास की प्रेरणा दी थी। इस प्रकार काशी-तमिल संगम के प्रतीक के रूप में इस वर्ष का ‘काशी-तमिल संगमम’ ऋषि अगस्त्य के समाहारी प्रतीक को समर्पित है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में काशी-तमिल संवाद के संदर्भ में इस प्रतीक की अनेक भूमिकाओं का जिक्र भी किया था।
गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज ने पिछले दिनों काशी-तमिल संगमम का उत्तर भारत एवं तमिलनाडु पर पड़े सामाजिक प्रभावों का एक अध्ययन भी किया था। इस अध्ययन से यह जाहिर हुआ है कि काशी-तमिल संगमम के आयोजन से उत्तर भारत एवं तमिलनाडु के बीच ज्ञान, तकनीकी दक्षता, कला एवं संस्कृति का संपर्क और संवाद बढ़ा है। तमिलनाडु से काशी आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा तो हुआ ही है, तमिल पर्यटकों का काशी में सम्मान भी बढ़ा है। तमिल पर्यटकों में गर्व की अनुभूति भी विकसित हुई है। इससे भारत के इन दोनों भू-क्षेत्रों की जनता के मन का मिलन हुआ है। उत्तर भारत एवं तमिलनाडु के बीच अनेक प्रकार के शैक्षिक एवं शोधपरक संबंध भी विकसित हुए हैं। दोनों भागों के लोगों ने इन आयोजन के जरिये एक-दूसरे को जाना और समझा भी है। तमिल जन में काशी आने की चाह में बहुत बढ़ोतरी हुई है, उत्तर भारत के लोगों में भी तमिलनाडु से जुड़ने की चाह बढ़ी है।
काशी-तमिल संगमम एक प्रकार से शिक्षा, संस्कृति, शोध, स्मृति एवं सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से राष्ट्र निर्माण, विकास एवं हृदय के मिलन को स्थापित करने का प्रयास है, जिसके सकारात्मक सामाजिक प्रभाव हमें प्रेरित करते हैं कि ऐसे आयोजन तमिलनाडु एवं भारत के अन्य क्षेत्रों में भी हों। शायद प्रधानमंत्री मोदी के इसी विजन के तहत सौराष्ट्र-तमिल संगमम भी प्रारंभ हुआ है। संभव है आने वाले दिनों में इस आयोजन से प्रेरणा पाकर भारत के विभिन्न भागों के बीच ज्ञान, कौशल एवं संस्कृति का संवाद केंद्रित समवाय आयोजित हो और हम ‘एक भारत’ रचने की दिशा में आगे बढ़ सकें। केंद्र सरकार की ओर से की गई काशी-तमिल संगमम जैसी पहलों को आगे बढ़ाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों की सरकारों को भी इसमें रुचि दिखाने की जरूरत है।