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कर्नाटक जीत का नायक
हेमेन्द्र मिश्र
Updated Fri, 10 May 2013 11:28 PM IST
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कभी उन पर 'बाहरी नेता' होने का आरोप लगा, तो कभी उनकी खिंचाई 'एनजीओ टाइप झोलावाला' कहकर की गई।
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लेकिन आलोचनाओं को भी किस तरह अपनी 'ताकत' बनाई जा सकती है, यह कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मधुसूदन मिस्त्री से सीखना चाहिए।
कभी अहमदाबाद में पत्थरों का काम कर महज दो रुपये रोजाना कमाने वाला यह शख्स आज कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का नायक बनकर उभरा है।
हालांकि दक्षिण के इस किले को फतह करने के बावजूद वह खुद को 'सेनापति' नहीं, बल्कि एक आम सैनिक बताते हैं, जबकि चुनावी विश्लेषक 'येदियुरप्पा फैक्टर' और भ्रष्टाचार को भाजपा की हार वजह बताने के बाद भी मधुसूदन की 'रणनीति' की तारीफ के पुल बांध रहे हैं।
कुर्ता-चूड़ीदार और कोल्हापुरी चप्पल पहनने वाले मधुसूदन मिस्त्री पैदाइशी कांग्रेसी नहीं हैं। देश की इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी से वह करीब दशक भर पहले तब जुड़े, जब शंकर सिंह वाघेला ने राष्ट्रीय जनता पार्टी का विलय कांग्रेस में किया।
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लेकिन आज वाघेला जहां गुजरात की राजनीति में ही उलझे हुए हैं, मधुसूदन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और निचली इकाइयों के बीच ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं, जिन्हें सोनिया और राहुल का 'चाणक्य' माना जा रहा है।
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आखिर इसकी वजह क्या है? शुभचिंतकों की मानें, तो मधुसूदन मिस्त्री की कोई लालसा नहीं है। नेतृत्व जो भी फैसला करता है, उसमें 'अगर-मगर' जोड़े बिना चुपचाप काम करना पसंद करते हैं। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था, 'मैं अहमदाबाद से जब दिल्ली आया था, तब हाथ में सिर्फ एक बैग था। और आज अगर पार्टी मुझे जाने को कहती है, तो सिर्फ एक बैग लेकर ही मैं वापस लौटना चाहूंगा।'
लेकिन सिर्फ यही नजरिया उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बनाई गई कांग्रेस समन्वय समिति का हिस्सा नहीं बनाती। उन्हें अगर जनता की नब्ज पकड़ने वाले उम्मीदवार खोजने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो इसकी वजह है कि वह रणनीति बनाने के साथ ही जमीनी सच्चाई परखने में भी माहिर हैं।
कर्नाटक में भी हर विधानसभा क्षेत्र के लिए उन्होंने चार उम्मीदवारों के नाम तैयार किए थे, और जीत की 'भविष्यवाणी' जनवरी में ही कर दी थी। अभी जब कांग्रेस कर्नाटक जीत के खुमार में है, सौम्य स्वभाव के माने जाने वाले मधुसूदन मिस्त्री की राज्यवार यात्रा जारी है। आखिर उन्हें अपनी जिम्मेदारी जो पूरी करनी है।