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फैसला जो सबक है: दो लिहाज से महत्वपूर्ण इस मामले को न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व माना जाएगा
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पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
कर्नाटक की एक अदालत ने मानहानि के मामले में जनता दल सेक्यूलर के नेता एचडी देवगौड़ा को दो करोड़ रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है। यह मामला दो लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है। पहला यह कि करीब एक दशक के लंबे मुकदमे के बाद देश के पूर्व प्रधानमंत्री को मानहानि का दोषी पाया गया। और दूसरा, मानहानि के लिए किसी राजनेता पर दो करोड़ रुपये का हर्जाना देश के न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व ही माना जाएगा। नंदी समूह के उद्योगपति और पूर्व विधायक अशोक खेनी के खिलाफ देवगौड़ा की राजनीति के अलावा दूसरे मोर्चों पर लड़ाई चल रही थी।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद देवगौड़ा ने टीवी इंटरव्यू के माध्यम से फिर से आरोप लगाए। उसके बाद जिला अदालत ने देवगौड़ा को हर्जाना देने का आदेश दिया। कर्नाटक के फैसले के एक सप्ताह बाद मुंबई सिटी सिविल कोर्ट ने फिल्म समीक्षक कमाल खान (केआरके) को अभिनेता सलमान खान के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान रोकने के लिए आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया और वीडियोज के माध्यम से केआरके जो अभियान चला रहे हैं, उससे सलमान खान की छवि एक अपराधी, धोखेबाज और गंदे आदमी के तौर पर उभरती है।
जज ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 में मिली अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में अन्य लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने यह भी कहा कि समाज में प्रतिष्ठा किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में सुगंधित और बहुमूल्य इत्र की तरह होती है। चुनावी रैलियों में सभी पार्टियों के नेता अक्सर एक दूसरे पर अनेक संगीन आरोप लगाते हैं। वे अगर सही हों, तो आरोपी नेता को और गलत हों, तो आरोप लगाने वाले नेता को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद नेताओं के वादे की तरह आरोप भी उड़नछू हो जाते हैं।
संगीन आरोपों पर नेताओं की चुप्पी और स्वीकार्यता से राजनीति दीनता का पर्याय बन गई है, जो पूरे लोकतंत्र के लिए दुखद है। भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने एक पशु चिकित्सक के साथ विवाद में शालीनता की सभी सीमाएं तोड़ दी हैं और अब उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा चलाने की मांग हो रही है। विपक्षी नेता राहुल गांधी समेत अनेक नेताओं पर आपराधिक और दीवानी मानहानि के मुकदमे चल रहे हैं। दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव में प्रत्याशियों के शपथपत्र के आकलन की रिपोर्ट पर गौर किया जाए, तो मानहानि के मुकदमों के मामले में अरविंद केजरीवाल सभी नेताओं के सरताज साबित हो सकते हैं। कुछेक मुकदमों में केजरीवाल के माफीनामे के बाद परस्पर सुलह हो गई, लेकिन कई मामले अदालतों में अब भी चल रहे हैं।
उद्योग और व्यापार जगत में भी मानहानि के मुकदमों और बड़े दावों का रोचक इतिहास है। वर्ष 2008 में द न्यूयॉक टाइम्स में मुकेश अंबानी के इंटरव्यू से आहत होकर अनिल अंबानी ने 10 हजार करोड़ रुपये के हर्जाने का दावा कर दिया था, लेकिन दो साल बाद उनमें सुलह हो गई। पिछले दशक में नुस्ली वाडिया ने टाटा समूह पर 3,000 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा किया, तो आईटीसी कंपनी ने 1,000 करोड़ रुपये के हर्जाने का दावा किया था। महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की बात कही थी। लेकिन उसके बाद सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी में हवाला का प्रमाण मिलने के बाद पूर्व मंत्री के हौसले ठंडे पड़ गए। इससे लगता है कि मानहानि के मुकदमे की धमकी से नेता लोग कई बार अपना आपराधिक कारनामा ढकने की कोशिश भी करते हैं।
इसका दूसरा पहलू यह भी है कि मानहानि के मुकदमे में जीत से विजयी पक्ष को अपराधों से दोषमुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता। अपने यहां मानहानि के मामलों में कई बार मीडिया को बलि का बकरा बनाया जाता है। मीडिया रिपोर्टों को रोकने के लिए ताकतवर लोग बड़ी रकम के हर्जाने का मुकदमा दर्ज कराकर प्रेस की कलम पर अंकुश लगाना चाहते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के इशारे पर पत्रकारों के खिलाफ थोक के भाव साठ से ज्यादा मुकदमे दर्ज करवा दिए गए थे। उनमें से कई लोगों को उच्च न्यायालय से राहत मिली, लेकिन मुकदमेबाजी से मुक्ति नहीं मिल पाई। कई बार इसका उल्टा भी होता है। संभावनाशील अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद भी टीवी की बहस और सोशल मीडिया के माध्यम से फिल्म जगत के कद्दावर लोगों का मीडिया ट्रायल होने लगा था।
मीडिया को नसीहत देते हुए जज ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मीडिया को प्रेस फ्रीडम का अधिकार हासिल है, लेकिन उन्हें दूसरों के जीवन और सम्मान के अधिकार का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए। भारत में मानहानि की बहुत चर्चा होने के बावजूद थोड़े मामलों में ही मुकदमे दर्ज होते हैं। हर्जाने और सार्वजनिक माफीनामे के लिए सिविल अदालत में दावा करना पड़ता है, जिसके लिए देश में अलग से कोई विशिष्ट कानून नहीं है। मुकदमा दायर करने वाले को हर्जाना लेने में सफलता के लिए तीन बातें अदालत में साबित करनी पड़ती हैं। पहला, वक्तव्य आपत्तिजनक था।
दूसरा, यह प्रकाशन, ऑडियो या वीडियो के माध्यम से लोगों तक पहुंचा, और तीसरा, इससे पीड़ितव्यक्ति की प्रतिष्ठा को सीधा नुकसान हुआ। देवगौड़ा के मुकदमे में निचली अदालत में ही लंबा समय लग गया। अगर सुलह नहीं हुई, तो दोनों पक्ष इस मामले को उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाएंगे। दूसरी ओर इंग्लैंड का उदाहरण है, जहां द सन पत्रिका में छपे एक लेख के मामले में मानहानि का मुकदमा सिर्फ सोलह दिन में खत्म हो गया। देवगौड़ा पूर्व प्रधानमंत्री होने के साथ कर्नाटक की एक बड़ी पार्टी के प्रमुख होने के नाते ताकतवर हैं और लंबी मुकदमेबाजी कर सकते हैं। लेकिन सोशल मीडिया के नए दौर में अपमान और अवमानना से त्रस्त लोग अदालतों में जाने से डरते हैं। इसलिए जनता और कानून का मान बचाने के लिए अदालतों को ऐसे मामलों में जल्द फैसला देने की जरूरत है।
-लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और अनमास्किंग वीआईपी के लेखक हैं।