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सत्रह साल बाद इंसाफ : आखिर सुनी गई बिलकिस बानो की अपील
Fri, 04 Oct 2019 03:20 AM IST
सुभषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली
Published by: सुभषिनी सहगल अली
Updated Fri, 04 Oct 2019 03:20 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सत्रह साल लग गए इंसाफ के इंतजार में। गांधी जयंती के एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने बिलकिस बानो की अपील सुनी और गुजरात सरकार को आदेश दिया कि वह दो हफ्ते के अंदर बिलकिस को 50 लाख रुपये का मुआवजा और सरकारी नौकरी दे। इस फैसले का विरोध सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया। उन्होंने कहा कि बिलकिस मामले में गुजरात सरकार ‘रिव्यू’ पिटिशन दर्ज करने जा रही है, इसलिए इस फैसले को उसकी सुनवाई तक टाल देना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश ने जवाब दिया, दो हफ्ते के अंदर आपको इस निर्देश का पालन करना होगा।
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विगत अप्रैल में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले में गुजरात सरकार को मुआवजा, नौकरी और घर देने का आदेश दिया था। तब प्रमुख न्यायाधीश ने कहा था कि राज्य सरकार ने अपराधियों को सजा तो दी, पर मानव आक्रोश का सबसे भयानक नजारा देखने वाली यह पीड़िता बर्बाद हो चुकी थी। उसके साथ बाईस बार बलात्कार हुआ. उसकी लड़की को मार डाला गया। पर गुजरात सरकार ने आदेश नहीं माना, इसलिए उसे न्याय मांगने फिर अदालत में जाना पड़ा। और सॉलिसिटर जनरल महोदय ने उस गरीब औरत को मुआवजे के अधिकार से भी वंचित रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।
एडवा (ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन) की ओर से, मार्च 2002 में हम लोग गोधरा के दंगा पीड़ितों के शिविर में गए थे। वहां हम बिलकिस बानो से मिले। वह अपने मायके में थी, जब दंगा शुरू हुआ। परिवार के लोगों के साथ वह भागी। रास्ते में कुछ आदिवासियों ने उनकी मदद की। पर उनके गांव के लोग पीछा कर रहे थे। आखिर बिलकिस के परिवार के चौदह-पंद्रह लोगों की हत्या कर दी गई, जिनमें उसकी तीन साल की बच्ची भी थी। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। उन्हें मरा समझकर लाशों के बीच छोड़ दिया गया। गोधरा अस्पताल में बिलकिस की चिकित्सीय जांच हुई।
बिलकिस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, पर एक साल बाद पुलिस ने सबूत की कमी बताकर मामले को बंद कर दिया। बिलकिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। सीबीआई जांच के आदेश हुए। पर बिलकिस पर मुकदमा वापस लेने का दबाव था। उसे अपना घर बीस बार बदलना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने उसका केस बॉम्बे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया। 2008 में, कोर्ट ने बीस में से तेरह मुल्जिमों को दोषी पाया और उन्हें उम्रकैद की सजा दी। आजादी के बाद यह दंगों से संबंधित बलात्कार का पहला मामला था, जिसमें सजा हुई। पर बिलकिस को मदद नहीं मिली। अतः उसे फिर अदालत जाना पड़ा।
ऐसा नहीं है कि बिलकिस मुस्लिम है, इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ। दिल्ली के एम्स से अभी वह लड़की निकली है, जो उन्नाव की रहने वाली है। उसके साथ बलात्कार हुआ, उसके पिता की हत्या हुई, उसके चाचा जेल में हैं, उसकी दो चाचियां मर गई हैं और उसकी जान बड़ी मुश्किल से बची है। उसका वकील भी बुरी तरह घायल है। माना जा रहा है कि इन तमाम कुकर्मों के लिए शासक दल के विधायक (जो अब दल से ‘निकाल’ दिए गए हैं) जिम्मेदार हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से ही वह अब तिहाड़ जेल में है। शाहजहांपुर जेल में बाईस साल की एक युवती भी बंद है। वह बलात्कार पीड़ित है। आरोपी देश का गृह राज्यमंत्री रह चुका है। वह लखनऊ के बढ़िया अस्पताल िडस्चार्ज होकर फिर जेल पहुंच गए हैं। युवती का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। जबकि मुल्जिम पर इसी तरह का एक और मुकदमा लगा है। सरकार से न्याय की उम्मीद कितनी धूमिल होती जा रही है।