कुछ अलग है त्रासदियों और रिश्तों की यह जमीन
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दि लोलैंड, झुंपा लाहिड़ी
रैंडम हाउस इंडिया
मूल्यः 499 रुपए
अमेरिका में पली-बढ़ी झुंपा लाहिड़ी जिस वर्ष पैदा हुई थीं, उसी वर्ष दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी गांव में उग्र वामपंथियों ने किसान विद्रोह को अंजाम दिया था। इस हिंसक वामपंथी आंदोलन की रूमानियत ने तब पश्चिम बंगाल के कुलीन तबके को भी अपनी जद में ले लिया था।
बुद्धिजीवियों के साथ ही कॉलेज के छात्र भी नक्सल आंदोलन के नेताओं चारू मजूमदार और कानु सान्याल से प्रेरित होकर इससे जुड़ने लगे थे। हालांकि 1972 के आते-आते इस आंदोलन को बुरी तरह कुचल दिया गया। चारू मजूमदार की हिरासत में मौत हो गई। सैकड़ों युवाओं को गिरफ्तार किया गया। कई लापता हो गए। कई गोलियों का निशाना बन गए। मगर 1970 के दशक में नक्सल आंदोलन के ठंडा पड़ने के साथ ही कई त्रासदियां भी दफन हो गईं। झुंपा लाहिड़ी का यह उपन्यास ऐसी ही एक त्रासदी की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। मगर इसका फलक नक्सल आंदोलन को छूते हुए रिश्तों के मनोविज्ञान, उसकी बारीकियों, जटिलताओं, उलझनों और संवेदनाओं की परतें खोलता हुआ उपस्थित होता है।
1950 के दशक में आजादी से कुछ बरस पहले एक निम्न मध्यवर्गीय बंगाली दंपत्ति के जीवन से शुरू हुई यह कहानी उनकी चौथी पीढ़ी तक चली जाती है। उनके दो बेटे होते हैं, सुभाष और उदयन। दोनों में महज पंद्रह महीने का फासला, लिहाजा दोनों की पढ़ाई एक साथ शुरू होती है।
कलकत्ता के टालीगंज इलाके में दोनों का बचपन बीतता है। 60 के दशक में दोनों जवान होते हैं और वहीं से दोनों के रास्ते अलग होने लगते हैं। कॉलेज से निकलकर सुभाष पीएचडी करने अमेरिका के रोड आईलैंड चला जाता है और उदयन नक्सल आंदोलन की गतिविधियों से जुड़ जाता है। इस बीच, उदयन गौरी नाम की एक लड़की से माता-पिता के विरोध के बावजूद शादी कर लेता है। और फिर एक दिन उदयन को उसके घर के सामने उसी जगह पुलिस गोली मार देती है, जहां सुभाष के साथ वह खेला करता था!
असल में यहीं से रिश्तों की जटिलताएं सामने आती हैं। किसी तरह सुभाष गर्भवती गौरी को उससे विवाह के लिए राजी कर लेता है और उसे अपने साथ अमेरिका ले जाता है। गौरी विवाह के लिए राजी तो हो जाती है, मगर वह कभी सुभाष को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाती। इस बीच, उसकी एक बेटी बेला होती है। मगर एक दिन वह सुभाष और अपनी बेटी को छोड़कर अमेरिका के दूसरे छोर में किसी संस्थान में नौकरी करने चली जाती है। सुभाष और गौरी यह बात सबसे छिपाए रखते हैं कि बेटी का असली पिता उदयन है। बाद में बेला भी एक बेटी को जन्म देती है।
झुंपा लाहिड़ी की खासियत है कि वह समय और परिस्थितियों की बारीक डिटेलिंग करती हैं। इस उपन्यास के लिए भी उन्होंने अच्छा खासा रिसर्च किया है। इसके बावजूद उनका यह उपन्यास नक्सलवाद या माओवाद को लेकर कोई विचारोत्तेजक विमर्श पैदा नहीं करता। यही नहीं, करीब साढ़े तीन सौ पेज के उपन्यास में अंत तक यह पता नहीं चलता कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां थीं जिससे उदयन का झुकाव नक्सल आंदोलन की तरफ हो जाता है। झुंपा टाइपराइटर और पत्र लेखन के दौर से कंप्यूटर और ई-मेल के दौर तक का सफर तो तय करती हैं, लेकिन नक्सल आंदोलन में इन पांच दशकों में आए भटकाव को रेखांकित नहीं कर पातीं। हैरानी की बात यह है कि इसे ऐसे उपन्यास के बतौर प्रचारित किया गया, मानो यह नक्सल आंदोलन पर कोई नई रोशनी डाल रहा हो।