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घाटी की सुरक्षा पर नए सिरे से हो विचार: पहलगाम हमले के बाद पर्यटकों का पलायन... अब भी खुलेआम घूम रहे अपराधी
Mon, 28 Apr 2025 05:54 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
समीर चौहान, सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर
समीर चौहान, सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Mon, 28 Apr 2025 05:54 AM IST
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पहलगाम आतंकी हमला (फाइल)
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
बीते 22 अप्रैल को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगाम कस्बे से करीब सात किलोमीटर दूर बैसरन घाटी में पाकिस्तानी सेना द्वारा भेजे गए आतंकियों के नरसंहार और बर्बरता ने पूरे देश को गुस्से और दुख में डुबो दिया है। आतंकवाद के चरम दौर में वर्षों तक नियंत्रण रेखा के साथ-साथ कश्मीर घाटी में भी सेवा करने के नाते मैं इस भीषण घटना का सामरिक विश्लेषण करने से खुद को रोक नहीं सका। यह एक सुनियोजित सैन्य अभियान था, जिसे पाकिस्तानी सेना के निरंतर मार्गदर्शन और नियंत्रण में अंजाम दिया गया।
हालांकि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद 2019 से इस क्षेत्र में काफी हद तक शांति बहाल हो गई है, लेकिन कश्मीर घाटी अब भी ‘अशांत क्षेत्र’ है। इसलिए घाटी में सुरक्षा ‘सुरक्षा नेटवर्क की ग्रिड प्रणाली’ के आधार पर सुरक्षा बलों के एकीकृत ग्रिड द्वारा प्रदान की जाती है।
प्रत्येक सुरक्षा ग्रिड के लिए उपलब्ध मानव और भौतिक संसाधनों को हर संवेदनशील जगह पर इष्टतम रूप से तैनात किया जाना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि संसाधन सीमित हैं। हम अब भी उस स्थिति में नहीं हैं, कि सभी स्थानों की सुरक्षा के लिए चौबीसों घंटे अधिकतम संसाधनों को तैनात कर सकें। इसलिए, ग्रिड में उनके समावेश के लिए स्थानीय लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
घाटी में सामान्य स्थिति बहाल होने के साथ तथा संभवतः आम लोगों और पर्यटकों में विश्वास पैदा करने के लिए इन सुरक्षा बलों को जनता की नजरों से दूर कर दिया जाता है, ताकि उनकी भारी उपस्थिति को कम किया जा सके। ऐसा सामान्य स्थिति की धारणा को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। पहलगाम के बैसरन क्षेत्र में भी ऐसा ही हुआ होगा और पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्देशित आतंकवादियों ने इसका पूरा फायदा उठाया। इस सुरक्षा घेरे की क्षमता में शिथिलता और इससे उभरती हुई कमजोरी के बारे में स्थानीय लोगों द्वारा जानकारी देने को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन यह उन लोगों के लिए जांच और उजागर करने का विषय है, जो सैन्य प्रतिष्ठान में हैं। चूंकि यह घाटी में पर्यटन का चरम सीजन है और अनेक पर्यटन स्थल भौगोलिक दृष्टि से अलग-अलग हैं, इसलिए एकीकृत सुरक्षा नेटवर्क ने इन स्थलों की संवेदनशीलता का विश्लेषण करके प्रमुख स्थलों पर सुरक्षा बलों को तैनात किया होगा।
पहलगाम के निकट बैसरन मैदान अपने अपेक्षाकृत दूरस्थ स्थान, विशिष्ट सौंदर्य और शांति के कारण अधिकांश पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है, तथा इस हिस्से की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिए था। लेकिन, यहां लगातार सुरक्षा में कमी सीमा पार बैठे आतंकियों से छिपी नहीं रही होगी। और इसीलिए, उन राक्षसों ने यहां आराम से हमला कर दिया।
मैं यहां इस पर बहस नहीं करूंगा कि ये हथियारबंद आतंकवादी नियंत्रण रेखा से लगभग 200 किलोमीटर दूर इतने अंदर तक कैसे पहुंचे। मैं कथित स्लीपर सेल के बारे में भी बात नहीं करूंगा, जो इन्हें मदद करते हैं। गलत विचारधारा या पैसे का लालच उनकी फितरत हो सकती है। लेकिन, सीमा पार से सामान्य क्षेत्र में पहुंचने और स्थानीय समर्थन पाने के बाद, इन आतंकवादियों को उनके आकाओं द्वारा सबसे अरक्षित स्थान पर हमला करने का आदेश दिया गया होगा। उसके बाद, उन्होंने घटना को अंजाम दिया होगा।
इसलिए, अगर कोई पूरे हमले का निष्पक्ष विश्लेषण करे, तो वह निश्चित रूप से कह सकता है कि इसकी योजना और क्रियान्वयन पाकिस्तानी सेना की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी के तहत किया गया था। अपने आकाओं को खूनी कृत्यों को लाइव दिखाने या सुबूत के तौर पर रिकॉर्ड करने के लिए बॉडी-कैम का इस्तेमाल करना, इलाके का चयन, लक्ष्य की पहचान और निष्पादन के समय की विस्तृत योजना के पीछे एक सैन्य दिमाग के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। बैसरन मैदान में ऐसे हमले के लिए अपेक्षित आसान लक्ष्य बनने के सभी तत्व मौजूद थे।
बैसरन एक विस्तृत खुला मैदान है, जिसके किनारों पर घने जंगल हैं, जो छिपने के लिहाज से बेहतरीन है। इसलिए निहत्थे नागरिक आसान लक्ष्य बन रहे थे, जबकि आतंकवादियों के पास हमले के बाद छिपकर भागने के लिए मौके थे।
देश के कोने-कोने से (अरुणाचल प्रदेश से, तमिलनाडु से और गुजरात तक के) आने वाले गैर-मुस्लिम पुरुष पर्यटकों को निशाना बनाया गया और इस प्रकार पूरे भारत में दर्द और दुख का माहौल पैदा किया गया। साथ ही एक असहाय पत्नी से कहा गया कि वह प्रधानमंत्री तक संदेश पहुंचाए। यह सब एक बहुत ही तीक्ष्ण और लक्ष्य केंद्रित योजना की ओर इशारा करता है, जो केवल एक निंदनीय सैन्य दिमाग ही बना सकता है। इस खुले स्थान वाले रिसॉर्ट में पर्यटकों की नियमित आवाजाही और क्षेत्र में लंबे समय तक शांति रहने से सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों में संतुष्टि की भावना पैदा हुई होगी। और सीमा पार बैठे आतंकियों ने इसी का फायदा उठा कर इसे लक्ष्य बनाया।
मैदान में सीमित एकल संकीर्ण प्रवेश/निकास बिंदु है, जो पीड़ितों के लिए तेजी से भागने या घायलों को जल्दी से निकालने में बाधा डालता है। इस स्थान तक निकटतम सड़क से केवल टट्टू द्वारा पहुंचा जा सकता है, जिसमें काफी समय और प्रयास लगता है, जो आतंकवादियों के पक्ष में काम करता है। निकटतम सड़क से यह दूरी किसी भी त्वरित प्रतिक्रिया दल की प्रतिक्रिया में कम से कम 30 कीमती मिनटों का विलंब कर देती है, जो हमले के बाद आतंकियों के लिए भागने के लिए पर्याप्त है।
आतंकवादियों को तब हमला करने का काम सौंपा गया, जब मैदान में अधिकतम पर्यटक हों और सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया का समय भी सबसे कम हो। आतंकवादियों ने इन सभी फायदों को अच्छी तरह से जानते हुए दोपहर करीब 2.50 बजे हमला किया।
कश्मीर घाटी से पर्यटकों का पलायन हो चुका है, पर इस जघन्य अपराध के अपराधी अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। इसलिए, पाकिस्तानी सेना के आकाओं द्वारा उन्हें फिर से एक और काम सौंपे जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है, खासकर तब, जब पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान अधीर और अडिग हो। इसलिए मैं दृढ़ता से कहता हूं कि क्षेत्र में एकीकृत सुरक्षा व्यवस्था द्वारा सभी संभावित लक्ष्यों का नए सिरे से भेद्यता विश्लेषण किया जाए। मुझे यकीन है कि यही हो भी रहा होगा।