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मोदी के वायदों पर जेटली की परीक्षा

Fri, 27 Feb 2015 11:07 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 27 Feb 2015 11:07 PM IST
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jaitley budget.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी हार और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर शर्मिंदगी झेलने के बाद भाजपा कुछ हद तक समझ गई है कि प्रधानमंत्री की गरीब समर्थक छवि को धक्का लग सकता है। इसलिए आज पेश होने वाले बजट में इस दृष्टिकोण में सुधार की कोशिश के तहत समाज के सबसे कमजोर वर्ग पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जा सकता है, जिनसे लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने कई वायदे किए थे।रेल बजट में भी यात्री किराये में बढ़ोतरी न कर पार्टी छवि को हुए नुकसान को कम करने की कोशिश की गई है। एक प्रमुख भाजपा नेता ने इस स्तंभकार को बताया कि सामान्य स्थिति में, यानी अगर दिल्ली चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहता, तो यात्री किराये में वृद्धि हो सकती थी।

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मोदी और जेटली को 2015 के बजट से एक मजबूत राजनीतिक-आर्थिक संदेश देना होगा। अब तक प्रधानमंत्री ने अपनी भव्य सार्वजनिक घोषणाओं में सबके लिए सब कुछ करने की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने खुद को गांधीवादी, लोहियावादी बताते हुए दावा किया कि नीतियां बनाने से पहले वह 'आखिरी आदमी' पर नजर रखते हैं। साथ ही उन्होंने बहुराष्ट्रीय निगम समेत बड़े पूंजीपतियों को आश्वस्त किया कि 'अगर वे भारत में निवेश करते हैं, तो वह उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए सब कुछ करेंगे।' दरअसल बड़े व्यावसायिक घरानों की कुछ चिंताओं का टकराव समाज के सबसे कमजोर वर्ग यानी किसान के हितों से होता है। यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश विवाद से बिल्कुल स्पष्ट है, जहां राजनीतिक सहयोगियों के अलावा भाजपा के संघ परिवार से जुड़े संगठन भी खुलकर विरोध कर रहे हैं। बड़े पूंजीपतियों और समाज के सबसे कमजोर तबके की जरूरतों में तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा। फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी की मशहूर किताब 'कैपिटल इन 21 सेंचुरी' पूंजीवाद के दो सौ वर्षों के इतिहास का सार है, जिसमें बताया गया है कि पूंजी का मुनाफा हमेशा लोगों की आय की औसत वृद्धि से अधिक होती है, जिसके चलते मुट्ठी भर लोगों के पास धन केंद्रित हो जाता है। हमारे देश में आय और धन की असमानता पश्चिमी देशों के मुकाबले संभवतः बहुत ज्यादा है। इसलिए भारत के संदर्भ में आर्थिक नीतियों को लागू करते वक्त नरेंद्र मोदी को जरूर इस बात को ध्यान में रखना चाहिए।
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प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की समस्या यह है कि यदि वे आसान व्यावसायिक माहौल बनाने और अनुकूल कर ढांचा तैयार करने का वायदा कर निवेशक समुदाय को खुश करने की कोशिश करते हैं, तो छोटे किसानों का एक बड़ा समूह इसे अलग नजरिये से देखता है। किसान लंबे समय से मूल्य निर्धारण क्षमता के कारण भारी नुकसान उठा रहे हैं, क्योंकि वैश्विक कृषि उत्पादों के मूल्य में 30 फीसदी तक की गिरावट आई है। वे कृषि उत्पादों पर उच्च समर्थन मूल्य के मोदी के चुनावी वायदों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। मोदी दो प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों के बीच फंस गए हैं। अर्धवार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण में विश्व स्तर पर कृषि उत्पादों के मूल्यों में गिरावट का स्वागत किया गया है, क्योंकि यह खाद्य मुद्रास्फीति को कम करती है और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए व्यवसायियों के हितों में ब्याज दर घटाने को संभव बनाती है। लेकिन किसान इसी चीज को दूसरी तरह से देखते हैं। इस जटिल प्रश्न की राजनीति बिल्कुल अप्रत्याशित है। नीति आयोग में बैठे अर्थशास्त्री इसका समाधान नहीं कर सकते। दिल्ली की हार के बाद यह मोदी की सबसे बड़ी दुविधा है।
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संघ परिवार के किसान संगठन भारतीय किसान संघ के प्रमुख प्रभाकर केलकर ने इस लेखक से साफ कहा, 'हम निराश हैं कि चुनाव के दौरान किसानों से किए गए सभी वायदों को मोदी भूल गए। किसानों के प्रति इस विद्वेष ने मुझे सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताने पर मजबूर किया।' उन्होंने बताया कि देश के 92 फीसदी किसानों के पास पांच एकड़ से भी कम भूमि है और उनकी आय प्रति माह ढाई हजार से छह हजार के बीच है। यह विशेष रूप से किसानों के लिए सबसे बुरा वर्ष है, क्योंकि वैश्विक खाद्य मूल्य ध्वस्त हो गए हैं। मुझे लगता है कि आने वाले महीनों में और भी अधिक किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो सकते हैं। केलकर ने राजग के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का भी खुलेआम विरोध किया। इसलिए प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री को विभिन्न वर्गों की मांगों में सामंजस्य बिठाने के असंभव काम को करना होगा।

आने वाले महीनों में जेटली को इस दुविधा से जूझना पड़ेगा, क्योंकि कृषि विकास दर तेजी से गिर रही है और इसका औद्योगिक मांग पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। ग्रामीण भारत में प्रमुखता से बिकने वाली वस्तुओं और दो पहिया वाहनों की निर्माता कंपनियां नकारात्मक विकास दिखा रही हैं। क्या हम धीमी कृषि आय और गिरती औद्योगिक मांग के दुष्चक्र में फंस रहे हैं? इसका गंभीर विश्लेषण करने की जरूरत है।

जेटली को सबसे पहले लोगों की मांगों का समाधान करना होगा। उद्योग जगत 65 फीसदी की क्षमता पर काम कर रहा है। आम तौर पर व्यवसाय के विस्तार पर विचार करने से पहले क्षमता के 85 से 90 फीसदी उपयोग की प्रतीक्षा की जाती है। इसलिए चाहे नए सिरे से कितनी भी राशि प्रोत्साहन के लिए क्यों न दी जाए, नए निजी निवेश की शुरुआत नहीं होगी। इसलिए या तो सरकार के विभिन्न आर्थिक विभागों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बीच निवेश को आगे बढ़ाने पर बात चल रही है। बजट में एक विस्तृत रूपरेखा पेश की जा सकती है, जिसमें ऊर्जा, सड़क, बंदरगाह और किफायती आवास तक के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम नए निवेश करेंगे। इसकी एक झलक रेल बजट में देखी जा सकती है, जिसमें सरकार ने अगले पांच वर्षों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए 8.5 लाख करोड़ के बड़े निवेश की घोषणा की है।

 
अरुण जेटली खुशकिस्मत हैं कि तेल मूल्यों में भारी गिरावट के कारण सरकार की वित्तीय स्थिति अच्छी है। लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा की दृढ़ प्रतिबद्धता देश को कल्याणकारी राज्य बनाने की है, जिसके बारे में संसद में अपने पहले संबोधन में मोदी ने कहा था कि 'ये सरकारी खजाना गरीबों के लिए है'। उम्मीद है कि उन्हें यह बात याद होगी।

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