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मृत्युदंड पर सोचने का समय

Sun, 14 Sep 2014 06:47 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 14 Sep 2014 06:47 PM IST
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Its time to think on capital punishment

शुक्र है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली की फांसी की सजा पर अक्तूबर अंत तक रोक लगा दी। इससे पहले शीर्ष अदालत ने इस मामले में आधी रात में हस्तक्षेप करते हुए कोली की फांसी पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी थी। आगामी 28 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ जब इस मामले में आगे की सुनवाई करेगी, तब उम्मीद करनी चाहिए कि मीडिया द्वारा चलाए गए अभियान से प्रभावित हुए बगैर वह उस विवेकपूर्ण रवैये का परिचय देगी, जो किसी भी न्यायिक समीक्षा का अनिवार्य हिस्सा होता है। अब जब भारत वैश्विक परिदृश्य में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है, तब किसी के जीवन और मृत्यु पर विचार करते हुए बर्बरता को बुनियाद बनाने से ज्यादा घातक और कुछ नहीं हो सकता।

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दरअसल निठारी में एक के बाद एक बच्ची की हत्या की घटनाएं दिसंबर, 2006 में सामने आई थीं। अंततः सुरेंद्र कोली के खिलाफ सोलह मुकदमे दर्ज किए गए, कुछ मुकदमे उनके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर के खिलाफ भी दर्ज हुए। इन दोनों पर अपहरण, बलात्कार और हत्या के मामले दर्ज हुए।
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फरवरी, 2009 में कोली और पंढेर को एक लड़की-रिम्पा हालदार-की हत्या के मामले में अदालत ने दोषी ठहराया और फांसी की सजा दी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पंढेर को बरी कर दिया। उसके बाद विगत जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने कोली की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी, राष्ट्रपति ने भी उसकी दया यचिका खारिज कर दी, जिसके नतीजतन कोली के नाम डेथ वारंट जारी कर दिया गया। अगर सुप्रीम कोर्ट ने कोली के मृत्युदंड पर ऐन वक्त पर रोक नहीं लगाई होती, तो अब तक वह फांसी के फंदे पर झूल चुका होता।
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यह सब कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि इन पंक्तियों का लेखक सुरेंद्र कोली के गुनाहों को कम करके आंकता है। कोली के गुनाह मानवता को शर्मसार करने वाले हैं, और इसके लिए उसे सख्त सजा होनी चाहिए। लेकिन इसे भी याद रखना चाहिए कि उसके खिलाफ बारह और मामले हैं, जिनकी जांच चल रही है। अगर उन बारह मामलों की जांच पूरी होने से पहले ही कोली को फांसी पर लटका दिया जाता है, तो दूसरे पीड़ित परिवारजनों को लगेगा कि कोली को फांसी उस जुर्म के लिए नहीं दी गई, जो उसने उसकी बेटी या बहन के खिलाफ किए थे। राज्य को सिर्फ अपराधी को दंडित करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए, उसे इस दिशा में भी विचार करना चाहिए कि कानूनी प्रक्रिया उस अपराधी के अपराध से पीड़ित तमाम लोगों और उसके परिवारजनों को आश्वस्त करे।

सर्वोच्च न्यायालय ने 1982 में कहा था कि फांसी की सजा बेहद दुर्लभ मामलों में दी जानी चाहिए। इससे फांसी की सजा में उल्लेखनीय कमी आई। अजमल कसाब और अफजल गुरु को फांसी देने से पहले पिछले कुछ वर्षों में धनंजय चटर्जी ही एकमात्र ऐसा शख्स था, जिसे उसके जुर्म के लिए मृत्युदंड दिया गया। ऐसे में, उम्मीद करनी चाहिए कि कोली की अपील पर विचार करने वाली सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ इस पर जरूर सोचेगी कि उस व्यक्ति को फांसी दे देना कितना औचित्यपूर्ण है, जिसके खिलाफ कई मुकदमे अभी चल ही रहे हैं। बेहतर तो यही होगा कि कोली के खिलाफ जितने मामले चल रहे हैं, सब पर न्यायपालिका का विचार आने के बाद ही डेथ वारंट पर दस्तखत किया जाए। क्योंकि कोली से जुड़े मामलों में किसी एक में भी न्यायालय का फैसला अलग हुआ, तो इसका असर तमाम मामलों पर पड़ेगा। कोली ने सभी अपराध एक ही जगह किए हैं, और सभी का उद्देश्य एक ही रहा है।

अलबत्ता कोली के मामले से अलग हटकर यह समय हमारे लिए मृत्युदंड पर गंभीरता से विचार करने का भी है। फांसी की सजा खत्म करने की मांग के वैसे तो कई कारण हैं, पर सबसे बड़ी वजह यह है कि संयुक्त राष्ट्र के 193 देशों में सिर्फ 40 देशों में ही मृत्युदंड है। सौ देशों ने इसे पूरी तरह खत्म कर दिया है। जबकि दूसरे देशों ने या तो पिछले एक दशक में किसी को फांसी नहीं दी है या युद्ध जैसे अपवाद मामलों में ही किसी को यह दंड दिया है। जैसे-जैसे देश परिपक्व होते जाते हैं, वैसे-वैसे अपराधों को खत्म करने के मामले में हमारे बुनियादी तर्क भी परिपक्व होने चाहिए। अब इस सोच पर पुनर्विचार करने की जरूरत है कि मृत्युदंड अपराधों के निवारक के तौर पर काम करता है। किसी भी देश में अपराधों के घटने-बढ़ने का आंकड़ा मृत्युदंड की व्यवस्था होने या न होने पर निर्भर नहीं करता। ज्यादातर मामलों में यही देखा जाता है कि अपराधी अपराध करते हुए उसके परिणाम की परवाह नहीं करता। अपराध करते हुए अपराधी अधिकतम कोशिश इसकी भी करता है कि वह पकड़ा ही न जाए।

सच यह है कि दुनिया का कोई भी समाज अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगा पाया है। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि राज्य खुद हत्या में भागीदार हो जाए। याद रहे कि मानवीय समाज ने व्यापक प्रगति की है-यह प्रगति सिर्फ तकनीक में नहीं, जीवन मूल्यों में भी हुई है। फांसी पर बहस करते हुए हम यह नहीं भूल सकते कि आज दुनिया भर में मनुष्य के जीवन का महत्व कितना अधिक है।


कोली के मामले में विचार करते हुए अदालत को इसकी भी पड़ताल करनी चाहिए कि फांसी की सजा पाया व्यक्ति अक्सर सामाजिक और आर्थिक रूप से निचले तबके का ही क्यों होता है। क्या इसकी एक वजह यह भी है कि साधनसंपन्न लोगों की अच्छे वकीलों तक पहुंच होती है? निठारी मामले में भी, जहां कोली को तो दोषी पाया गया, लेकिन उसी कोठी में, जहां वे हत्याएं हुईं, रहने वाले उसके मालिक और नियोक्ता के लिए चीजें अपेक्षाकृत आसान रहीं। अगर यह साबित हुआ कि बेहतर वकीलों तक पहुंच होने के कारण पंढेर छूट गया, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी!

(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)

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