कश्मीर को नई नजर से देखने का समय
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इस लेख की पहली पंक्ति में यह स्पष्ट करना चाहती हूं कि प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को लेकर जो फैसला लिया पिछले सप्ताह, वह बिल्कुल ठीक था। आज के दिन शुरू होनी थी विदेश सचिवों की बातचीत, जिससे उम्मीद यह थी कि पाकिस्तान के साथ हमारा आर्थिक रिश्ता थोड़ा मजबूत हो जाए। आर्थिक रिश्ता मजबूत बनाएंगे, तो मुमकिन है कि राजनीतिक समस्या भी धीरे-धीरे हल हो जाएगी। लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीरी अलगाववादियों को दिल्ली बुलाकर साफ इशारा किया कि जब तक कश्मीर का मसला हल नहीं होता है, तब तक कोई दूसरी बात नहीं हो सकती। पाकिस्तान के लिए इस समस्या का एक ही समाधान है-कश्मीर हमको दे दो।
हम जानते हैं कि ऐसा कभी नहीं हो सकता है। कश्मीर को किसी हालत में भारत से अलग नहीं होने दिया जाएगा। सीमा के उस पार हमारा एक नहीं, दो दुश्मन देश हैं, इसलिए कि चीन का भी हाथ है इस समस्या में। कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान में है, उसमें पाक शासकों ने चीन को सड़कें बनाने की इजाजत दे रखी है और ये सड़कें भारत की सीमा तक आती हैं। जो सपना कश्मीरी अलगाववादी देख रहे हैं 'आजादी' का, वह कभी पूरा नहीं होने वाला है, लेकिन इस देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने इसको आधार बनाकर न पाकिस्तान से कभी बातचीत की है, और न कश्मीरी अलगाववादियों से।
सो अगली बार जब भी बातचीत का सिलसिला शुरू होगा, भारत को यह कहकर बातचीत शुरू करनी चाहिए कि कश्मीर हमारा है और हमारा रहेगा। आधार जब स्पष्ट होगा, तभी कश्मीर की जायज शिकायतें सुनने का कोई फायदा होगा। जायज शिकायतें हैं बहुत सारी, जिनमें सबसे जायज शिकायत लोकतंत्र को लेकर है। शेख अब्दुल्ला को कैद करने के बाद न जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर में असली चुनाव होने दिए कभी और न ही उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने। कश्मीर में पहला असली चुनाव हुआ था 1977 में, जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे। अलगाववादी संस्थाएं कमजोर हो गई थीं उसके बाद और शायद खत्म भी हो गई होतीं, अगर इंदिरा गांधी ने फारूक अब्दुल्ला की सरकार को 1984 में एक वर्ष के शासनकाल के बाद ही गिराकर फिर साबित न किया होता कश्मीरियों की नजरों में कि उनको असली लोकतंत्र नहीं मिल सकता है कभी। जब 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपनी माताजी की गलती पर एक और गलती की फारूक अब्दुल्ला को जबर्दस्ती 1986 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में घसीटकर।
अलगाववादी संगठनों का एक अलग गठबंधन बना और 1987 में जब चुनाव हुए विधानसभा के, तो फिर से धांधली की शिकायतें घाटी में गूंज उठीं। इसके बाद ही सिलसिला शुरू हुआ अलगाववादी नेताओं का सीमा पार जाकर आतंकवादी ट्रेनिंग लेने का। कई अलगाववादी संगठन आतंकवादी बन गए और इनकी सहायता पाकिस्तान ने करनी शुरू की। एक नए किस्म के युद्ध की शुरुआत हुई, जिसमें सबसे ज्यादा खून कश्मीरियों का बहा है। अनुमान है कि 70,000 से ज्यादा कश्मीरियों ने अपनी जान गंवाई है इस लड़ाई में। इसलिए और भी जरूरी है कि मोदी कश्मीर को नई नजरों से देखें और नए सिरे से हमारी सबसे पुरानी राजनीतिक समस्या का समाधान ढूंढें। बहुत हो चुकी है बेमतलब बातचीत।